बात कारूं के ख़ज़ाने की

कारूं
पंकज प्रसून, वरिष्ठ पत्रकार

बेहिसाब दौलत का जब भी जिक्र आता है तो अक्सर कारूं के ख़ज़ाने का मुहावरे के तौर पर इस्तेमाल होता है।

हिन्दी में यह मुहावरा फारसी से आया । उर्दू-फारसी के किस्सों में कारूं का उल्लेख कारून के रूप में मिलता है-एक अमीर जो अत्यधिक कंजूस था और शापग्रस्त होकर अपनी दौलत समेत  धरती में समा गया था।

वैसे मुहावरे के तौर पर उर्दू में इसका मतलब हुआ मालदार होने के साथ कंजूस भी होना। अंग्रेजी में भी कारूं का उल्लेख क्रोशस के रूप में है और मुहावरे के तौर पर ऐज़ रिच ऐज़ क्रोशस वाक्य प्रचलित है।

सवाल उठता है कारूं का खजाना महज़ किस्सागोई है या हकीकत ?

दरअसल  कारू, कारून या क्रोशस नाम का इन्सान सचमुच था और एशिया माइनर ( समझें की आज का तुर्की-टर्की ) में ईसा से 560 साल पहले लीडिया नामक मुल्क का बादशाह था जिसकी सीमाएं भूमध्य सागर, एजियन सी और कालासागर तक थीं।

लीडियन साम्राज्य की राजधानी सार्डिस थी जिसकी समृद्धि के खूब चर्चे थे। काले जादू से संचालित काफ़िर विद्या , सोने की खानों और नदियों से बहकर आते स्वर्ण कणों की बदौलत वह उस जमाने का सबसे दौलतमंद राजा था । ऊपर से घमंडी भी। अमीरी की ख़ुमारी में न सिर्फ खुद को दुनिया का सबसे सुखी इन्सान समझता बल्कि चाहता था कि लोग भी ऐसा ही मानें ।

 ग़ौरतलब है कि स्वर्णप्रेम की वजह से दुनियाभर में विख्यात (कुख्यात?) ग्रीक कथाओं का अमर चरित्र राजा मिडास इसी कारूं का पुरखा था । कारूं को लालच, स्वर्णप्रेम और घमंड अपने पुरखे से विरासत में मिले ।

आज के तुर्की, सीरिया, जार्डन, निकोसिया, जार्जिया और आर्मीनिया जैसे देश कारूं के साम्राज्य का हिस्सा थे । लीडिया की ज़मीन सचमुच सोना उगलती थी । न सिर्फ सोना बल्कि चांदी भी ।

कारूं की दुनिया को एक बड़ी देन है टकसाली सिक्कों की । इससे पहले सिक्के ढाले नहीं जाते थे बल्कि ठोक-पीटकर बना लिए जाते थे । कारूं ने जो स्वर्णमुद्रा चलाई उसे इलेक्ट्रम के नाम से जाना जाता था और उसमें सोने की शुद्धता को लेकर बेहद सावधानी बरती जाती थी ।

कारूं ग्रीस की ( प्राचीन आयोनिया-यवन-यूनान ) की सभ्यता-संस्कृति का दीवाना था । ग्रीस यानी यूनान पर कब्ज़ा करने वाला पहला एशियाई विदेशी भी उसे ही माना जाता है।

कारूं ने लीडिया पर 595 BC से 547 BC तक राज किया था ऐसा माना जाता है।

उसके बारे में कुरआन में आयत  है कि उसकी दौलत जमींदोज हो गई ठीक उसी तरह से जैसे रावण की लंका ज़मीन में चली गई थी।

कारूँ बादशाह के पास जो दौलत आई थी वो उसने काफ़िर विद्या के सहारे जमा की थी और इसी बूते पर वह न केवल सबसे धनी व्यक्ति बनने की लालसा रखता था अपितु समूचे विश्व पर भी अपना अधिकार जमाना चाहता था।

परन्तु उसका काफ़िर जाल पकड़ा गया और जब उसने अपनी दौलत लोगों में बांटनी चाही तो लोगों ने उसकी श्रापित और ज़ुल्म से इकठ्ठा की गई दौलत को लेने से मना कर दिया और फिर उसने चमड़े में सोने की मेख डालकर लोगों को देनी चाही और लोगों से ये कहा कि तुम इसे चमड़ा समझ कर रखो।

अतः उसने सिक्के चलाए थे और ऐतिहासिक प्रमाण देखें तो भी यही ज्ञात होता है कि कारूँ ही ऐसा बादशाह था जिसने सबसे पहले सिक्के ढालने का काम किया था तो इसके पीछे की वजह ज़रूर दौलत बांटना ही रहा होगा। कारूँन को काफ़िरविद्या  सिखाने वाले सौदागर-महाजन-बनिये थे।

कारूँन को creosus भी कहा जाता था जिसने पर्शिया के बादशाह सायरस के सामने आत्मसमर्पण किया था। सायरस का पोता XERXES Ist था जो एकीमेनिड  साम्राज्य का चौथा बादशाह था । जिसने थरमोपोली का युद्ध “battle of Thermopylae”  स्पार्टा राज्य के राजा Leonidas Ist के साथ लड़ा था जिसपर हॉलीवुड की “300” नामक फ़िल्म भी बनाई गई है।

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