पचास साल पहले टाइम्स औफ़ इंडिया ग्रुप में सम्पादकीय माहौल कैसा था

श्री त्रिलोक दीप ने आज से चौवन साल पहले टाइम्स औफ़ इंडिया ग्रुप की पत्रिका दिनमान में काम करना शुरू किया था. इस लेख में वे बता रहे हैं कि उन दिनों टाइम्स औफ़ इंडिया ग्रुप में कौन – कौन सम्पादक / पत्रकार कार्यरत थे और क्या माहौल था.

 दिनमान के शुरू के दिनों की याद आ रही है . 

पहली जनवरी, 1966 को जब मैंने दिनमान जॉइन किया तो उसका ऑफ़िस 7, बहादुर शाह रोड स्थित टाइम्स हाउस की दूसरी मंजिल पर था .दरअसल सभी अखबारों यथा टाइम्स ऑफ इंडिया, नवभारत टाइम्स और इकनोमिक टाइम्स के संपादकीय सहकर्मी उसी एक फ्लोर पर बैठा करते थे .महाराष्ट्र टाइम्स के एकमात्र संवाददाता इंदुरकरजी भी वहीं बैठते थे .

 ब्यूरो सामान्य था .उसी जगह आपको इकनोमिक टाइम्स के सतिंदर सिंह , सुदर्शन भाटिया, सुषमा कपूर (बाद में रामचंद्रन), तो टाइम्स ऑफ इंडिया के सुभाष चक्रवर्ती और सुभाष किरपेकर के अलावा नवभारत टाइम्स के आनंद जैन, ललितेश्वर श्रीवास्तव, रघुवीर सहाय और डॉ नंदकिशोर त्रिखा दीख जायेंगे. ब्यूरो के दाहिनी तरफ चीफ रिपोर्टर जे.डी. सिंह और उनके रिपोर्टर,जिनमें प्रमुख थे बी.के.जोशी ( दोस्तों के लिये बल्ली),   के.एन . मलिक, योगेंद्र बाली, मोहम्मद शमीम,  पी.सी.गांधी, वी.के. देथे,ऊषा राव (बाद में राय), चांदनी सिंह (बाद में लूथरा), जनक सिंह आदि .उनके साथ ही समाचार संपादकों में श्रीकृष्ण, प्रकाश चंद्र, जे. एस.बुटालिया (दोस्तों में जग्गी) आदि,बायीं तरफ सत सोनी, रमेश प्रेम, माया शर्मा, प्रमुख संवाददाता रामावतार त्यागी, आर्थिक मामलों के जानकार वासुदेव झा और बीचोंबीच समाचार संपादक पंडित हरिदत्त शर्मा और धुर बायें दिनमान के सहयोगी . 

केबिन कुल जमा छह थे, शामलाल, गिरिलाल जैन (टाइम्स ऑफ इंडिया), अक्षय कुमार जैन और रामपाल सिंह (नवभारत टाइम्स) तथा मनोहर श्याम जोशी, जितेंद्र गुप्त तथा सच्चिदानंद वात्स्यायन का . दिनमान के अन्य लोग यानी श्रीकांत वर्मा, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, श्यामलाल शर्मा, योगराज थानी, रमेश वर्मा, रामसेवक श्रीवास्तव, श्रीमती शुक्ला रुद्र, जवाहरलाल कौल और मैं त्रिलोक दीप बाहर हाल में बैठते थे दूसरे अखबारों के साथियों के संग!

कहने को हम लोगों के बीच काम का बंटवारा था लेकिन हर किसी से हर काम करने की अपेक्षा रहती थी .श्रीकांत वर्मा अपनी रिपोर्ट लिखते थे, कला का कॉलम भी देखते थे जबकि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना साहित्य और रंगमंच का कॉलम देखते और चरचे चरखे भी लिखा करते थे, रमेश वर्मा विज्ञान औऱ विश्व देखते थे, रामसेवक श्रीवास्तव प्रदेश, योगराज थानी खेल और खिलाड़ी, श्यामलाल शर्मा पत्रकार संसद, श्रीमती शुक्ला रुद्र नारी जगत, जवाहरलाल कौल राष्ट्र .

मुझे शुरू में पिछले सप्ताह और ‘दुनिया भर की’ लिखने को दिया गया  यह शुरुआती दौर था .उसके बाद बहुत कुछ बदला .आज का विषय दिनमान का नहीं बल्कि उस समय के कामकाज के माहौल है जो बहुत ही खुशगवार और सुकून भरा हुआ करता था .मेरी सीट के पीछे बहुत अच्छी लाइब्रेरी थी जिसके इंचार्ज कश्मीरीलाल शर्मा थे .उनके दो साथियों एस.के. अग्रवाल और एम. एम.जैन (कवयित्री इंदु जैन के पति) के नाम याद हैं .

तीसरी मंज़िल पर जनरल मैनेजर जे. एम. डिसूजा, बिज़नेस मैनेजर रमेश चंद्र आदि प्रबंधकों का फ्लोर था . बेसमेंट में चीफ फोटोग्राफर रविब्रत बेदी,  गुरुदत्त और परमेश्वरी दयाल बैठते थे और वहीं उनका डार्करूम था .

उस समय साहू शांतिप्रसाद जैन और रमा जैन टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप का सारा बिज़नेस देखा करती थीं  .

उनकी संस्कृति और साहित्य में बहुत रुचि थी जिस के कारण वे विभिन्न विषयों की नयी नयी पत्रिकाएं निकाला करती थीं  .दिनमान निकालने का आइडिया भी उन्हीं का था और वात्स्यायन जी को उन्हीं की शर्तों पर रखने की मंजूरी भी उन्हीं की . 

उनकी निजी रुचि के चलते ही उन दिनों हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं की पत्रिकाओं ने खूब तरक्की की और नाम भी कमाया था . संपादक भी ओजस्वी और यशस्वी हुआ करते थे .

इस सुखद वातावरण का प्रभाव लोगों के सोच और मिज़ाज़ पर भी दीखता था. जिस के चलते अपने अपने काम के प्रति लोगों में समर्पण की भावना थी .हिंदी और अंग्रेज़ी के पत्रकारों में निकटता थी और कइयों के बीच गहरी दोस्ती भी थी .

वात्स्यायन जी और गिरिलाल जैन को अक्सर साथ साथ बातें करते देखा जाता था .अंग्रेज़ी और हिंदी के रिपोर्टरों में भी खूब छनती थी .

टाइम्स ऑफ इंडिया के विदेशों में तैनात विशेष संवाददाताओं से मैं विदेश जाने पर मिलता जैसे 1975 में  लंदन में मैं जे.डी.सिंह से, 1977 में बी.के.जोशी से और 1983 में के.एन. मलिक से मिला तो उन लोगों ने  मेरी भरपूर मदद की थी .मलिक ने तो मेरी मुलाकात उस समय वहां के रेडिंग में रह रहे तथाकथित खालिस्तान के प्रमुख जगजीत सिंह चौहान से तय की थी .

इस्लामाबाद में मेरी मुलाकात वी. के.देथे से हुई और हम लोग साथ साथ पेशावर भी गये थे . नवभारत टाइम्स के पंडित हरिदत्त शर्मा के साथ 1969 में लेह लद्दाख की यात्रा की थी  टाइम्स ऑफ इंडिया के प्रकाश चंद्र और जे. एस. बुटालिया के साथ  डिप्लोमेटिक पार्टियों में हम लोग अक्सर एक साथ होते .

लेकिन मेरी सब से अधिक करीबी सुभाष किरपेकर से थी  हम दोनों  एक साथ मिलकर कई प्रेस कॉन्फ्रेन्स में गये, कई महत्वपूर्ण लोगों से मुलाक़ातें कीं और पंजाब में आतंकवाद कवर किया जिसमें शम्मी सरीन ने कई तरह के जोखिम उठाकर हमारी सहायता की थी .

एक बार  हरियाणा के अधिकारी बियर की फैक्ट्री दिखाने के लिये एक प्रेस पार्टी को मुरथल ले गये जिसमें मैं और सुभाष किरपेकर भी थे .उन्होंने बियर बनाने की विधि के बारे में बताया और फैक्ट्री का चक्कर भी लगवाया  .

उसके बाद बातचीत और बियर का दौर शुरू हुआ जो काफी देर तक चला  लंच करते करते काफी वक्त हो गया .चलते समय हमें दो बोतल बियर भेंट की गयीं  .

हम दोनों ऑफ़िस आ गये . सुभाष ऊपर चले गये, मुझे नीचे प्रयाग शुक्ल मिल गये  बियर की बोतलें मेरे हाथ में थीं  मैंने उनकी तरफ और उन्होंने मेरी तरफ औऱ बोतलें प्रयाग जी के झोले में .

 एक बार मुझे एन.के. सिंह ने न्योता .उनसे मेरी पहली मुलाकात भिलाई स्टील प्लांट में हुई थी . वे तब वहां कार्मिक प्रबंधक थे   उनसे हुई बातचीत को दिनमान में सही ढंग से छापा गया था  . वे खासे प्रभावित हुए . दिल्ली में किसी नये काम में लग गये 

.मुझे एक शाम मिलने का निमंत्रण दिया   मैंने कहा कि टाइम्स का मेरा दोस्त सुभाष किरपेकर भी आयेगा . एन. के. सिंह खुश हो गये . उन्होंने अपने नये काम के बाबत बताया .

उन्होंने बहुत सेवा की .डिनर करने के बाद वहां से हम दोनों निकले  बाद में एन. के.सिंह एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया के चेयरमैन बन गये , बावजूद इसके हमारी दोस्ती में कोई फर्क नहीं आया  कभी कभी तो वे प्रेस क्लब में भी आ धमकते थे  

स्वर्ण मंदिर छत पर सुभाष किरपेकर
स्वर्ण मंदिर छत पर कैमरा में फ़िल्म लोड करते सुभाष किरपेकर

पंजाब में आतंकवाद कवर करने के लिए दिनमान से मैं औऱ टाइम्स ऑफ इंडिया से सुभाष किरपेकर अमृतसर जाया करते थे   वहां हमारा एक सहयोगी थे शम्मी सरीन . वे दिनमान के लिये नियमित संवाद भेजा करते थे  वे हम दोनों को ऐसे ऐसे लोगों से मिलवाते जिनसे मिलना आम संवाददाता के लिये पहुंचना आसान नहीं होता था  .

एक दिन सुभाष ने कहा कि इस बार चंडीगढ़ से होकर अमृतसर चलते हैं, वहां प्रेम कुमार से मिलकर आतंकवाद बाबत सरकार की नीतियों का भी जायजा ले लेंगे .हम दोनों प्रेम कुमार के घर पहुंचे तो देखा चंदन मित्रा पहले से वहां मौजूद थे  .तब  वे स्टेट्समैन में असिस्टेंट एडिटर थे . 

प्रेम कुमार के ही घर हमने रात बितायी . उनसे फीडबैक लिया और अगले दिन सुबह की ट्रेन लेकर अमृतसर के लिए रवाना हो गये . बाद में प्रेम कुमार इंडियन एक्सप्रेस के चंडीगढ़ संस्करण के संपादक हो गये  .  

उन दिनों हम लोग अमृतसर इंटरनेशनल होटल में रुका करते थे.  शम्मी सरीन को सूचित कर दिया .उसने अकाल तख्त के जत्थेदार तथा और कई लोगों से मुलाक़ातें तय कर रखी थीं . स्वर्ण मंदिर के मुख्य ग्रंथी कृपाल सिंह से मुलाकात सुभाष के लिये एक्सक्लूसिव स्टोरी सिद्ध हुई जो टाइम्स ऑफ इंडिया की बैनर है हेडलाइन बनी थी .

इससे पहले 1984 में ब्लू स्टार ऑपरेशन स्वर्ण मंदिर के भीतर से कवर करने वाले चुनिंदा पत्रकारों में सुभाष किरपेकर भी थे .बाद में जब अकाल तख्त के पुनर्निर्माण का ज़िम्मा बाबा संता सिंह को सौंपा गया तो हम दोनोँ ने कई बार उनसे मुलाकात कर कार्य की प्रगति बाबत भी चर्चा की थी .

शम्मी सरीन के माध्यम से ये सभी काम हो रहे थे . यहा तक कि हम लोग संत जरनैल सिंह भिंडरावाले के मुख्यालय मेहता चौक भी गये  शम्मी की मदद से कुछ खाड़कूओं से भी भेंट हुई थी  .

पंजाब में आतंकवाद को हम दोनों ने बहुत विस्तार से  कवर किया था  एक बार हम लोग दिन भर की भागदौड़ करने के बाद होटल पहुंचे तो सोचा थकान मिटायी जाये .

अभी हम लोग मूड बना ही रहे थे कि हमने अपने कमरे में कंपन महसूस की. वह भूचाल था .दोनों ने हाथ जोड़ कर वाहेगुरु को याद किया   हम लोग गुरू की नगरी में जो बैठे हुए थे .शाम को होता यों था कि सभी साथी पत्रकार भाई एक कमरे में इकट्ठा होकर सुस्ताते थे और अपने अपने अनुभव शेयर किया करते थे .अमृतसर में ही जाकर पता चला कि हमारे  कुछ भाई डर के मारे होटल से बाहर ही नहीं निकलते थे और साथियों से सुनकर अपनी स्टोरी फ़ाइल कर दिया करते थे .

भला हो शम्मी सरीन का कि वह हमें ऐसी ऐसी जगह ले जाता जहां आम पत्रकार जाने की हिम्मत भी नहीं जुटा सकता था.

उसकी वजह यह थी कि एक तो वह स्थानीय था और दूसरे उसका नेटवर्क बहुत ही पुख्ता था .

सुभाष किरपेकर एक ही संस्थान में काम करने वाला साथी नहीं रह गया था बल्कि अंतरंग मित्र बन गया था . एक दिन मैं अपनी बेटी को ईस्ट पटेल नगर स्थित कालिंदी कॉलेज छोड़ने के लिए गया . मैं कॉलेज के गेट पर पहुंचा ही था कि सुभाष ने मुझे देख लिया .

वह पास ही में रहता था . मैंने अपनी बेटी से उसका परिचय कराया  उसके बारे में हमारे घर में सबको पता था कि हम लोग एक साथ अमृतसर जाते हैं .

सुभाष ने छूटते ही मेरी बेटी से पूछा, अभी पीरियड में वक़्त है न .उसके हामी भरने पर वह हम दोनों को अपने घर ले गया जो कॉलेज के बिल्कुल पास था .

अपनी पत्नी से परिचय कराया और मेरी बेटी को आदेश दिया जब तुम्हारा पीरियड खाली हो यहां आ जाया करो, आंटी से गप्पें भी मारो और खाओ पियो भी .अपनी पत्नी को भी यथोचित निर्देश दे दिये . जब तक मेरी बेटी ने वहाँ से पढ़ाई पूरी नहीं कर ली वह समय मिलने पर सुभाष के घर चली जाती .उसकी आंटी से भी अच्छी ट्यूनिंग बैठ गयी थी  .

 ऐसा था मेरा अज़ीज़ दोस्त बनाम सहयोगी सुभाष किरपेकर . दिनमान 10, दरिया गंज शिफ्ट हो गया फिर भी बहुत बार हमलोग साथ साथ ही रिपोर्टिंग पर जाया करते थे .मैं दिनमान छोड़ ‘संडे मेल’ में आ गया, हमारी दोस्ती में रत्ती भर भी फर्क नहीं . मन उस दिन ज़ार ज़ार रोया था जब एक दिन उसके इस संसार से कूच कर जाने की खबर मिली . मेरे दोस्त जस्विन जस्सी के साथ भी उसकी दोस्ती का मियार हमारी दोस्ती जैसा था .हम लोगों ने अपने यार को अश्रुपूरित अलविदा कहा.

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