गंगा उठो कि नींद में सदियां गुजर गयीं

विश्व बैंक के पैसे और अंधी धार्मिकता से गंगा को निर्मल कर पाना बहुत बड़ी चुनौती है।

कृष्णदत्त पालीवाल

आधुनिकता से उपजा विकास और प्रगति का जो दंभी दावा है, उससे गंगा को बचाना होगा। ‘विकास’ का पूरा ढांचा प्रकृति-विनाश पर खड़ा है और इसी से वन-पर्वत सभी उजड़ रहे हैं। महानगरीय सभ्यता-संस्कृति का मैलापन गंगा के प्राणों को निकाल रहा है। इसलिए गंगा-मंत्रालय को गंगा को बचाने के लिए कई कोणों से सोचना होगा। इस दृष्टि से भी सोचना होगा कि गंगा के ग्लेशियर क्यों कमजोर पड़ कर मरियल हो रहे हैं? भारतीय जन-जीवन का गंगा पर जो अडिग आस्था-विश्वास रहा है, उसे वैचारिक तल की तह तक जाकर सोचना-समझना होगा। विश्व बैंक के पैसे और अंधी धार्मिकता से गंगा को निर्मल कर पाना बहुत बड़ी चुनौती है।

महाकवि कालिदास की एक प्रसिद्ध उक्ति ध्यान में आती रहती है कि संदेह के अवसरों पर अंत:करण की आवाज को प्रमाण मानना चाहिए। ठीक बात है, लेकिन आत्मबोध, ज्ञान-बोध दोनों के बीच संदेह झूल रहा है। यह संदेह संस्कृति रूपी चित्त की खेती को बर्बाद करने का जाल बिछा रहा है। विश्वास का अंत कर रहा है और संशय सभी को ढहाए दे रहा है। भारतीय जन मानस की अवधारणा का अर्थ ही समझ से परे हो गया है और लोक में आलोक न पाकर अंधकार उमड़ रहा है। मन का संदेह कह रहा है कि भारतीय जन को जीवन देने वाली गंगा नदी का क्या होगा? गंगा की चिंता को लेकर नई सरकार गंगा मंत्रालय बना कर शीर्षासन कर रही है। गंगा की सफाई को लेकर चर्चा राजीव गांधी ने 1986 में शुरू की थी और बना डाला गंगा एक्शन प्लान। इस प्लान में अरबों रुपया स्वाहा हो गया और नतीजा कुछ नहीं निकला। पैसे के पुजारी आरती उतारते रहे और गंगा की देह जलती रही। देश की कुबुद्धियां कहती रहीं कि गंगा धार्मिकता से जुड़ी है और यह धार्मिकता बेहद एकांगी है। पता नहीं चल रहा है कि धर्म और धार्मिकता का क्या अर्थ है? क्या पाठ-विमर्श है? क्या तात्पर्य वृत्ति है? क्या पार्टनर की पॉलिटिक्स है? सोच का क्या अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र औऱ मिथकशास्त्र है? क्योंकि मेरे जैसे व्यक्ति के लिए गंगा केवल नदी नहीं है- जीवन है, संस्कृति है, हिमालय के इतिहास से नाभिनाल जुड़ी अविरल रस धारा है।

इतिहास गवाह है कि इस देश में अंग्रेजों के आने के बाद नदियों, तीर्थों, पर्वों, उत्सवों मेले-ठेले आदि के प्रति हमारे मन में अंधी आधुनिकता का पागलपन आ गया है। हम गंगा को ‘गंगा मैया’ कहने की खिल्ली उड़ाने लगे और कहने लगे कि गंगा कोई मैया-वैया नहीं है- अन्य नदियों की तरह एक नदी है; इस नदी पर हिंदू धर्म में अनेक मिथक बने हैं; ये सभी झूठे और लाचार मिथक है; गंगा नदी को ‘धर्म’ में घेरना हिंदुओं की साजिश है और उसमें स्नान-ध्यान ढोंग और अज्ञान प्रतिदिन हिंदू गंगा की पवित्रता के गीत गाता है; साहित्य लिखता है; कला-दर्शन, इतिहास, भूगोल की प्रज्ञापारमिता का भाष्य रचता है; इस भाष्य भाषा ने गंगा के साथ प्रकृति के संबंध को समझने में बाधा खड़ी कर दी है।

इस तरह गंगा चिंतन पाश्चात्य चिंतन नहीं है। पश्चिमी चिंतन पर भरोसा करने वाले लोकाचार, शिष्टाचार भूल कर लोक-जन की गंगा-भक्ति का उपहास करते हैं। उन्हें यह मिथक समझ में नहीं आता कि गंगा विष्णु के अंगूठे से निकली है, ब्रह्मा के कमंडल में निवास कर चुकी है और उसे लोक देवता शिव ने अपने सिर पर धारण किया है। लाड़-प्यार में पली गंगा सिर चढ़ी है। इस गंगा की महिमा के गीत रामायण, महाभारत, वेद, पुराण गाते हैं तुलसीदास के साथ अब्दुल रहीम खानखाना गाते हैं। रहीम तो भारत से बाहर जन्मे थे, पर उनके मन में गंगा ऐसी रची-बसी कि उसे सिर पर धारण करने का वरदान मांगा। उन्होंने लिखा ‘अच्युत चरण तरंगिणी शशिशेखर मौलि मालती माले’ और अनुवाद किया ‘अच्युत तरन तरंगिणी शिव शिर मालती माल’। रहीम की गंगा-विनय किसी मजहब की श्रेष्ठता का गान नहीं है- वह लोक-हृदय की भाव-भूमि का पवित्र विस्तार है।

आज गंगा सफाई अभियान के समय हमें उसकी समाजशास्त्रीय पृष्ठभूमि का लोक और शास्त्र दोनों की दृष्टि से ‘विमर्श’ करना चाहिए। गंगा को राजनीतिक हाथों में न सौंप कर एक नए आधुनिक भाव-बोध के बौद्धिक समाज के हाथों में सौंपना चाहिए। यह समाज चेतना मानती रही है कि गंगा ने विराट जन-समूह की सामूहिकता को संवारने गढ़ने का कार्य किया है। गंगा की यात्रा इस देश के सामूहिक मन की अंतर्यात्रा है। गंगा सफाई अभियान ही अकेला क्यों? सभी नदियों को कचरा-मुक्त करने का संकल्प लेना होगा। इस संकल्प को लेने का कारण यह है कि गंगा के इतिहास के साथ कई इतिहास नाभिनाल जुड़े हैं। यह यमुना प्रयाग में गंगा के गले मिलकर पता नहीं क्या-क्या कह रही है। इस गंगा का एक इतिहास राम की नदी सरयू से जुड़ा है- इसका यश ‘सीय राममय सब जग जानी’ का दर्शन इस देश को देता रहा है। इसी नदी में बुद्ध का अमृत जल है। विद्यानिवास मिश्र ने ‘हम और हमारी नदियां’ शीर्षक निबंध में यह ध्यान दिलाया था कि ‘गंगा में एक इतिहास नारायणी या गंडकी का भी है। गंडकी एक क्वांरी नदी है, क्वांरी है इसलिए प्रबल है, अनियंत्रित है, पर इसके बावजूद वह नारायण को प्रिय है। नारायण उसकी धार की तोड़ से बने पत्थरों में रहते हैं। तब वे शालिग्राम कहलाते हैं। नदी का एक नाम इसीलिए शालिग्राम भी पड़ गया है।

इस गंगा से एक इतिहास क्वांरे सोन का भी जुड़ता है, जो बारात लेकर नर्मदा मैया को ब्याहने गया और यह कह कर बारात वापस ले आया कि लड़की की जात छोटी है, कन्या का कुल छोटा है। बस, नर्मदा नाराज हो गई, उसने सोनभद्र का गर्व झाड़ दिया और विपरीत दिशा में भागती चली गई। कुलदंभी सोन से कोई समझौता नहीं किया। इस मिथक पर नारी विमर्श वालों ने कभी ध्यान नहीं दिया। ध्यान देने पर इस मिथक से तमाम जाति, धर्म, कुल-गोत्र-वंश की परतें खुलेंगी। यह सोचने को मिलेगा कि क्यों सोन विंध्याचल में ही मारा-मारा फिरता रहा। उसे वह गंगा मिली, जो पहले से ही परितृप्त थी, सरयू के कारण। सोन को भाग्य फूटे पठार मिले- उसकी कुलीनता का दंभ पठार बन गया। लेकिन गंगा कहीं न झुकी, न रुकी न कुलीनता का दंभ किया, वह सबकी होकर सबमें रची-बसी और अनथक सागर तक गतिमान रही।

गंगा ने एक से अनेक का भाव अपना कर अपने को अनेक धाराओं में बांटा, अनगिनत तीर्थ बनाए, अनेक मृतात्माओं को तार दिया। हम कैसे भूल सकते हैं कि महात्मा गांधी का अस्थि-विसर्जन प्रयाग में किया गया। शिव के सिर चढ़ी गंगा, हिमालय की कन्या है, इसलिए लोकमंगल के प्रति सदैव समर्पित है। वह इस देश की कृषि-संस्कृति का न जाने कब से प्राण रही है और अन्न के अक्षय भंडार की अन्नपूर्णा भी। ब्रह्मा के ज्ञान कमंडल को त्याग कर निकली गंगा आज तड़प रही है- लाचार हो रही है। बांधों ने उसका खून चूस लिया है और कानपुर जैसे नगरों ने चमड़े का कचरा डाल कर उसके प्राण लेने की तैयारी की है। गंगा गंदगी से पट गई है, हमारे कुकृत्यों का मैल उसे मारे डाल रहा है। हम भूल गए हैं कि गंगा मैया तो हमें जीवन देती है। गंगा के लिए जब तक माता भाव नहीं आएगा, तब तक गंगा को साफ नहीं किया जा सकता। आजादी के आंदोलन के दिनों में हम सब गाते रहे- ‘गंगा उठो कि नींद में सदियां गुजर गईं’। आज उस नवजागरण की सांस्कृतिक चेतना के प्रति हम विमुख क्यों हैं? इसलिए कि जो भाव आदमी को गंगा बना देता था, वह भाव ही उपभोक्तावादी संस्कृति, बाजारवाद, भूमंडलीकरण के दांव-पेंचों में भटक गया है।

इधर गंगा से विपरीत दिशा में बहने वाली नर्मदा का बुरा हाल है। नर्मदा तप-त्याग और विक्षोभ की धारा है। इसका इतिहास परशुराम और कार्तवीर्य, परमारों, कलचुरियों से जुड़ा है। नर्मदा की क्वांरी पवित्र चोट से पत्थर ओंकारेश्वर हो गया, नर्मदेश्वर जन्म ले गए और इसकी घाटी में विक्रमों, मालवों, राष्ट्रकुटों का विजय अभियान धन्य हो गया। इसने भारतीय सभ्यता-संस्कृति-परंपरा के इतिहास को उदात्त गरिमा से चमका दिया। स्मृति की खुली खिड़की से कोई कह रहा है कि भूलो मत, गोदावरी के किनारे हमारे राम की पंचवटी है और कावेरी-कृष्णा के किनारे दक्षिण भारत के भक्ति आंदोलन का भक्ति-रस। गाना चल रहा है- स्नान के साथ कि गंगा-यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिंधु, कावेरी इन सभी नदियों का जल एक साथ मिले उसी से स्नान-जप-तप हो। हमारी संस्कृति में नदियों के जल के बिना न पूजा होती है, न उपासना, न कोई यज्ञ, न कोई ज्ञानसत्र चलता है। जल ही ब्रह्म है, रस ही जीवन है। इसी अभिप्राय में गंगा कर्म है, गंगा धर्म है, गंगा ज्ञान है, गंगा भाव है, गंगा तप है, गंगा परंपरा और गंगा संस्कृति है। इसी महाभाव से सभाएं करनी चाहिए। आंदोलन चलाना चाहिए, ताकि गंगा में गंदगी डालने की मानसिकता को बदला जा सके।

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डॉ. राममनोहर लोहिया ने ‘नदियों’ पर लेख लिखा और पूरे देश में गंगा को बचाने की आवाज उठाई। काका साहब कालेलकर ने ‘हम और हमारी नदियां’ पुस्तक लिख कर नदी मातृक संस्कृति में एक नया भाव-बोध जागृत किया। जीवन भर यह विचार जीवित रखा कि नदी का हमारी संस्कृति में महत्व अनेक कारणों से रहा है। हमारा अधिकतर व्यापार नदी-मार्गों से होता था और हर नदी संगम पर सुरक्षा की व्यवस्था रहती थी। गंगा हमारी पूरी जीवन-प्रणाली है। प्राचीन साहित्य में विशेषकर पुराण साहित्य में नदियों को पुराण पुरुष या विराट पुरुष की नाड़ी कहा गया है। उनसे ही देश की भौगोलिक, भावनात्मक, सांस्कृतिक, मिथकीय एकता को आधार मिलता रहा। जल ही ब्रह्म है, हमारे नर के नारायण जल में ही निवास करते हैं। यह मिथक अनेक भाष्य लिए है कि गंगा तो विष्णु के पैरों से निकली है। गंगा की इस महिमा को लोक और शास्त्र दोनों गाते हैं। ‘रामचरित मानस’ में राम केवट संवाद इसका लोक-प्रमाण है। हम जिन वनवासियों, गंगातटवासियों को अज्ञानी समझते हैं, वे कैसे अद्भुत ज्ञानी हैं, उनके पास लोक से प्राप्त ज्ञान है। आज की उत्तर आधुनिकता लोक-संस्कृति और लोक परंपराओं को मिटाने पर आमादा है। बड़े-बड़े शहर गंगा के प्राणों में जहर घोल रहे हैं। हमारे शहरी मानस में गंगा के प्रति वह पवित्र भाव ही नष्ट हो चुका है और हम गंगावरण और गंगाधर शिव का वह मिथक ही भूल चुके हैं, जिसमें हमारी जातीय स्मृति का निवास रहा है।

औपनिवेशिक आधुनिकता में गर्क उपभोक्तावादी संस्कृति के नर-नारियों के लिए यह पाठ पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है कि गंगा का एक बड़ा समाजशास्त्रीय अर्थ है, जो इस देश के इतिहास-भूगोल, साहित्य से जुड़ा है। भारतीयों के लिए वह नदी मात्र नहीं है, मूल्यचेतना है। एक ऐसा कीमती विचार है, जिसे छोड़ कर हमारा जीवन चल ही नहीं सकता। आधुनिकता से उपजा विकास और प्रगति का जो दंभी दावा है, उससे गंगा को बचाना होगा। ‘विकास’ का पूरा ढांचा प्रकृति-विनाश पर खड़ा है और इसी से वन-पर्वत सभी उजड़ रहे हैं। महानगरीय सभ्यता-संस्कृति का मैलापन गंगा के प्राणों को निकाल रहा है। इसलिए गंगा-मंत्रालय को गंगा को बचाने के लिए कई कोणों से सोचना होगा। इस दृष्टि से भी सोचना होगा कि गंगा के ग्लेशियर क्यों कमजोर पड़ कर मरियल हो रहे हैं? भारतीय जन-जीवन का गंगा पर जो अडिग आस्था-विश्वास रहा है, उसे वैचारिक तल की तह तक जाकर सोचना-समझना होगा। विश्व बैंक के पैसे और अंधी धार्मिकता से गंगा को निर्मल कर पाना बहुत बड़ी चुनौती है।

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