तीर्थंकर भगवान महावीर

संविधान
डॉ0 रवीन्द्र कुमार

तीर्थंकर महावीर (599-527 ईसा पूर्व), वर्तमान में जैन परम्परा धर्म और दर्शन के, जिसके मूल में जीवन और उसकी निरन्तरता की अनिवार्य शर्त अहिंसा है, चौबीसवें एवं अन्तिम तीर्थंकर थे। सर्वोच्च, सनातन, स्वाभाविक और शाश्वत मानवीय मूल्य अहिंसा-आधारित इस परम्परा के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव ऋषभनाथ अथवा आदिनाथ थे; इस परम्परा को उनके जीवनकाल में मुनि के नाम से जाना जाता था। तदुपरान्त यह परम्परा यतिअर्हत‘” और निग्रन्थ‘” नामों से भी सम्बोधित हुई। अन्तिम तीर्थंकर महावीर के जीवन और उनके बाद इसके लिए जिन‘” शब्द प्रयुक्त हुआ। जैन‘” शब्द जिन‘ से ही बना है और इसका अर्थ है, इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करने वाला। 

प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ ऋषभदेव से बाइसवें तीर्थंकर नेमिनाथ तक (जिनके सम्बन्ध में यह कहा जाता है कि वे 3200-2200 ईसा पूर्व की समयावधि में लगभग एक हजार वर्षों तक पृथ्वी पर रहे) प्रमुखतः अहिंसा और सम्बन्धित व्यवहारप्राणिमात्र के प्रति सक्रिय सद्भाव और जीवन शुद्धता, तीर्थंकरों के जीवन, कार्यों एवं विचारों के केन्द्र में रही। इस हेतु उन्होंने लोगों को प्रेरित किया। इसके माध्यम से जीवन में शान्ति और प्रगति के मार्ग से आगे बढ़ते हुए इसे सार्थक बनाने का मानवाह्वान किया। आत्मा के मोक्ष स्थिति को प्राप्त होने की कामना की। 

नेमिनाथ के उत्तराधिकारी तेइसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ (872-772 ईसा पूर्व), जो ऋषभदेव और महावीर के बाद जैन तीर्थंकर परम्परा में सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं, ने “चातुर्यामधर्म व्यवस्था स्थापित कर जैन दर्शन को एक नया और अभूतपूर्व आयाम दिया। अहिंसा को सर्वोच्च रखने के साथ ही उन्होंने (व्यक्तिगत और सामाजिक, दोनों, स्तरों पर) सत्यानुसरण, अस्तेय (भावनात्मक-व्यावहारिक, दोनों रूपों में चोरी न करना, कुदृष्टि न रखना तथा जो वस्तु दी न गई हो, उसकी इच्छा न रखना) और अपरिग्रह (असंचय भावना के साथ ही व्यावहारिक अनासक्ति अमोह रखना) को मानव-जीवन की सार्थकता के उद्देश्य से प्रस्तुत किया। ज्ञान-विज्ञान की अभूतपूर्व उन्नति वाले वर्तमानकाल में चातुर्याधर्म से जुड़े चारों नियम साधारण जान पड़ सकते हैं। लेकिन, स्वयं अहिंसा मूलक ये सभी नियम तीर्थंकर पार्श्वनाथ के जीवनकाल में तो अतिमहत्त्वपूर्ण थे ही, आजतक भी पूर्णतः प्रासंगिक और सर्वकल्याणकारी हैं। जीवन सार्थकता के लिए इनकी महत्ता और प्रासंगिकता कभी लेशमात्र भी फीकी नहीं पड़ सकती।

चौबीसवें तीर्थंकर वर्धमान महावीर ने, जैसा कि हम जानते हैं, पार्श्वनाथ द्वारा प्रस्तुत चातुर्याधर्म को विस्तार दिया। उन्होंने, ब्रह्मचर्य को इसमें जोड़ते हुए, इसे पञ्चमहाव्रत के रूप में स्थापित किया। ब्रह्मचर्य पालन, आत्मनियंत्रण द्वारा आत्मानुशासन का श्रेष्ठ माध्यम है; मस्तिष्क और काया पवित्रता शुद्धता एवं स्वस्थता का उत्तम मार्ग है। मानवाचरण को सुदृढ़ कर मनुष्य में नैतिकता के स्तर को ऊँचा उठाने का माध्यम है। तीर्थंकर महावीर द्वारा, इस प्रकार, चातुर्याधर्म को “पञ्चमहाव्रत के रूप में विस्तार देकर पुनर्स्थापित करना मानव-कल्याण के दृष्टिकोण से अति उत्तम कार्य था।

तीर्थंकर महावीर ने “रत्नत्रय सम्यक दर्शन (विवेक के साथ देखना-समझना), सम्यक ज्ञान (यथार्थ ज्ञान) और सम्यक चरित्र (समुचित व्यवहार) को जीवन में उतारने का मानव का आह्वान किया। रत्नत्रय (त्रिरत्न ) के माध्यम से मनुष्यता को उच्चतम स्तर पर ले जाने की अपेक्षा की। 

तीर्थंकर महावीर स्वयं अहिंसा की पराकाष्ठा थे। तीर्थंकर ने जिस प्रकार अहिंसा को स्वयं अपने जीवन में प्रतिष्ठित किया, वह अभूतपूर्व था,और आजतक भी अतुलनीय है। इस सम्बन्ध में मैं महावीर स्वामी के लिए कहा करता हूँ, हम भारतवासियों को गर्व है कि अहिंसा की पराकाष्ठा के पोषक-पालक महावीर की जन्मभूमि भारत हैहमने अपने महावीर की भूमि पर जन्म लियायह हमारा सौभाग्य है।” मैं गर्व के साथ यह भी कहता हूँ, पृथ्वी पर महावीर जैसा उनसे पहले कोई उत्पन्न नहीं हुआकदाचित,  कोई अन्य महावीर इस धरा पर कभी उत्पन्न नहीं होगा।”

तीर्थंकर महावीर के जीवन, कार्यों, विचारों और मानव-कल्याणकारी सन्देशों के साथ सनातन-शाश्वत, सर्वोच्च और स्वाभाविक मानवीय मूल्य अहिंसा का वैभव जुड़ा हुआ है। अहिंसा स्वयं महावीर के साथ सम्बद्ध होकर धन्य है।

तीर्थंकर महावीर ने अपने सन्देशों वार्तालापों में जिस प्रकार अनेकान्तवाद को उजागर किया (तदुपरान्त जो जैन दर्शन के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण मूल सिद्धान्तों में से एक बनकर उभरा), वह, वास्तव में, महावीर स्वामी की भारतीय दर्शन परम्परा को एक बहुत बड़ी देन रही। यही नहीं, उनके अनेकान्तवाद के साथ जुड़े “स्यादवाद (सप्तभंगी विचार, जो सत्य को समझने, समझाने और अभिव्यक्त करने का सापेक्षित   सिद्धान्त है) और “नयवाद” (जो वस्तु अंश द्वारा उसके बोध हेतु अपनाई जाने वाली पद्धति के उपयोग, तदनुसार दूसरे के विचारों को समझने के प्रयत्न से सम्बद्ध है) भी भारतीय दर्शन की सम्पन्नता के लिए इसके कोष में वृद्धि हेतु श्रेष्ठ योगदान स्वरूप है।

तीर्थंकर महावीर के वार्तालापों से उभरा अनेकान्तवाद बहुलतावाद सिद्धान्त सत्य को देखने-समझने की वास्तविकता को प्रकटकर्ता एक अति शुभ और श्रेष्ठ विचार है। अति संक्षेप में इस सिद्धान्त का सार यह है कि यद्यपि सत्य एक ही है, लेकिन भिन्न-भिन्न कोणों से देखने पर सत्य पृथक-पृथक रूप में समझ में आता है। एक ही दृष्टिकोण से सम्पूर्ण सत्य को जानने-समझ लेने की बात वास्तविक नहीं है।

यह सिद्धान्त, वैदिक विचार “एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति सत्य एक ही हैबुद्धिमान जन उसेतो भी,  विभिन्न नामों से सम्बोधित करते हैं” (अथवा सत्य एक है, लेकिन उसे विभिन्न रूपों में देखा-समझा जाता है), के समान ही दृष्टिकोण सामंजस्य के सर्वकल्याणकारी मार्ग को प्रस्तुत करता है। दृष्टिकोण सामंजस्य के अभाव में इससे मुँह मोड़ लेने की स्थिति में, व्यक्तिगत से वैश्विक स्तर तक अनेकानेक समस्याएँ जन्म लेती हैं। दृष्टिकोण सामंजस्य की अस्वीकार्यता की स्थिति में उत्पन्न समस्याएँ विश्व के समक्ष गम्भीर कठिनाइयाँ खड़ी करती हैं और कभी-कभी तो मानवता के समक्ष भयावह स्थिति प्रस्तुत करती हैं। परिणाम केवल विनाश होता है। इसलिए, सौहार्द, शान्ति और विकास की सुनिश्चितता के लिए सर्व-कल्याण हेतु आगे बढ़ने के लिए दृष्टिकोण सामंजस्य नितान्त आवश्यक होता है। इस सम्बन्ध में तीर्थंकर भगवान महावीर द्वारा अनेकान्तवाद के माध्यम से दिखाया गया मार्ग सदा प्रासंगिक, सर्व-कल्याणकारी और अनुकरणीय है। महावीर स्वामी प्रदत्त यह सिद्धान्त अहिंसा मूलक है; साथ ही, मानव-विश्व को उसके कल्याण के उद्देश्य से प्रदान की गई एक ऐसी अभूतपूर्व देन भी है, जिसकी महत्ता-प्रासंगिकता कभी कम नहीं होगी।

*पद्मश्री और सरदार पटेल राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित डॉरवीन्द्र कुमार भारतीयशिक्षाशास्त्री एवं मेरठ विश्वविद्यलयमेरठ (उत्तर प्रदेशके पूर्व कुलपति हैं I

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