यादों के झरोखे से : किस्से अटल जी के

त्रिलोक दीप
त्रिलोक दीप

त्रिलोक दीप , वरिष्ठ पत्रकार, दिल्ली 

इस फोटो की एक दिलचस्प कहानी है। गाहेबगाहे मैं अटल बिहारी वाजपेयी जी से मिलता रहता था। कभी दिनमान के लिए कोई  इंटरव्यू करने या किसी संवाद पर उनकी टिप्पणी या प्रतिक्रिया लेने के लिये अथवा उनके पास फुर्सत होने पर लोकसभा के दिनों की याद ताजा करने के लिये। जी हां, अटल जी मुझे लोकसभा के दिनों से जानते थे। कभी हंसकर कह दिया करते थे कि पुरानी जान पहचान का लाभ अब दिनमान को इस मायने में हो रहा है कि जिस किसी से भी बात करना चाहो, आपको कोई मना नहीं करता। आज अटल जी कुछ विनोदी मूड में थे। बोले, लिखो। आज मैं जो डिक्टेट करूंगा वही लिखोगे और हूबहू वैसा ही छापोगे। आप पत्रकारों की आदत पड़ गयी है तोड़मरोड़ कर चीज़ें छापने की।तुम लोग तो कभी हमारे मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से गलतफहमियां पैदा कर दोगे या मेरी पार्टी के भीतर। जब मैंने कहा कि मुझ से तो कभी ऐसी गुस्ताखी नहीं हुई तो बोले मैं आपको विशेष तौर पर नहीं कह रहा हूं, आपकी बिरादरी में और लोग भी तो हैं।

फिर बोले लिखो। मैंने अपनी नोटबुक निकली तो बोले लिखो मैं पहले भारतीय जनसंघ और अब भारतीय जनता पार्टी का समर्पित कार्यकर्ता हूं तो अचानक उनकी नज़र मेरी नोटबुक पर पड़ी। बोले, यह तो तुम लांगहैंड में लिख रहे हो, शॉर्टहैंड नहीं आती क्या। मैंने कहा कि सीखी थी, प्रैक्टिस न होने से आदत छूट गयी। पिछले दिनों तुम्हारा एक पत्रकार भाई आया था वह शॉर्टहैंड में मेरा इंटरव्यू लिख रहा था।

मैंने अटल जी को बताया था कि पीटीआई में सुनील रॉय जैसे कुछ पत्रकार हैं जो शॉर्टहैंड में लिखते हैं। जब वह संसद कवर करते हैं वहां भी शॉर्टहैंड में प्रमुख भाषण शब्दशः लिखते हैं ताकि उद्धरणों को सही और सटीक तरीके से पेश किया जा सके।आम तौर पर न्यूज़ एजेंसी में काम करने वाले रिपोर्टरों से शॉर्टहैंड सीखे होने की उम्मीद की जाती है। आपने पार्लियामेंट्री रिपोर्टर भी देखे होंगे जो अध्यक्ष जी के आसन के सामने वाली मेज़ पर बैठ सदन की कार्यवाही शॉर्टहैंड में लिखते रहते हैं। एक साथ दो रिपोर्टर वहां बैठते हैं, एक अंग्रेज़ी का औऱ दूसरा हिंदी का। जब  1957 में पहले पहल आप  सांसद बन कर आये थे तब दो भाषाओं के ही रिपोर्टर होते थे। अब अटल जी ने रिपोर्टर वाला प्रसंग छोड़ते हुए कहा कि तुम जिस तरह की मर्यादा का ख्याल रखते हो, उसी पर अटल रहना। विस्फोटक पत्रकारिता के चक्कर में मत आना। उनके पास दिनमान किसी स्टोरी के सिलसिले में उनका मत जानने गया था। उन्होंने अपनी टिप्पणी दे दी।उन्होंने कहा अब नोटबुक बन्द करो, कुछ पुराने दिनों की बातें करते हैं।

अटल जी ने बताया कि जब भी लोकसभा की कार्यवाही के लिए आता आपसे दुआ सलाम हो जाती थी। बाद में प्रकाश वीर शास्त्री ने बताया कि काम तो आप बेशक़ यहां के सचिवालय में करते हैं लेकिन लिखने पढ़ने का भी शौक रखते हैं। मैं विपक्षी बेंच की अगली सीट पर बैठता था जबकि प्रकाशवीर जी दूर पीछे वाली सीट पर। वह निर्दलीय सदस्यथे। उन्होंने एक दिन बताया कि जब कभी हम दोनों एक विषय पर या अलग अलग विषयों पर बोलते हैं तो तुम सदन में देखे जाते हो, यह कैसे संभव है। मैंने उन्हें बताया था कि जिस ब्रांच में मैं काम करता हूं उस के काम के सिलसिले में या तो मुझे किसी सांसद से मिलने के लिए आना होता है या बड़े टेबल पर बैठे अपने अधिकारी को कोई फ़ाइल देने के लिये। फ़ाइल देने का काम वॉच एंड वार्ड स्टाफ कर देता है। अगर मैं आपको, प्रकाश वीर जी को या प्रोफेसर हीरेन मुकर्जी को बोलते हुए देखता हूं तो आप लोगों का स्पीच सुनने लगता हूं। इनर लॉबी में आने के लिए हमारे पास हरे रंग का एक टोकन होता है जिसे दिखाकर हमें अंदर आने की अनुमति होती है। अटल जी ने जब पूछा कि आपको कैसे पता चलता है कि जब मैं और प्रकाशवीर जी एक विषय पर बोलते हैं तो नोट्स एक दूसरे को कैसे देते हैं। मैंने कई बार देखा था कि समय कम होने के कारण जब आपके कुछ पोइंट्स रह जाते थे तो ऐसे पुर्ज़े आप प्रकाशवीर जी की तरफ बढ़ा दिया करते थे।मैंने उन्हें यह भी बता दिया कि लोकसभा में रहते हुए ही मैंने पुनः लिखना शुरू कर दिया था।

मुझे बीच में टोकते हुए अटल जी ने मुझे बताया कि वह मुझे और सांसदों के साथ भी बातचीत करते हुए अक्सर देखा करते थे। उन्होंने कुछ सांसदों के नाम भी बताये। जब अटल जी लोकसभा के सांसद थे उस समय सरदार हुकम सिंह उपाध्यक्ष थे और विपक्षी सदस्यों की पहली सीट पर बैठते थे। तब वह अकाली पार्टी के थे। उन्हीं को उपाध्यक्ष निर्वाचित करते हुए लोकसभा में तय हुआ था कि भविष्य में उपाध्यक्ष का पद विपक्षी पार्टी को जाएगा। सरदार हुकम सिंह की हर पार्टी में बहुत इज़्ज़त थी। अटल जी बता रहे थे।

अटल जी को याद था कि हर हफ्ते गैरसरकारी कार्यसूची के बिलों और संकल्पों को समय देने के लिए एक बैठक हुआ करती थी जिसकी अध्यक्षता सरदार हुकम सिंह किया करते थे और अटल जी उस कमिटी में सदस्य थे। समिति के सभी सदस्यों को इकट्ठा कर मैं मीटिंग के लिए लाया करता था। ऐसी ही एक मीटिंग के बाद मैंने सरदार हुकम सिंह से उनके यात्रा संस्मरणों को अंग्रेज़ी से हिंदी में अनुवाद करने की अनुमति ले ली थी जो उस समय स्पोक्समैन वीकली में छपा करते थे।ऐसे कुछ संस्मरण अटल जी की नजरों से गुजरे थे जो तब धर्मयुग और साप्ताहिक हिंदुस्तान में प्रकाशित हुए थे। एक दिन अटल जी को सरदार हुकम सिंह ने बता दिया कि उनके यात्रा संस्मरणों का मैं ही हिंदी में अनुवाद करता हूं। यह जानकर अटल जी को अच्छा लगा औऱ मुझे उनका आशीर्वाद भी प्राप्त हुआ। प्रकाश वीर शास्त्री ने भी मुझे बधाई देते हुए हर तरह की सहायता का विश्वास बताया था। उस दिन लोकसभा के दिनों की और भी बहुत बातें की थीं।

अटल बिहारी वाजपेयी जी के सामने मैंने कबूल किया कि दिनमान में हर उस सांसद या उनके मंत्री बन जाने में मदद की। लोहिया जी के इंटरव्यू के बारे में उन्हें बताया। एक अन्य प्रसंग में मैंने अटल जी को बताया था कि उस समय के लोकसभा महासचिव श्यामलाल शकधर, जो मुख्य निर्वाचन आयुक्त के पद से  रिटायर हुए थे, ने भी दिनमान के लिए मुझे कई विशेष स्टोरियां दी थीं। आकाशवाणी में जिस प्रकार श्री माहेश्वरी वार्ताकारों को इकट्ठा किया करते थे वह भी उन्हें स्मरण था। एक बार तो पंजाब में आतंकवाद पर चर्चा करने के लिए अटल जी के अतिरिक्त इंद्रकुमार गुजराल, हरकिशन सिंह सुरजीत और दरबार सिंह शामिल हुए थे। उस समय इस चर्चा को आकाशवाणी की सर्वोत्कृष्ट चर्चा बताया गया था। अटल जी के अकेले में भी मैंने आकाशवाणी पर कई इंटरव्यू किये थे। बाद में मुझे माहेश्वरी जी ने जानकारी दी कि जब कभी भी अटल जी से अकाशवाणी पर आने का निवेदन किया जाता तो उनसे बातचीत करने के लिए वह मुझे ही बुलाने का आग्रह किया करते थे। बाद में अटल जी बहुत व्यस्त रहने लगे थे बावजूद इसके वह मुझसे मिलने का वक़्त निकाल ही लिया करते थे। ऐसे थे अटल जी जो दूर से देख कर ही मुझे अपने पास बुला लिया करते थे। उनकी इन सुनहरी औऱ बेशकीमती यादों को सादर नमन।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और संडे मेल हिंदी  साप्ताहिक  के कार्यकारी संपादक रह चुके हैं. 

 

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