जब अर्थव्यवस्था अपने पराभव पर है तब सोने के भाव आसमान पर क्यों हैं?

अखिलेश श्रीवास्तव

ये कहानी पीले धातु की है. सोने की है. दुनिया की अर्थव्यवस्था के इतिहास की है. दुनिया के मौद्रिक व्यवस्था की है. अमेरिका की आर्थिक समृद्धि का है. आधुनिक सभ्यता और मनुष्यता के विनाश की भी है.

कोरोना काल में जब अर्थव्यवस्था अपने पराभव पर है तब सोने के भाव आसमान छू रही है. यह पहली बार नहीं हुआ कि सोने के भाव तेजी से बढ़े हैं. जब जब मंदी आई है दुनिया में सोने का भाव बढ़ा है. पर सवाल यही है कि ऐसा क्यों हुआ है? ऐसा क्यों है कि सोना पैसे के गिरते मूल्य को रोकता है? यानी सोने में निवेश मुद्रास्फीति का सबसे मजबूत प्रतिरोध क्यों है? जबकि इसके निवेश पर कोई आय संभव नहीं है क्योंकि यह एक मृत संपत्ति है! यानी यह बैंकों में सावधि जमा या शेयर बाजार की तरह नहीं है जहाँ से आपको कोई आय मिलने की सम्भावना हो?

निवेश के रूप में सोना हमेशा से विविध निवेश सूचि का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है. जबकि लघु अवधि में सोना का मूल्य परिवर्तनशील रहा है लेकिन लम्बी अवधि में इसने हमेशा निवेशकों के पैसों के मूल्य को मुद्रास्फीति की मार से बचाये रखा है जब शेयर और बांड के बाजार ने कागज के रुपये के मूल्य पर नकारात्मक प्रभाव पैदा किया है. सोना सदियों से सबसे रोकड़ संपत्ति रहा है यानी इसे दुनिया की किसी भी मुद्रा से आप बदल सकते हैं.

सोने का यह चरित्र समझने के लिए आपको सोने और सोने के मानक (gold standard) का इतिहास समझना पड़ेगा. सोने का सबसे पहले सिक्कों के रूप में उपयोग टर्की ने ईसा से ६०० साल पूर्व किया था. उस वक्त पैसे का मूल्य सोने के सिक्कों में निहित सोने के वजन में होता था. इसकी वजह से इंग्लैंड, स्पेन और पुर्तगाल ने कोलम्बस और दूसरे खोजकर्तावों को दुनिया के तमाम हिस्सों में सोने की खोज करने भेजा.

१८२१ में इंग्लैंड ने सोने के मानक को लागू किया फिर अमेरिका में यह १८३४ में लागू हुआ. सोने के मानक का मतलब होता है कि मुद्रा का मूल्य सोने से बंधा रहता है. यानी रिज़र्व बैंक एक तय मूल्य पर एक तय वजन का सोना कागज के रुपये से बदलने का वादा करती थी.

१८४८ में जॉन सतर के खान में सोने के मिलने के बाद अमेरिका में मुद्रास्फीति बढ़ गई. तब १८६१ में पहली बार अमेरिका में कागज की मुद्रा मुद्रित की गयी। १९०० में गोल्ड स्टैण्डर्ड एक्ट लागू किया गया जिसके द्वारा सोने का मूल्य २०.६७ डॉलर प्रति औंस यानी 31.१०३४८०७ ग्राम तय की गयी. दूसरे देशों ने इसी तरह अपनी अपनी मुद्रा का सोने से मूल्य तय किया और इस प्रकार डॉलर के साथ दूसरी मुद्राओं का विनिमय का अनुपात तय हो गया. १९१३ में अमेरिका में सोने और डॉलर में संतुलन बनाये रखने के लिए फ़ेडरल रिज़र्व (रिज़र्व बैंक) की स्थापना हुई.

इस व्यवस्था की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि यह सरकारों को नए नोट मुद्रित कर अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति को बढ़ने से रोकती थी. जब देशों के बीच व्यापर होता था तो जो देश अधिक मूल्य की वस्तुओं का किसी देश को निर्यात करता था और आयात कम मूल्य का होता था तो वह देश शेष मूल्य सोने में भी ले सकता था. इस तरह अगर अमेरिका किसी देश में निर्यात अधिक करता था और आयात कम तो अमेरिका में सोने के ख़ज़ाने में वृद्धि हो जाती थी तो अमेरिका काजग के नोटों की आपूर्ति अर्थव्यवस्था में बढ़ा देता था. दरअसल यह सब कुछ लेखा प्रविष्टि से हो जाया करता था क्योंकि अमेरिका बहुत से देशों के सोने का संरक्षक था.

जब प्रथम विश्व युद्ध शुरू हुआ तब युद्ध के खर्चे उठाने के लिए नए मुद्रा के मुद्रण की जरुरत महसूस हुई तब सोने के मानक पर स्थापित व्यवस्था चरमरा गयी. इसके बाद १९३० में महामंदी आ गयी, तब सोने के मानक की व्यवस्था को पूरी तरह से तिलांजलि देनी पड़ी. कुछ अर्थशास्त्री तो सोने के मानक को ही अर्थव्यवस्था में महामंदी आने का कारण मानते हैं. हालाँकि मिल्टन फ्रीडमन कहते हैं कि फ़ेडरल रिज़र्व ने अंतराष्ट्रीय व्यापार में सरप्लस और जिसके फलस्वरूप सोने के रिज़र्व में बढ़ोतरी के बावजूद मुद्रा की आपूर्ति अर्थव्यवस्था में नहीं बढ़ाई जिससे आर्थिक महामंदी आयी और वे प्रमाण सहित यह भी कहते हैं कि महामंदी का कारण अमेरिका था. मिल्टन फ्रीडमन की व्याख्या को ही अब दुनिया में महामंदी का सबसे सही कारण माना जाता है. इंग्लैंड १९३१ और अमेरिका १९३४ में सोने में मानक से मुक्त हुआ.

१९४४ में ब्रिटन वुड्स एग्रीमेंट (The Bretton Woods Agreement of 1944) द्वारा दुनिया कि सभी मुद्राओं का सोने के अनुपात में मूल्य निर्धारण हुआ. वर्ल्ड बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष कि स्थापना हुई. उस समय अमेरिका के पास सबसे ज्यादा पूरी दुनिया का लगभग तीन चौथाई सोना था. अतः बहुत से देशों ने अपनी मुद्राओं को डॉलर से ही अनुपात तय कर दिए. एक औंस सोने की कीमत तय की गई $३५. इस प्रकार सोने की मानक डॉलर मानक में बदल गई. कहतें हैं कि इससे अंतर्राष्ट्रीय व्यापार चलने में आसानी हुई.

रिचर्ड निक्सन के ज़माने में १९७१ में मुद्रास्फीति जनित मंदी के समय डॉलर को सोने से बिलकुल मुक्त कर दिया. डॉलर का मूल्य कम करने की वजह से अमेरिका के लोगों ने सोने खरीदने शुरू किये और सोने का भाव आसमान में चला गया. इसने ब्रिटन वुड्स एग्रीमेंट को समाप्त कर दिया. आज दुनिया के देशों के रिज़र्व बैंक मुद्रा की आपूर्ति बगैर किसी मानक के तय करते हैं पर उस मुद्राओं का डॉलर से बंधा होना एक तरह का मानक का ही काम करता है. पर फिर भी हर रिज़र्व बैंकों के पास अपने सोने के भंडार हैं.

अब अगर आप और भी समझना चाहते हैं कि क्यों सोने का भाव चढ़ता ही गया है तो जरा विभिन्न देशों के सोने के रिज़र्व की तरफ झांक लें. कहतें हैं की अब तक दुनिया में लगभग १७४,१०० टन सोने की खुदाई हुई है. दुनिया के कुछ देशों के पास सोने के रिज़र्व इस प्रकार हैं,

अमेरिका 8,133.5. टन, जर्मनी 3,366.8. टन, इटली 2,451.8. टन, फ्रांस 2,436.१ टन, रूस 2,219.२ टन, चीन 1,936.५ टन, स्विट्ज़रलैंड 1,040.0 टन, जापान 765.२ टन.

अतः कोई आश्चर्य नहीं कि पिछले १०० सालों में सोने का भाव किसी भी धातु या वस्तु से ज्यादा बढ़ा है.

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