UP Assembly Election 2022 : आखिर क्यों टिकी हैं सबकी नजरें यूपी चुनाव पर…

यूपी का चुनाव जीतना हर पार्टी के लिये करो या मरो के नारे को जीता हुआ सा प्रतीत होता है

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 का आगाज़ इसी हफ्ते के अंत में होने वाला है. सात चरणों में होने वाले यूपी चुनाव के बाद जो परिणाम आयेगा, उससे न केवल प्रदेश में नयी सरकार बनेगी, बल्कि इससे काफी हद तक ये भी कयास लगा लिया जायेगा कि आखिर इस बार केंद्र में किसकी सत्ता आने वाली है. ऐसे में यूपी के चुनाव से पहले आयी पोल रिपोर्ट को भी काफी अहम माना जा रहा है. आखिर क्यों है यूपी का चुनाव इतना अहम, आइये जानने की कोशिश करते हैं…

सुषमाश्री

अगले महीने देश के पांच राज्यों में चुनाव होने वाले हैं, लेकिन सबकी नजरें टिकी हैं उत्तर प्रदेश के चुनाव पर. इसका सबसे बड़ा कारण माना जाता है यहां की 240 मिलियन आबादी को. अगर अकेले यूपी की जनसंख्या की बात करें तो एक अलग देश के रूप में ये दुनिया का पांचवां सबसे बड़ी जनसंख्या वाला देश कहा जा सकता है. ​अभी दुनिया में सबसे ज्यादा आबादी वाले देश क्रमश: चीन, भारत, संयुक्त राज्य अमेरिका और इंडो​नेशिया हैं. क्षेत्रफल की दृष्टि से देखें तो यूपी पाकिस्तान और ब्राजील से भी बड़ा देश माना जायेगा.

यूपी होकर जाता है केंद्र की सत्ता पाने का रास्ता

अकेले उत्तर प्रदेश से सबसे ज्यादा 80 सांसद लोकसभा में पहुंचते हैं. यही वजह है कि ऐसा माना जाता है कि यूपी में जो भी पार्टी ​जीतती है, केंद्र में भी उसी की सरकार बनती है. जवाहर लाल नेहरू से लेकर देश के ज्यादातर प्रधानमंत्री उत्तर प्रदेश से होकर ही केंद्र की सत्ता तक पहुंचे हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के पश्चिमी राज्य गुजरात से आते हैं, लेकिन 2014 में जब वे पहली बार सांसद का चुनाव लड़ने के लिये चुनावी रण में उतरे तो उन्होंने उत्तर प्रदेश की वाराणसी सीट को ही अपने लिये चुना. 2019 में वे यहीं से एक बार फिर से सांसद चुने गये. यहां की जनता ने भी पिछले दो चुनावों में बीजेपी को दिल खोलकर अपना वोट दिया. 2014 में बीजेपी ने 71 सीटें जीतीं जबकि 2019 में 62 सीटों पर कब्जा किया.

1990 के अंत से प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ही मुख्य तौर पर प्रदेश की राजनीति में नजर आते थे. इस दौरान कांग्रेस और बीजेपी प्रदेश में कहीं पिछड़ से गये थे. लेकिन 2017 के चुनाव में बीजेपी जबरदस्त मतों से प्रदेश में लौटी. पीएम मोदी की हवा में 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 403 सीटों में से 312 सीटों पर जीत मिली.

हिंदुत्व की राजनीति करने के लिये चर्चित रहे योगी

उसके बाद पार्टी ने योगी आदित्यनाथ को प्रदेश की सत्ता सौंपी. बता दें कि योगी आदित्यनाथ को हमेशा से प्रदेश में भगवाधारी और हिंदुत्ववादी राजनीति करने के लिये जाना जाता रहा है. प्रदेश में मुख्यमंत्री बनने से पहले योगी आदित्यनाथ लगातार चार बार गोरखपुर से सांसद चुने जा चुके हैं. खुद योगी आदित्यनाथ और उनकी हिंदू वाहिनी सेना मुस्लिम विरोधी तीखी हिंदुत्व की राजनीति के लिये हमेशा से चर्चा में रहे हैं. योगी आदित्यनाथ को उम्मीद है कि 10 मार्च को आने वाले चुनाव परिणाम उन्हें फिर से यूपी के सीएम की कुर्सी पर विराजमान होने का मौका देगी.

हाल के महीनों में पीएम मोदी ने योगी आदित्यनाथ की मदद करते हुये यूपी के तकरीबन एक दर्जन दौरे किये, प्रदेश में चुनावी सभायें कीं, रैलियां कीं और जनता से एक बार फिर बीजेपी की सरकार बनाने का​ निवेदन किया. पीएम मोदी ने अपनी रैलियों में बीजेपी को एक और चांस देने की बात की.

भाजपा की स्थिति पहले जैसी मजबूत नहीं

जमीनी हकीकत की बात की जाये तो कृषि कानूनों और कोरोना काल की अव्यवस्था को लेकर बीजेपी ने प्रदेश में काफी हद तक अपनी जमीन खो दी है. किसान लगभग एक साल तक कृषि कानूनों के विरोध में सड़कों पर डटे रहे, लेकिन केंद्र की बीजेपी सरकार ने उनकी सुध तक लेना जरूरी नहीं समझा. उनके केंद्रीय मंत्री का नाम लखीमपुर खीरी कांड में आया, लेकिन उस पर कार्रवाई तक नहीं हुई. वहीं, कोविड काल में भी प्रदेश की हालत बेहद बुरी थी. जीवनदायिनी गंगा पूरी तरह लाशों से अटी पड़ी थी, लेकिन उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं था. प्रवासी मजदूरों का दर्द सुनने में भी प्रदेश सरकार फिसड्डी रही. युवाओं के रोजगार छिनने और तेजी से बढ़ती महंगाई को लेकर प्रदेश की जनता में बीजेपी सरकार के प्रति असंतोष है. ऐसे कितने ही कारण हैं, जिसने प्रदेश की जनता का बीजेपी से मोहभंग कर दिया है और ये ही वजहें हैं कि भाजपा के लिये यह चुनाव जीत पाना मुश्किल लगने लगा है.

हालांकि, केंद्र सरकार कोरोना काल में फ्री राशन वितरण के लिये यूपी सरकार की कई बार सराहना कर चुकी है. वहीं, अपनी चुनावी रैलियों में योगी आदित्यनाथ कई बार ये दावा कर चुके हैं कि उन्होंने युवाओं को रोजगार मुहैया किया है, जिससे अर्थव्यवस्था में तेजी आयी है और प्रदेश में कानून व्यवस्था को बनाये रखने को लेकर भी काफी सख्ती बरती गयी है. इसके अलावा योगी हिंदुओं का वोट पाने के लिये मुस्लिम विरोधी बयानबाजी का भी इस्तेमाल कर रहे हैं.

बीजेपी को कड़ी टक्कर दे रहे अखिलेश

प्रदेश में 49 वर्षीय योगी आदित्यनाथ को इस बार 48 वर्षीय समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव कड़ी टक्कर देते दिख रहे हैं. अखिलेश यादव बीजेपी को हराने के लिये काफी मेहनत मशक्कत करते दिख रहे हैं. अपने चुनावी एजेंडे में उन्होंने मुफ्त घरेलु बिजली, गरीब महिलाओं को पेंशन, किसानों को बगैर सूद ऋण देने जैसे कई वायदे किये हैं. हालांकि, आज बीजेपी ने भी अपना मैनिफेस्टो जारी किया है, जिसमें मुफ्त बिजली और कई ऐसे ही चुनावी वायदे किये गये हैं. इस बार के चुनाव में अखिलेश की जीत की संभावना इसलिये भी ज्यादा जतायी जा रही है क्योंकि उनके साथ कई क्षेत्रीय दल भी जुड़ गये हैं.

जहां तक बीएसपी का मामला है तो मुख्य रूप से दलितों की राजनीति करने वाली मायावती भी इस बार त्रिकोणीय चुनाव का फायदा उठाकर प्रदेश में सरकार बनाने की बात कर रही हैं. हालांकि, ज्यादातर जनता इस बार उनको वोट देकर त्रिशंकु सरकार बनाने की गलती करने के मूड में नहीं दिखती. चार बार यूपी की सीएम रह चुकीं मायावती 2012 के बाद से सत्ता से दूर हैं, न पर ये आरोप लगा है कि उन्होंने प्रदेश की जनता के करोड़ों रुपये खर्च करके अपनी और कुछ अन्य मूर्तियां बनवाईं. तकरीबन दस वर्षों से सत्ता से दूर हो चुकीं मायावती पर इस बार के चुनाव में लो प्रोफाइल रहने के कारण भी जनता दांव नहीं लगाना चाहती.

यूपी चुनाव में इस बार कांग्रेस पार्टी भी

यूपी चुनाव में इस बार कुछ छोटी पार्टियों के अलावा कांग्रेस पार्टी भी मैदान में हैं. देश की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस की ओर से इस बार यूपी में सारा भार प्रियंका गांधी वाड्रा ने उठाया हुआ है. बेशक प्रियंका के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी ने बीते कई वर्षों बाद प्रदेश में अपना अस्तित्व फिर से स्थापित करने में काफी हद तक सफलता पायी है. अपनी ऊर्जा और ओजस्वी भाषणों व रैलियों की बदौलत प्रदेश में कांग्रेस ने जनता का ध्यान अपनी ओर खींचने में कामयाबी जरूर हासिल की है.

चुनाव से पहले दुष्कर्म पीड़िता के घर जाने की बात हो या फिर कोविड के दौरान प्रवासी मजदूरों को घर लौटाकर लाने के लिये बसें मुहैया कराने की या फिर लखीमपुर खीरी मामले के दौरान सामने आकर सरकार के खिलाफ आवाज उठाने की बात, प्रियंका के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी ने जनता का ध्यान अपनी ओर खींचने में कामयाबी हासिल की है. हालांकि, जमीन पर जनता का बहुत ज्यादा साथ फिलहाल कांग्रेस को नहीं मिल रहा है.

कांग्रेस को जनता का उतना साथ नहीं

बावजूद इसके, फिलहाल कांग्रेस उस स्थिति में नहीं दिखती कि यूपी की जनता उन्हें वोट दे. इसका एक सबसे बड़ा कारण माना जा रहा है प्रदेश की ​जनता का बीजेपी को सत्ता से उतारने का मन बनाना. प्रदेश के किसान, मजदूर, गरीब, युवा, सभी ने तय कर लिया है कि उन्हें किसी भी कीमत पर इस बार बीजेपी को सत्ता से दूर कर देना है. ऐसे में सपा के अलावा उन्हें दूसरी कोई भी पार्टी इस हालत में नजर नहीं आती, जो बीजेपी को कड़ी टक्कर देती दिखे. यही वजह है कि इस बार बीजेपी को सबसे ज्यादा चुनौती देने वाला चेहरा सपा प्रमुख अखिलेश यादव का माना जा रहा है.

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यूपी की सत्ता में लगातार दूसरी बार वापसी आसान नहीं

उत्तर प्रदेश को लेकर यह चर्चा आम है कि यहां 1989 के बाद से अब तक कोई पार्टी सत्ता में लगातार दूसरी बार नहीं आ पायी है. लेकिन बीजेपी और योगी आदित्यनाथ पूरी कोशिश में जुटे हैं कि किसी भी तरह से यहां इस मिथ को इस बार तोड़ा जा सके. अगर बीजेपी इस बार यह मिथ तोड़ने में कामयाब होती है तो इसे पार्टी की हिंदुत्व राजनीति और जनमत संग्रह की जीत माना जायेगा.

यूपी में जीत सभी दलों के लिये बनी वर्चस्व की लड़ाई

प्रदेश की विशाल जनसंख्या और क्षेत्र के कारण भी यूपी का चुनावी रण जीतने के लिये हर पार्टी एड़ी-चोटी का जोर लगा देती है. यूपी का चुनाव जीतना हर पार्टी के लिये करो या मरो के नारे को जीता हुआ सा प्रतीत होता है.

2022 का विधानसभा चुनाव पीएम मोदी के लिये भी सत्ता के वर्चस्व की लड़ाई मानी जा रही है. बीजेपी खुद भी मानती है कि अगर पार्टी इस बार भी यूपी की सत्ता में वापसी करती है तो इससे 2024 के लोकसभा चुनाव में केंद्र में उनकी पार्टी की सरकार बनने के रास्ते खुले हुये दिखेंगे. लेकिन अगर ऐसा करने में बीजेपी नाकाम होती है तो इसे केंद्र में बीजेपी सरकार की कमजोरी के तौर पर देखा जायेगा. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का आज का यूपी दौरा भी इसी क्रम में विपक्षी दलों के एक कदम के तौर पर देखा जा रहा है.

वहीं, अगर इस बार चुनाव में अखिलेश यादव की जीत होती है तो इसे न केवल यूपी की सत्ता में उनकी एक बार फिर से वापसी के तौर पर देखा जायेगा बल्कि ये भी माना ​जायेगा कि अखिलेश यादव सपा के नेता के तौर पर खुद को स्थापित करने में कामयाब हुये हैं. लेकिन अगर अखिलेश हार जाते हैं तो ये अखिलेश और उनकी क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन की राजनीति को भी कमजोर साबित कर देगा.

ऐसे में हर किसी की नजरें अब यूपी चुनावों के 10 मार्च को आने वाले परिणाम पर टिकी हुई हैं. देखना दिलचस्प होगा कि आखिर कौन सी पार्टी इस चुनाव में खुद को जीत का ताज़ पहनाने में कामयाब होती है!!

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