भारत के इस मंदिर को समुद्री यात्री कहते थे ‘ब्लैक पगोडा’

मीडिया स्वराज. यह भारत के चुनिंदा सूर्य मंदिरों में से एक है, जो उड़ीसा में जगन्नाथ पुरी से 35 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में कोणार्क शहर में स्थित है. यह मंदिर ओडिशा की मध्यकालीन वास्तुकला का अनोखा नमूना है.

नई दिल्ली: कहा जाता है कि हमारा देश प्रकृति और भौतिक दोनों ही प्रकार से विश्व का एक अद्भुत एवं अनोखा राष्ट्र है. इस देश की संस्कृति और कला, सभ्यता और आचरण सभी कुछ इसकी इस विशेषता को उच्चकोटि बनाने में सफल और सहायक हैं. हमारे देश की संस्कृति और कला विश्व की एक प्राचीन संस्कृति और कला में से एक है. जैसा की सभी जानते है कि भारत में ऐसे कई एतिहासिक मंदिर हैं, जो सदियों से लोगों के आकर्षण के केंद्र बने हुए हैं. इन्हीं में से एक कोणार्क का सूर्य मंदिर. आइए जानते है कोणार्क का सूर्य मंदिर का इतिहास और उस से जुड़ी मान्यता

चुनिंदा सूर्य मंदिरों में से एक

 यह भारत के चुनिंदा सूर्य मंदिरों में से एक है, जो उड़ीसा में जगन्नाथ पुरी से 35 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में कोणार्क शहर में स्थित है. यह मंदिर ओडिशा की मध्यकालीन वास्तुकला का अनोखा नमूना है और इसी वजह से साल 1984 में यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर स्थल घोषित किया है. वैसे तो यह मंदिर अपनी पौराणिकता और आस्था के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध है, लेकिन इसके अलावा और भी कई वजहें हैं, जिनकी वजह से इस मंदिर को देखने के लिए दुनिया के कोने-कोने से लोग यहां आते हैं.

मंदिर का निर्माण अब तक है एक रहस्य

लाल रंग के बलुआ पत्थरों और काले ग्रेनाइट के पत्थरों से बने इस मंदिर का निर्माण अब तक एक रहस्य ही बना हुआ है. हालांकि ऐसा माना जाता है कि इसे 1238-64 ईसा पूर्व गंग वंश के तत्कालीन सामंत राजा नरसिंह देव प्रथम द्वारा बनवाया गया था. वहीं, कुछ पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस मंदिर को भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब ने बनवाया था. 

मुख्य मंदिर तीन मंडपों में बना

कोणार्क का मुख्य मंदिर तीन मंडपों में बना है. इनमें से दो मंडप ढह चुके हैं. वहीं, तीसरे मंडप में जहां मूर्ति स्थापित थी, अंग्रेजों ने स्वतंत्रता से पूर्व ही रेत और पत्थर भरवा कर सभी द्वारों को स्थायी रूप से बंद करवा दिया था, ताकि मंदिर और क्षतिग्रस्त न हो पाए.

समुद्री यात्रा करने वाले मंदिर को कहते थे ‘ब्लैक पगोडा’

एक समय में समुद्री यात्रा करने वाले लोग इस मंदिर को ‘ब्लैक पगोडा’ कहते थे, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि यह जहाजों को अपनी ओर खींच लेता था, जिसकी वजह से वह दुर्घटनाग्रस्त हो जाते थे. इसके पीछे कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं. कहा जाता है कि इस मंदिर के शिखर पर 52 टन का एक चुंबकीय पत्थर लगा हुआ था, जिसके प्रभाव से वहां समुद्र से गुजरने वाले बड़े-बड़े जहाज मंदिर की ओर खिंचे चले आते थे, जिससे उन्हें भारी क्षति हो जाती थी. कहते हैं कि इसी वजह से कुछ नाविक उस पत्थर को निकालकर अपने साथ लेकर चले गए.

52 टन का पत्थर मंदिर में केंद्रीय शिला का काम कर रहा

पौराणिक कथाओं के अनुसार, 52 टन का वह पत्थर मंदिर में केंद्रीय शिला का काम कर रहा था, जिससे मंदिर की दीवारों के सभी पत्थर संतुलन में थे. लेकिन इसके हटने के कारण, मंदिर की दीवारों का संतुलन खो गया और इसकी वजह से दीवारें गिर पड़ीं. हालांकि इस घटना का कोई एतिहासिक विवरण नहीं मिलता है और ना ही मंदिर में किसी चुंबकीय पत्थर के अस्तित्व का ही ब्यौरा कहीं उपलब्ध है.

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