आज का वेद चिंतन विचार

 ओ शु स्वसार: कारवे श्र्णोत् ययौ वो दुरादनसा सफेद रथेन नि शू नमध्व भवता सुपारा: अधो अक्षा: सिंधव: स्रोत्याभि: 3.3.11

मैं भारतीयों को लेकर जा रहा हूं ,इसलिए तुम जरा झुक जाओ ।

पहले रमधवं यानी रुको कहा था । अब वह नमध्वम यानी झुको कहते हैं।

हे नदी, तुम झुक जाओ और मेरे लिए सुपारा बनो। तुम्हारा जो प्रवाह बह रहा है, वह भले ही बहने दो ।

लेकिन मेरी गाड़ी के अक्ष के नीचे तक झुक जाओ तो मेरी गाड़ी चली जाएगी।

विश्वामित्र आगे कहते हैं कि मैं कौशिक गोत्र का हूं। मेरा नाम विश्वामित्र है।

मैं भी कौशिक गोत्र का हूं बचपन में हम बोलते थे कौशिक गोत्रउत्पन्ना अहम कुशिकस्य सुनू: ।

फिर नदियां बोल रही हैं कि इंद्र ने हमको जन्म दिया और सविता देव की प्रेरणा से हम दौड़ी जा रही हैं।

इंद्रो अस्माम अर्दद वज्र वाहुरपाहन : वृत्रं परिधिम् नदीनाम ।

विश्वामित्र कहते हैं इंद्र ने तुमको जन्म दिया ,इसलिए हम इंद्र के बड़े उपकृत हैं।

हम भगवान इंद्र की स्तुति निरंतर गाएंगे कि उसने तुम्हें दौड़ने की आज्ञा दी ।

देवताओं, में बहुत दूर से ये गाड़ियां लेकर आया हूं।

माँ का रूप हैं नदियाँ

नदियां कहती है, जैसे परिपुष्ट माता अपने बच्चे को उठाने के लिए झुक जाती है वैसे हे ऋषि,मैं तेरे लिए झुक रही हूँ।

यह एक मिसाल देकर नदी ने फिर कहा कि, जैसे कन्या पिता की सेवा के लिए झुक जाती है, वैसे ही मैं तेरी सेवा के लिए झुक रही हूँ।

हे भक्त, तेरा वाक्य हमने सुन लिया है और हम समझ गयी हैं कि तुम बहुत दूर से आये हो,इसलिए हम तेरे लिए झुक जाती हैं।

फिर नदी झुक गयी और वे सारे भारतीय पर हो गए । ऐसा यह सूक्त है। यहां पर जो मिसाले दी गई हैं, वे परम रमणीय हैं।

अत्यंत स्वभाविक तौर पर हम नदी को माता कहते हैं, कन्या नहीं कहते और विश्वामित्र ने भी पहले नदी को मां कहा था।

नदी ने भी पहले वही बात कही थी ।

इतने में उसे याद आया कि यह तो एक महान ज्ञानी ऋषि है ,जिसके पास चैतन्यमय ज्ञान पड़ा है।

हम तो उसकी कन्यायें हैं और वह हमारा पिता है ।

ये जो मिसालें दी गई हैं उन पर मैं कभी-कभी सोचता हूं तो यह भी लगता है कि मुंकिन है इसमें जो सबसे बड़ी नदी सतलज है।

वह अपने को माता और विश्वामित्र को पुत्र कहती होगीऔर छोटी व्यासअपने को कन्या और उस पिता समझती होगी।

लेकिन मुख्य बात यह है कि उन्होंने अत्यंत प्रेम दिखाया और उसके बाद परम आदर दिखाया।

माता को बच्चे के लिए प्रेम, स्नेह, वात्सल्य होता है और कन्या को पिता के लिए आदर होता है ।

विश्वमित्र के प्रति नदियों का वात्सल्य

वात्सल्य भाव से और आदर पूर्वक हम तेरे लिए झुक रही हैं ,ऐसा कहकर नदी झुक जाती है।

फिर सब भारतीयों को लेकर विश्वामित्र नदी तर गए ।उन्हें नदी से सद्बुद्धि, कृपा और आशीर्वाद हासिल हुआ ।

उन्होंने नदियों से कहा कि अब मेरा काम हो गया है। इसलिए अब तुम फिर से भर जाओ और शीघ्र दौड़ी जाओ। ऐसी कहानी है ।

अब इस प्रकार मानव की श्रष्टि पर कोई सत्ता चल सकती है, यह तो हम विज्ञान के ख्याल से नहीं मान सकते।

फिर भी हमारे यहां रिवाज है कि कहीं नदी तरने का मौका आये तो यह नदी सूक्त बोला जाता है।

ये तो मामूली नदियां है लेकिन संसार -नदी ,माया -नदी, बहुत जोरों से बह रही है और हमें उस नदी के उस पार जाना मुश्किल मालूम हो रहा है।

भवनदी पार करने के लिए अगर विश्वामित्र के समान नम्र और प्रयतनशील बन जाए तो हम भी संसार- नदी पार कर सकते हैं।

ऐसी श्रद्धा हम विश्वामित्र- नदी- संवाद से मुझे मिलती है। कुछ मंत्रों की देवता नदी है और ऋषि विश्वामित्र हैं।

तो कुछ मंत्रों का ऋषि नदी और देवता विश्वमित्र है ।ऋषि याने बोलने वाला ।

आज का वेद चिंतन
प्रस्तुति : रमेश भैया
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