भारत-चीन के बीच फिर युद्ध क्यों नहीं चाहते चीनी सैनिक वांग छी

बालाघाट, मध्य प्रदेश 

 पूर्वी लद्दाख में दोनों देशों की सेनाएं आमने- सामने युद्ध के मुंहाने पर आ खड़ी हुई है। एक छोटी सी घटना दोनों देशों को युद्ध की आग में झोंक सकती है। भारत और चीन के बीच युद्ध जैसे हालात बन जाने से आम लोगों के साथ वह लोग बेहद चिंतिंत नजर आ रहे है, जो आज भी 1962 के भारत-चीन युद्ध की विभिषिका को झेलने को मजबूर है।ऐसे ही एक इंसान का नाम  है वांग छी। 1962 के युद्ध में चीन सैनिक के तौर पर शामिल होने वाले वांग छी युद्ध के बाद धोखे से भारत की सीमा में घुस आए। गलती से चीन की सीमा पार करने वाले वांग छी कई साल जेल में गुजराने के बाद आज भी एक युद्धबंदी के तौर पर मध्यप्रदेश के बालाघाट जिले में रह रहे है।

 1962 की लड़ाई में चीनी सैनिक के रूप में लड़ने वाले वांग छी के दिल में आज भी युद्ध के जख्म ताजा है। सीमा पर एक बार फिर युद्ध के हालात बने जाने से 81 साल के वांग छी बैचेने हो उठे है।भारत-चीन के बीच सीमा पर तनाव पर वांग छी गुस्से में इसे जबरन का झगड़ा बताते हुए कहते हैं कि पहाड़ के लिए लड़ना कहां सही है। वह कहते हैं कि चीन के लोग भी कभी युद्ध नहीं चाहते है। चीन की आम जनता को लेकर इससे कोई मतलब नहीं है, वह इसे बड़े लोगों का काम बताते है।

वांग छी कहते हैं कि दोनों देशों को युद्ध से बचाना चाहिए क्योंकि इसे किसी का भला नहीं होता है। भारत और चीन के बीच तनाव पर वांग छी कहते हैं कि चीन की आम जनता लड़ाई नहीं चाहती है और चीन के लोग कभी भी युद्ध के पक्ष में नहीं रहते है। चीन वापस जाने की आस लगाए बैठे वांग छी कहते हैं कि भारत और चीन दोनों देशों को बातचीत के साथ इस मुद्दें पर हल निकालना चाहिए।

धोखे से भारत में आ गए थे वांग छी – 1962 के भारत-चीन युद्ध में चीनी सैनिक के तौर पर लड़ने वाले पूर्व चीनी सैनिक वांग छी युद्धबंदी के तौर पर पिछले छह दशक से मध्यप्रदेश के बालाघाट जिले के तिरोड़ी गांव में रह रहे है।

 स्थानीय लोग इन्हें  राज बहादुर वांग के नाम से जानते हैं, 1962 के युद्ध की याद करते हुए थोड़ा भावुक होते हुए कहते हैं कि वह धोखे से भारत की सीमा घुस आए थे, इस दौरान उनको रेडक्रास की गाड़ी दिखाई दी तो चीनी सेना की गाड़ी समझ उसमें सवार हो गए लेकिन उन्हें क्या पता था कि वह भारत की कैद में आ चुके है। युद्धबंदी के रूप में उनको असम में सेना के कैंप में लाया गया इसके बाद वह लंबे समय तक ( करीब सात साल )तक देश की अलग-अलग जेलों में रहे।

युद्धबंदी के रूप में भारत रह रहे वांग छी का जीवन संघर्ष से भरा हुआ है। युद्धबंदी के रूप में पकड़े गए वांग छी को जेल से रिहा होने पर बालाघाट के खनन वाले इलाके में छोड़ दिया गया। यहां पर तिरोड़ी गांव में एक सेठ के यहां आटा चक्की पर उनको शुरुआती काम मिला और उनका एक नया जीवन शुरु हुआ। इसी दौरान 1975 में एक  स्थानीय लड़की  से शादी भी हो गई।

 वांग छी बताते हैं कि चीन वापस जाने के लिए जब उन्होंने चीनी दूतावास से भी संपर्क किया जहां उन्हें दो टूक में कह दिया गया कि उन्होंने चूंकि इंडिया की लड़की से शादी कर ली है इसलिए अब वह उनके आदमी हो गए हैं इसलिए चीन वापस नहीं जा सकते।

 लंबे संघर्ष के बाद वांग छी आखिरकार 2017 को पहली बार करीब 55 साल बाद चीन जाने का मौका मिल पाया। चीनी नागारिक वांग छी अपने बेटे विष्णु और बेटी के साथ जब चीन पहुंचे तो उनका वहां भव्य स्वागत हुआ। वांग छी बताते हैं कि चीन के शिनियांग प्रांत में उनके भाई बहन और पूरा परिवार रहता है।

वांग छी कहते हैं कि आज भी उनके पास चीन का पासपोर्ट है और इसी साल मार्च में उनका वीजा टाइम खत्म हो चुका है लेकिन कोरोना महामारी के चलते फ्लाइट नहीं चलने के चलते वह वापस नहीं लौट सके। अब उन्होंने वीजा बढ़ाने के लिए आवेदन किया है। वांग छी कहते हैं कि आज भी उनके चीन में भाई बहन रिश्तेदार है और इस कारण वह चीन सिर्फ आना जाना चाहते है, रहना भारत में चाहते हैं कि क्योंकि भारत में पूरा परिवार बेटे- बहू, बेटियां और पोता पोती रहते है।

 वांग छी कहते हैं कि यहां के लोगों ने कभी उनका पराया नहीं माना है और इसी कारण वह वापस अब चीन नहीं जाना जाते।

 

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