बेरोजगारी अभिशाप है या वरदान : एक पहेली

आजादी के सात दशक बाद भी देश में बेरोजगारी का यह आलम है कि चपरासी, माली जैसे पदों के लिए भी हज़ारों की तादाद में उच्च शिक्षा प्राप्त बी ई, एम एस सी, एम बी ए, और पीएचडी होल्डर तक आवेदन करते हैं।

कोई भी राजनीतिक दल हो बेरोजगारी उनके लिए सजीवन बूटी से कम नहीं है। चुनाव दर चुनाव बेरोजगारी का मुद्दा उछाला जाता है, सरकारें बदलती हैं पर बेरोजगारी वहीं की वहीं रहती है।

कोरोना काल ने तो इस समस्या के लिए आग में घी का काम किया। असंगठित क्षेत्र की महिलाओं को सबसे ज्यादा काम से हाथ धोना पड़ा। लेकिन हमारे नेताओं को कोई फर्क नहीं पड़ता। चुनाव में उन्हें झूठे वादे ही तो करने हैं। मौजूदा वक्त में भी जिन राज्यों में चुनाव होने वाले हैं बंगाल, पॉन्डिचेरी, असम आदि वहां भी बेरोजगारी ही सबसे बड़ा मुद्दा बना हुआ है।

बिहार के चुनाव में भी सत्ता और विपक्ष दोनों ने ही बेरोजगारी के मुद्दे पर ही दांव लगाया था। आगे भी चुनाव में बेरोजगारी प्रमुख मुद्दा बनने वाला है।

तो बेरोजगारी भले ही देश के नवजवानों के लिए एक बड़ी समस्या हो पर नेताओं के लिए तो वरदान ही है।

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