आज का विचार जाके प्रिय न राम वैदेही

आज का विचार जाके प्रिय न राम बैदेही।
सो छांड़िये कोटि बैरी सम, जद्यपि परम सनेही।ब1।
तज्यो पिता प्रहलाद, बिभीषन बंधु, भरत महतारी।
बलि गुरू तज्यो कंत ब्रज- बनितन्हि, भये मुद-मंगलकारी ।2।
नाते नेह रामके मनियत सुहृद सुसेब्य जहाँ लौं।
अंजन कहा आँखि जेहि फूटै, बहुतक कहौं कहाँ लौं ।3।
तुलसी सो सब भाँति परम हित पूज्य प्रानते प्यारो।
जासों होय सनेह राम-पद , एतो मतो हमारो ।4।
-विनयावली (पद-174), संत तुलसीदास
तात्विक भाव अव्यक्त भाई जी के सौजन्य से प्रस्तुत है कि
1. जिस मनुष्य में ईश्वरभक्ति की भावना न हो या वह आध्यात्मिक वृत्ति का न हो, उसकी संगति नहीं करनी चाहिए, भले ही वह सांसारिक रूप से कितना भी समृद्ध हो और हमारे प्रति कितना भी स्नेह दिखाए।
2. बिना ईश्वरभक्ति और आध्यात्मिक वृत्ति के जो प्रेम होता है, वह सांसारिक भावनावाला और रागपूर्ण होता है। वह शीघ्र ही द्वेष में परिणत हो जाता है।3. आध्यात्मिक वृत्ति जिसमें न हो, उसका पतन अनिवार्य है। उसकी संगति में आपका भी पतन हो सकता है।
4. आत्मिक कल्याण के लिए जो साधना का मार्ग है, उसमें आपके ऐसे मित्र और परिजन भी बाधक हो सकते हैं। ऐसे में उनके कल्याण की कामना करते हुए और उनके प्रति मन में बिना कोई द्वेषभाव लाए हुए भी उनके साथ केवल निर्वाह लायक संगति ही करें।
5. और यदि वे सत्यधर्म की साधना के मार्ग इतना अधिक बाधक हो जाएँ कि छोड़ने की अनिवार्य परिस्थिति उत्पन्न हो जाए, तो उन्हें छोड़ा भी जा सकता है। जैसे, प्रह्लाद ने अपने पिता हिरणकश्यिपु को, विभीषण ने रावण जैसे भाई को और भरत ने कैकेयी जैसी माता को छोड़ा।

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