मौलिक अधिकारों के खिलाफ है यह फैसला : प्रशांत भूषण

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सवाल उठ रहे हैं। सवाल देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को लेकर है।

सुप्रीम कोर्ट ने शाहीन बाग में सीएए और एनआरसी के खिलाफ चल रहे धरने को लेकर जिस तरह की टिप्पणी की है उससे सिविल सोसायटी में गहरी मायूसी है।

आखिर धरना-प्रदर्शन तो लोगों का जनतांत्रिक अधिकार है तो फिर सुप्रीम कोर्ट ने धरना-प्रदर्शन और आंदोलन पर जिस तरह का फैसला दिया है, इससे सरकारों को आंदोलन व प्रदर्शन पर रोक लगाने की एक तरह से अधिकार दे दिया है।

पुलिस और प्रशासन आखिर धरना-प्रदर्शन की इजाजत क्यों देगा, सत्ता और व्यवस्था के खिलाफ. आंदोलन लोगों का जनतांत्रिक अधिकार है, सरकार को जगाने का भी और प्रशासन को सचेत करने का भी।

जनादेश लाइव में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर चर्चा हुई। वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र तिवारी ने चर्चा का संचालन किया। चर्चा में हिस्सा लिया मशहूर वकील प्रशांत भूषण, समाजशास्त्री प्रो. आनंद कुमार और जनादेश के संपादक अंबरीश कुमार ने।

देखें जनादेश लाइव की चर्चा

https://youtu.be/SZ_lxxBL1oQ

राजेंद्र तिवारी ने चर्चा की शुरुआत में कहा कि लोकतंत्र में असहमतियां, विरोध व प्रतिरोध की जगह होती है और इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि सार्वजनक स्थानों को बहुत देर तक रोका नहीं जाना चाहिए, उस पर कब्जा नहीं किया जाना चाहिए।

शाहीन बाग के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया।

सवाल उठता है कि चीजें किस दिशा में जा रही हैं और यह सवाल बहुत महत्त्वपूर्ण है।

प्रशांत भूषण ने चर्चा में हिस्सा लेते हुए कहा कि पहले तो हमें यह समझना होगा कि हमारा संविधान इस बारे में क्या कहता है।

संविधान में मौलिक अधिकार आर्टिकल 19 में यह है कि शांतिपूर्ण तरीके से जमा होना और बोलने की आजादी हमारे मौलिक अधिकार हैं।

तो प्रोटेस्ट का अधिकार भी इसी में आता है। इस मौलिक अधिकार को रेस्टिक्ट किया जा सकता है।

तर्कपूर्ण रोक लगाए जा सकते हैं, लेकिन सिर्फ राष्ट्रीय सुरक्षा और पब्लिक ऑर्डर के आधार पर।

कल जो फैसला आया है सुप्रीम कोर्ट का कि आप सड़कों पर नहीं कर सकते, लंबे समय पर नहीं कर सकते और कोई खास जगह पुलिस चिन्हित कर सकती है धरना-प्रदर्शन व आंदोलन के लिए।

तो यह सीधा-सीधा मौलिक अधिकारों के खिलाफ है।

प्रशांत भूषण का कहना था कि संविधान पीठ का पुराना फैसला है हिम्मतलाल शाह का जिसका जिक्र इस फैसले में किया गया है, जिसमें साफ-साफ लिखा था कि इस तरह की रोक, पुलिस या सरकार नहीं लगा सकती।

ट्रैफिक का मूवमेंट पब्लिक ऑर्डर में नहीं आता है। ट्रैफिक का संचालन करना है तो पुलिस उसे कर सकती है।

शाहीन बाग में जो आंदोलन हो रहा था, मैं वहां गया था और मैंने देखा था कि बहुत चौड़ी सड़क थी और उसके छोटे से एक हिस्से में आंदोलन चल रहा था।

सड़क काफी चौड़ी थी और वहां से ट्रैफिक आसानी से संचालित की जा सकती थी, बगैर किसी दिक्कत के।

गाड़ियां की आवाजाही में परेशानी नहीं होती, अगर कायदे से ट्रैफिक को संभाला जाता तो।

आंदोलन करने वालो कोई रोक नहीं लगा रहे थे। वहां तो पुलिस ने बैरिकेड और रस्सियां वगैरह लगा दी थी जिससे ट्रैफिक वगैरह पूरा ही रुक जाए।

इसलिए सुप्रीम कोर्ट का यह जो फैसला आया है संविधान और हमारे मौलिक अधिकारों के खिलाफ है।

प्रो. आनंद कुमार का मानना था कि लोकतंत्र किसी भी समाज की अंदरूनी ताकत और क्षमता के आधार पर बढ़ने वाले पौधा है।

खाली पौधे को लगाने से काम नहीं चलेगा। धरीती अगर बंजर है तो खाद-पानी डालने की जरूरत पड़ेगी।

यह बात जिस दिन यानी 26 नवंबर, 1949 को संविधान समर्पित किया गया, उसी समय दोनों रष्ट्र नायकों ने अपने अंतिम संबोधन में कहा।

संविधान सभा के अध्यक्ष डा. राजेंद्र प्रसाद और ड्राफ्टिंग समिति के अध्यक्ष डा बीआर आंबेडकर ने कहा कि रजनीतिक समानता दे पा रहे हैं लेकिन सामाजिक और आर्थिक समानता के बिना इस अंतरविरोध को बर्दाश्त करना बड़ा मुश्किल होगा।

या तो सामाजिक-आर्थिक मोर्चों पर समानता की तरफ बढ़ना और नहीं तो राजनीतिक व आर्थिक असामनता के बीच में रजनीतिक समानता का पौधा कुम्हलाने लगेगा, सड़ने लगेगा।

लेकिन पिछले चालीस साल में हमने क्या किया, हमारे मध्य वर्ग ने, हमारे राजनीतिक वर्ग ने। जैसे-तैसे सत्ता मिल जाए।

संविधान की मर्यादा की चीथड़ा-चीथड़ा हमने किया।

चुनाव आयोग की शिकायतें देख ले, एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफार्म देख लें।

मुझे तो यह कहने में गुरेज नहीं की अगर प्रशांत भूषण सरीखे मुट्ठी भर लोग न हों तो संविधान को जानने वाले भी राजा का बाजा बजाने में व्यस्त हो जाएंगे।

अंबरीश कुमार का कहना था कि लोकतंत्र पर जिस तरह का हमला हो रहा है वह हम रोज देख रहे हैं।

लखनऊ में विधानसभा के सामने तीस साल से प्रदर्शन होता था।

मायावती आईं तो उसके बाद से वह जगह हटा दी गई. अब रोज पिटाई हो रही है, लाठियां बरसाई जा रही हैं। जो भी आता है पिटाई हो रही है।

प्रदर्शन की जो जगहें थीं वह दस-बारह किलोमीटर दूर कर दी गईं हैं कि वहां कोई जाता ही नहीं है।

उन्होंने प्रशांत भूषण से सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के फैसलों पर सवाल किया तो प्रशांत भूषण ने कहा कि हाईकोर्ट के फैसले सुप्रीम कोर्ट से बहुत बेहतर रहे हैं।

इलाहाबाद हाईकोर्ट, कर्नाटक हाईकोर्ट, मुंबई हाईकोर्ट या फिर दिल्ली हाईकोर्ट इनका प्रदर्शन सुप्रीम कोर्ट से बहुत बेहतर रहा है और यह चीज आपातकाल के जमाने में भी देखी गई थी।

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