वर्तमान में किसानों की लागत भी नहीं निकल रही है

-एड. आराधना भार्गव

देश भर के किसान दिल्ली की तरफ कूच कर रहे है। आखिर सरकार को यह समझना होगा कि वर्तमान में रवि की फसल की बोनी चल रही है, किसानों को अपने खेतों में बोई गई फसल में पानी भी देना है, कड़ाके की ठण्ड भी पड़ रही है। खेत, परिवार, प्रदेश छोड़कर आखिर किसान आन्दोलन क्यों कर रहा है? ताला बन्दी के दौरान सरकार ने, तीन किसान विरोधी विधेयक लाये और बिना विपक्ष को सुने आनन फानन में तीन विधेयक को कानून का रूप दे दिया। पंजाब का किसान इस कानून का विरोध लगभग तीन महा से कर रहा है।

केन्द्र की सरकार का समर्थन करने वाले राजनैतिक दल सरकार से अलग हो गए, तब भी सरकार के कान पर जूँ तक नही रेंगी। किसान आन्दोलन किसी भी सरकार के लिए बड़ी चेतावनी के तौर पर खड़ा है, जो भारत की जनता तथा सरकार को यह संदेश दे रहा है कि सत्ताधीश भारत की जनता की मंशा के खिलाफ अपनी मर्जी से ना तो देश चला सकते है, और ना ही मन मर्जी से कानून बना सकते है। वर्तमान में जिस तरीके से कृषि मंत्री या प्रधानमंत्री तीन कानून का प्रचार करते घूम रहे है, एक भी किसान उनकी बातों का समर्थन नही कर रहा है कारण स्पष्ट है कि तीनों कानून कृषि विरोधी तथा पूँजीपति को लाभ पहुँचाने वाले है। कल मुझे एक किसान मिला उसने मुझसे कहा कि सरकार ने पूरी तरीके से किसान को पूँजीपतियों का गुलाम बना दिया है, मैने पूछा कैसे? तो उसने उत्तर दिया कृषि प्रधान देश में किसान के पास पहले अपने खुद के बीज थे, गोबर से खाद बनाता था, कुएँ, तालाब, नदी से मोट के माध्यम से खेतों में सिंचाई करता था।

गांव व शहर में अपनी फसल बेचकर अपना जीविका उपार्जन करता था, याने किसान के हाथ में अपना बीज, पानी, खाद् तथा बाजार था, किन्तु वर्तमान में सरकार ने किसान को पूरी तरीके से पूँजीपति का गुलाम बना दिया है। किसान अगर अपने घर में रखे हुए आनाज की बोनी करता है तो फसल नही उगती। रासायनिक खाद दुगने दाम पर खरीदने पर मजबूर है, बिजली बहुत मेंहगी तथा पैसे देने के बाद भी बिजली पूरे तरीके से नही मिलती। कड़कड़ाती ठण्ड में रात में बिजली का इंतजार करते खेत में ठिठुरता रहता है।

फसल पैदा होने पर मण्डी व्यवस्था चैपट होने पर ओने-पोने दाम पर उसकी फसल लूटने पर पूँजीपति उतारू है। उस किसान ने मुझसे कहा कि इसके विपरीत देखिये अडानी और अम्बानी के पास उनके अपने बीज है, खाद की फैक्ट्रीयाँ उनकी है, बिजली का उत्पादन वे करते है, आनाज संग्रहण हेतु उनके पास अपने गोदाम है। अडानी के पास मालगाड़ी तथा हवाई पट्टी है, अब बाजार भी सरकार ने पूँजीपति के हवाले कर दिया। किसान को जिन्दा रखने की एक भी चीज उसके पास नही है याने किसान बीज, खाद, पानी, बिजली, बाजार किसी में भी आत्मनिर्भर नही है, ऐसी स्थिति में किसान के समाप्त होने का रास्ता सरकार ने स्पष्ट कर दिया। उपर से तीन किसान विरोधी कानून किसानों की जमीन किसानों के हाथ से निकल जाए इसलिए बनाए गए है।

ठेका खेती का कानून किसान को उसके खेत में बन्धुवा मजदूर बना देगा क्योकि किसान अपनी मर्जी से अपनी शर्तो पर फसल नही लगा सकता उद्यौगपति जिस फसल के उत्पादन का आदेश देगा वही फसल किसान को लगानी होगी। उद्यौगपति किसान को बीज एवं खाद् तो अवश्य देगा किन्तु उत्तम गुणवत्ता की फसल पैदा करना किसान की जिम्मेदारी होगी। उद्यौगपति और सरकार दोनों यह अच्छी तरीके से जानते है कि उत्तम गुणवत्ता कि फसल की पैदावार के लिए फसल के अनुकूल वातावरण होना चाहिए।

अतिवृष्टि, ओलावृष्टि, सूखा, पाला यह किसान के हाथ में नही होता। अत्यधिक मेहनत करने के पश्चात् भी अगर किसान ने उत्तम गुणवत्ता की फसल पैदा नही की तो उद्यौगपति उल्टा उसके खिलाफ मुकदमा दायर कर देगा, तथा मुकदमा लड़ते उसकी जिन्दगी निकल जायेगी, मुकदमा लड़ने में उसकी जमीन भी बिक जायेगी। आईये हम सब मिलकर किसानों के साथ खड़े रहे तथा हमारा अन्नदाता जिन्दा रहे और भारत में पुनः कम्पनी राज स्थापित ना हो सके इसलिए बिना किसान कि सहमति या चर्चा किये बगैर बनाए गए तीन किसान विरोधी कानून को रद्द करने की मांग के साथ अपनी सहमति देते हुए किसान आन्दोलन का समर्थन करें।

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