नरेंद्र मोदी की चुनौती- कैसे फिर से जीतें उत्तर प्रदेश और गुजरात

सुषमाश्री

नरेंद्र मोदी की चुनौती है – कैसे फिर से जीतें उत्तर प्रदेश और गुजरात विधान सभा के चुनाव। आने वाले इस नये साल में पार्टी को गुजरात और उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि उत्तराखंड, पंजाब, गोवा, हिमाचल प्रदेश और मणिपुर में भी अपनी चुनाव जीतना है।

उत्तर प्रदेश और गुजरात ये दोनों ही राज्य ऐसे हैं, जहां से सबसे ज्यादा सांसद लोकसभा में पहुंचेंगे, जिससे 2024 के आने वाले लोकसभा चुनाव में उनकी जीत सुनिश्चित हो पायेगी और केंद्र में एक बार फिर बीजेपी सत्ता में आयेगी। ऐसे में 2022 को माना जा सकता है कि यह 2024 में आने वाले लोकसभा चुनावों की तस्वीर साफ करने वाली होगी।

2022 के आरंभ में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, मणिपुर और गोवा में चुनाव होने हैं जबकि साल के अंत तक गुजरात और हिमाचल प्रदेश में।

1980 से ही बीजेपी देशभर में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिये जूझती रही है। ऐसे में वह 2022 में भी किसी भी राज्य में अपनी हार आसानी से मानने को तैयार नहीं होगी और इसके लिये लगातार संघर्ष करती दिखेगी।

बीजेपी केरल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और तमिलनाडु जैसे दक्षिण भारतीय प्रदेशों में अपनी जमीन बनाने के लिये लगातार प्रयासरत है ताकि उसका अस्तित्व पूरे देश में नजर आये और सही मायनों में वह देश की राष्ट्रीय पार्टी बनने का दंभ भर सके।

आने वाले 2022 के चुनावों में बीजेपी के लिये कई दशकों से उसका ‘किला’ माने जाने वाले गुजरात में भी अपनी सत्ता बचाये रखना नरेंद्र मोदी की चुनौती होगी। यही नहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के गृह राज्य का परिणाम सीधे तौर पर दोनों के अस्तित्व या कहें कि इज्जत से भी जुड़ा माना जायेगा। ऐसे में 2022 में गुजरात को बचाना भी उनके लिये एक बड़ी चुनौती साबित होने वाली है।

यहां नरेंद्र मोदी की चुनौती शब्द का प्रयोग इसलिये किया जा रहा है क्योंकि बीजेपी ने 2017 के चुनावों में ही गुजरात में बड़ी मुश्किल से अपना दशकों पुराना ‘किला’ ढहने से बचाया था। साल 1995 से ही गुजरात में लगातार बीजेपी की सरकार बन रही है। साल 2001 में जब पहली बार मोदी वहां के मुख्यमंत्री बने, उसके बाद से तो मानो बीजेपी वहां अजेय हो गयी। लेकिन 2014 में मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से बीजेपी के लिये गुजरात को मैनेज कर पाना मुश्किल हो रहा है।

1995, 1998, 2002, 2007 और 2012 के लगातार पांच विधानसभा चुनावों में राज्य में बीजेपी कुल 182 सीटों में से 115 और 127 सीटें जीतकर सरकार बनाती रही है। लेकिन 2017 के चुनाव में उनका यह आंकड़ा बुरी तरह से धाराशायी होकर 100 के नीचे यानि 99 पर आ गया। वहीं, इस चुनाव में कांग्रेस ने राज्य में 77 सीटें जीतीं। वहीं, वोटिंग प्रतिशत की भी बात की जाय तो बीजेपी को यहां 49 प्रतिशत लोगों का सपोर्ट मिला जबकि कांग्रेस को 41.5 प्रतिशत बैलेट्स का।

1995, 1998, 2002, 2007 और 2012 के लगातार पांच विधानसभा चुनावों में राज्य में बीजेपी कुल 182 सीटों में से 115 और 127 सीटें जीतकर सरकार बनाती रही है। लेकिन 2017 के चुनाव में उनका यह आंकड़ा बुरी तरह से धाराशायी होकर 100 के नीचे यानि 99 पर आ गया।

अपने मजबूत किला माने जाने वाले गुजरात में नाकामयाबी के बाद बीजेपी ने मुख्यमंत्री से लेकर पूरे कैबिनेट में ही फेरबदल कर दिया। अब बीजेपी के लिये सबसे बड़ा चैलेंज यह होगा कि एक बार फिर से आने वाले चुनाव में वह 115 से ज्यादा का अपना पुराना आंकड़ा पार कर पाये। अगर इस बार भी प्रदेश में बीजेपी सबसे ज्यादा वोट लाती है तो भगवा पार्टी को सातवीं बार लगातार यहां अपनी सरकार बनाने का गौरव प्राप्त हो सकेगा।

उत्तर प्रदेश में जीत कितनी जरूरी

उत्तर प्रदेश को देश का सबसे ज्यादा लोकसभा सीटों वाला राज्य होने का गौरव प्राप्त है। लेकिन इस बार 2022 विधानसभा चुनाव में मोदी और शाह की जोड़ी के लिये यहां जीत हासिल कर पाना आसान मालूम नहीं पड़ रहा।

साल 2013 में जब यह तय हुआ कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ही 2014 लोकसभा चुनाव में बीजेपी की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे तब उन्होंने अपने सबसे भरोसेमंद अमित शाह को पार्टी का राष्ट्रीय महासचिव बनाकर यूपी में पार्टी और मोदी की स्थिति की थाह लेने के लिये भेज दिया। उस समय पार्टी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह थे। दोनों की टीम ने मिलकर यूपी चुनावों की कमान संभाली हालांकि मुख्य तौर पर प्रदेश की कमान शाह को ही दे दी गई थी।

कुछ समय बाद मोदी ने लोकसभा चुनाव लड़ने के लिये वाराणसी लोकसभा सीट का चुनाव किया, इसके बाद यह साफ हो गया कि बीजेपी के लिये उत्तर प्रदेश और वाराणसी, दोनों ही कितने महत्वपूर्ण हो चुके थे।

“ना मुझे किसी ने भेजा है, ना मैं यहां आया हूं मुझे तो मां गंगा ने बुलाया है”, आज भी कोई भूल नहीं पाया होगा मोदी के वो शब्द, जो 2014 में पहली बार वाराणसी लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने के लिए नामांकन भरने पहुंचे नरेंद्र मोदी ने कहे थे। चुनाव में मोदी के कहे ये शब्द खूब चर्चित हुए थे और फिर चुनाव के बाद तंज कसने के लिए यही शब्द मोदी विरोधियों के काम भी आए।

देखते-देखते कैसे हॉटसीट बन गई वाराणसी

2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान वाराणसी की जिस ज़मीन और आसमान पर दिग्गजों का मेला लगा था, वहां मुकाबला पहले कभी इतना रोचक नहीं था। साल 2014 के लोकसभा चुनाव ने इस सीट को सबसे ज़्यादा आकर्षक बना दिया था।

सारा मामला घुमा फिराकर चुनावी फायदे का था। मोदी का गृहराज्य गुजरात था। देशभर में सबसे ज़्यादा लोकसभा सीटों वाले यूपी से उनका खास ताल्लुक नहीं रहा था। ऐसे में सबसे पहले उन्होंने अपने सारथी अमित शाह को बीजेपी का यूपी प्रभारी बनाकर भेजा ताकि वो नरेंद्र मोदी की जीत से तमाम कांटे हटा सकें।

अमित शाह महीनों पहले से यूपी की एक-एक सीट पर मंथन करने लगे। ये ज़िम्मा भी उन्हीं पर था कि वो मोदी के लिए एक सुरक्षित सीट खोज सकें। इस बात का भी ध्यान रखा गया कि सीट जिताऊ तो हो ही, साथ ही अहमियत की कसौटी पर वो ऐसी खरी उतरे कि आसपास के क्षेत्रों पर भी सकारात्मक प्रभाव डाले। वाराणसी ऐसी ही सीट थी। सो, मोदी के लिये शाह ने इसी सीट का चुनाव किया।

धार्मिक और ऐतिहासिक नगरी होने की वजह से वाराणसी लोकसभा सीट बीजेपी के परंपरागत विमर्श को तो पुष्ट कर ही रही थी, साथ ही पूर्वी यूपी में वाराणसी का स्थित होना भी खास था। गोरखपुर और खुद वाराणसी के अलावा बीजेपी की धमक किसी संसदीय सीट पर नहीं थी। अनुमान लगाया गया कि यदि मोदी वाराणसी से लड़ें तो गोरखपुर के साथ-साथ पूर्वी यूपी की कई सीटों पर उनके असर से वोट बीजेपी को पड़ेंगे। ज़ाहिर है, बीजेपी अपने सबसे पोस्टरब्वॉय के सहारे ही चुनाव में उतरी थी।

पूर्वी यूपी में मोदी की सीट का होना बिहार को भी प्रभावित कर सकता था। पूर्वांचल और बिहार (बक्सर, सीवान, गोपालगंज वगैरह) वैसे क्षेत्र थे, जो विकास की दौड़ में पिछड़े थे। गुजरात मॉडल के नायक के लिए केंद्र और सूबे की सरकारों को इस नुक्ते पर कोसना आसान पड़ता।

धार्मिक ध्रुवीकरण और विकास का ऐसा संगम बीजेपी को मुफीद लगा। तकरीबन 30 से 40 सीटें साधने की रणनीति बनाकर नरेंद्र मोदी को वाराणसी लाया गया।

आखिरकार हुआ वही जो संघ-मोदी-शाह ने चाहा

अमित शाह ने वाराणसी को साधने के लिए सारे जातिगत समीकरण टटोले थे। बीजेपी के परंपरागत वोटरों और मोदी के समर्थकों के अलावा भी बीजेपी को वोट मिलें, इसके लिए रणनीतिकार जुट गए। अपना दल से गठबंधन इसी हालात में किया गया। वाराणसी की 5 में से कम से कम 3 विधानसभाओं में कुर्मी वोटर प्रभावशाली हैं। अमित शाह ने अपना दल को गठबंधन का हिस्सेदार बनाकर वाराणसी की जीत सुनिश्चित कर ली।

करीने से बनाई गई रणनीतियों का नतीजा आखिरकार मोदी की जीत के रूप में सामने आया। 2014 की इसी शानदार सफलता ने वाराणसी सीट में बीजेपी और खुद प्रधानमंत्री का विश्वास बढ़ा दिया।

राज्य में विधानसभा चुनाव में कुल 403 सीटें होती हैं और 2017 के चुनाव में बीजेपी को सहयोगी दलों समेत कुल 325 सीटें मिली थीं। अकेले बीजेपी ने लगभग 40 प्रतिशत वोट लेकर कुल 312 सीटें अपने नाम कर ली थीं। जबकि इसकी सहयोगी पार्टी अपना दल को 9 सीटें और ओमप्रकाश राजभर की SBSP को चार सीटें मिली थीं। 2017 के उस चुनाव में समाजवादी पार्टी को मात्र 47 सीटें मिली थीं और उनका वोटिंग प्रतिशत 21.82 था जबकि बहुजन समाज पार्टी ने 19 सीटें जीती थीं जिसका वोटिंग प्रतिशत 22.23 प्रतिशत था।

इस बार समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव इस राजनीतिक माहौल को बदलने में जुटे हुये हैं। राजभर, जिन्होंने 2017 का चुनाव बीजेपी के साथ रहकर लड़ा था, इस बार सपा के साथ हैं। राजभर का साथ पाकर अखिलेश भगवा पार्टी के जाति समीकरण को पूरी तरह से ध्वस्त करने को लेकर आश्वस्त दिख रहे हैं।

वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं कि मोदी की भावी राजनीति के लिए बेरोज़गारी और महंगाई दो सबसे बड़ी चुनौतियाँ हैं। इन्हीं से ध्यान हटाने के लिए वह अयोध्या, केदारनाथ और काशी के चक्कर लगाने के साथ गौमाता को याद कर रहे हैं। नया साल 2022 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए बड़ी राजनीतिक चुनौती लेकर आया है। इस वर्ष के प्रारम्भ में उत्तर प्रदेश और अंत में गुजरात विधान सभा के चुनाव हैं और इन दोनों के परिणाम तय करेंगे कि मोदी 2024 में तीसरी पर सत्ता में वापस आएँगे या नहीं!

कहा जाता है कि दिल्ली का रास्ता यूपी से होकर ही गुजरता है इसलिए बीजेपी कभी भी राज्य में अपनी सत्ता खोना नहीं चाहेगी। खासकर इसलिये भी क्योंकि यहां से लोकसभा में सबसे ज्यादा, 80 सांसद पहुंचते हैं। ऐसे में साल 2022 में यूपी में अपनी जीत दर्ज करना बीजेपी के लिये और बहुत ही बड़ी चुनौती साबित होने वाली है।

2002, 2007 और 2012 का गुजरात विधानसभा चुनाव हो या फिर 2014 और 2019 का लोकसभा चुनाव, नरेंद्र मोदी ने हर बाजी पलटकर रख दी। जीत मानो उनकी साथी बन चुकी थी, लेकिन आने वाला साल 2022 और 2024 का लोकसभा चुनाव उनके लिये आसान नहीं दिख रहा। इसका एक कारण उनकी बढ़ती उम्र भी माना जा रहा है। बता दें कि 2024 के लोकसभा चुनाव तक मोदी 74 साल के हो जायेंगे। ऐसे में अगले पांच वर्षों यानि 79 की उम्र तक उनके लिये केंद्र की सत्ता और सत्ता की जिम्मेदारी का निर्वाहन आसान नहीं होगा।

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