वरदान मांगूंगा नहीं..कर्तव्य पथ से किंतु भागूंगा नहीं..

डॉ शिवमंगल सिंह "सुमन" की 104 वीं जयंती ( नाग पंचमी ) पर विशेष

गौरव अवस्थी

गौरव अवस्थी

वरदान मांगूंगा नहीं..कर्तव्य पथ से किंतु भागूंगा नहीं..

यह हार एक विराम है
जीवन महासंग्राम है
तिल तिल मरूंगा पर दया की भीख मैं लूंगा नहीं
वरदान मांगूंगा नहीं..
स्मृति सुखद प्रहरों के लिए
अपने खंडहरों के लिए
यह जान लो मैं विश्व की संपत्ति चाहूंगा नहीं
वरदान मांगूंगा नहीं..
क्या हार में क्या जीत में
किंचित नहीं भयभीत मैं
संघर्ष पथ पर जो मिले यह भी सही वह भी सही
वरदान मांगूंगा नहीं..
लघुता न अब मेरी छुओ
तुम हो महान बने रहो
अपने हृदय की वेदना मैं व्यर्थ त्यागूंगा नहीं
वरदान मांगूंगा नहीं..
चाहे हृदय को ताप दो
चाहे मुझे अभिशाप दो
कुछ भी करो कर्तव्य पथ से किंतु भागूंगा नहीं
वरदान मांगूंगा नहीं..

इस जैसे तमाम अमर गीत लिखने वाले बैसवारे ( उन्नाव रायबरेली जनपद का एक विशेष भूभाग) के अमर सपूत डॉ शिवमंगल सिंह “सुमन” का जन्म वर्ष 1916 में उन्नाव जनपद के ग्राम झगरपुर (तहसील बीघापुर) में श्रावण मास की पंचमी (नाग पंचमी) को हुआ था. भगवान भोलेनाथ के नाम पर माहात्म्य प्राप्त श्रावण मास में जन्म की वजह से ही सुमन जी स्वभाव से फक्कड़ थे. उनके स्वर में विद्रोह था, आक्रोश था. सामाजिक विकृतियों और आर्थिक विषमता पर चोट करते हुए वह अपनी कविताओं में समाज के निर्माण का स्वप्न देखते हैं और दलित शोषित वर्ग की विजय कामना के साथ क्रांति का आवाह्न करते चलते हैं. भगवान शिव की कृपा ही थी कि महाकाल की नगरी उज्जैन में उनका अधिकांश जीवन बीता. कई वर्षों तक विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन के उपकुलपति रहे.
डॉ सुमन की काव्य कुशलता के दर्शन तो नवीं कक्षा के विद्यार्थी के रूप में ही सामने आ चुके थे जब उन्होंने अपने स्कूल के हेड मास्टर को लेकर एक कविता लिखी और उसे कवि सम्मेलन के मंच से श्रोताओं के बीच सुनाया भी, लेकिन कविता का वास्तविक प्रस्फुटन कॉलेज पहुंचने पर ही हुआ. कॉलेज में उन्होंने जो पहली कविता लिखी थी, उसकी यह दो पंक्तियां-
“उपवन की वह हरियाली पावन समीर का चलना
विकसित कुसुमो की लाली, डाली डाली का हिलना”
उनकी कविताओं का प्रथम संकलन “हिललोल” नाम से 23 वर्ष की अवस्था में वर्ष 1939 में प्रकाशित हुआ. इस कविता संग्रह की भूमिका आचार्य पंडित केशव प्रसाद मिश्र ने लिखी थी. इस संग्रह की कविताओं ने काव्य प्रेमियों का ध्यान खूब आकर्षित किया.
छायावादी युग के अंतिम प्रतिनिधि कवि डॉ सुमन ने अनेक कालजई कविताएं लिखी. पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई और देश के जाने माने समाज सेवक एवं श्रेष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी जैसे प्रख्यात लोग उनके शिष्य रहे. अपने गुरु का प्रताप यह दोनों ही योग्य शिष्य व्यक्तिगत और सार्वजनिक रूप से गाते-बताते भी रहे वरदान मांगूंगा नहीं.. जैसी विद्रोही स्वर वाली इस कविता पर देश के हिंदी प्रेमी समाज का ध्यान तब ज्यादा ही गया जब अटल बिहारी बाजपेई ने संसद के अंदर अपने गुरु डॉ सुमन का नाम लेकर उनकी इस कविता के अंश पढ़ते हुए प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था. आज भी अधिकतर लोग “वरदान मांगूंगा नहीं” कविता अटल जी की उपज समझते हैं.

क्रांतिकारी सुमन जी
परिहार क्षत्रिय वंश में जन्मे थे. सुमन जी के पिता ठाकुर साहब बख्श सिंह रीवा राज्य की सेना के जनरल रहे. उनके पिता ठाकुर बलराज सिंह स्वयं रीवा सेना में कर्नल थे और प्रपितामह ठाकुर चंद्रिका सिंह सन 1857 की प्रथम क्रांति में सक्रिय भाग लेते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे. उनके चाचा ठाकुर प्रताप सिंह रीवा अमरपाटन के पास प्रतापगढ़ जागीर के अधिकारी थे और महाराज वेंकटरमण जूदेव द्वारा सम्मानित थे. सुमन जी की बड़ी बहन कीर्ति कुमारी जी का विवाह वेंकट रमन सिंह जी के साथ ही हुआ था. सुमन जी की आरंभिक शिक्षा रीवा राज्य की छावनी में ही हुई. वर्ष 1930 -31 में नवीं कक्षा में पढ़ाई के दौरान ही वह गांधी जी द्वारा चलाए गए आंदोलन और धरसाना मार्च तथा नमक सत्याग्रह के साक्षी रहे. खादी तकली और आंदोलन उनके प्राणों को स्पंदित करने लगा. चेतना में प्रवाहित होने लगा. मैट्रिक करते-करते 1932 तक सुमन जी का संपर्क क्रांतिकारियों से स्थापित हो गया और अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद के दल के सदस्यों को पिस्तौल कारतूस पहुंचाने का कार्य भी किया.

गुरु-शिष्य के रिश्ते की पवित्रता
देश के श्रेष्ठ गीतकार एवं राजनेता बालकवि बैरागी ने इन पंक्तियों के लेखक को खुद एक संस्मरण ने बताया था की सुमन जी की वजह से ही वह उच्च शिक्षा ग्रहण कर पाए. अगर उन्होंने आर्थिक रूप से एवं शिक्षा में मदद ना की होती तो वह डिग्रीधारी ना बन पाते. गुरु शिष्य के पवित्र रिश्ते का एक उदाहरण बैरागी जी के शब्दों में सुनिए- ” तब हम मध्यप्रदेश शासन में उप मंत्री बन गए थे. उज्जैन के सरकारी दौरे पर जाना हुआ. उज्जैन जाएं और सुमन जी से नहीं मिले ऐसा हो नहीं सकता था. गेस्ट हाउस पहुंचते ही सरकारी अमले से साइकिल की व्यवस्था को कहा. अफसर अचंभित. कई किंतु परंतु किए लेकिन मंत्री के आगे उन्हें झुकना ही था झुके भी. साइकिल आई और यह शिष्य अपने गुरु सुमन जी से मिलने विक्रम विश्वविद्यालय तक साइकिल से गया और सुमन जी अपने कार्यालय के बाहर मंत्री के स्वागत में खड़े थे” फिर गुरु शिष्य का जो मिलन हुआ उसे शब्दों में बखान नहीं किया जा सकता.

सुमन और प्रभाष जोशी

यह अनुराग ही था कि “दद्दू” ने उन्नाव शहर में उनके गांव झगरपुर को जाने वाले रास्ते में वर्ष 2005 में “डॉ शिवमंगल सिंह सुमन हिंदी भवन” नाम से निराला शिक्षा निधि के मुख्यालय की स्थापना की. दद्दू ने इस हिंदी भवन का लोकार्पण उनके योग्य शिष्य, देश के श्रेष्ठ पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता श्रद्धेय प्रभाष जोशी के कर कमलों से कराने का ख्वाब देखा. पता नहीं क्या सोच कर दद्दू ने इस ख्वाब को पूरा करने का दायित्व मुझे सौंपा. इस दायित्व की पूर्ति के सिलसिले में ही दिल्ली जाकर आदरणीय श्री राम बहादुर राय जी के माध्यम से पहली बार प्रभाष जी से मिलना हुआ. हमें याद है नई दिल्ली के दरियागंज में संचालित प्रज्ञा संस्थान के दफ्तर के छोटे से कमरे में आकर तख्त पर विराजे श्रद्धेय प्रभाष जी ने सुमन जी का नाम लेने भर से अपनी स्वीकृति सहर्ष प्रदान ही नहीं की बल्कि इस बात के लिए भी आश्वस्त किया कि वह हिंदी आलोचना के शिखर पुरुष डॉ नामवर सिंह जी को भी साथ लेकर आएंगे. इसी मुलाकात में उन्होंने इस बात का जिक्र खास तौर पर किया था कि सुमन जी अपन के गुरु थे. अपन उनके उन्नाव जरूर चलेंगे. 5 नवंबर को वह डॉ नामवर सिंह एवं आदरणीय राम बहादुर राय के साथ कार्यक्रम में पधारे. हिंदी भवन का लोकार्पण किया और अपने गुरु डॉ सुमन जी की आवक्ष प्रतिमा का अनावरण भी.

अपने गृह जनपद में सामाजिक योगदान

उन्नाव में बैसवारे के छात्रों को उच्च शिक्षा की व्यवस्था आज से तीन दशक पहले उपलब्ध कराने वाली सामाजिक संस्था निराला शिक्षा निधि उन्नाव के संस्थापक अध्यक्ष रहे डॉक्टर सुमन ने महाप्राण निराला की स्मृतियों को जीवंत बनाने में अपना सक्रिय योगदान दिया था. उनकी सरपरस्ती में ही निराला शिक्षा निधि ने प्रगति के सोपान तय किए. एक वाकया उनके ना रहने के बाद सामने आया. निराला शिक्षा निधि के संस्थापक प्रबंध मंत्री पंडित कमला शंकर अवस्थी “दद्दू” का सुमन जी के प्रति विशेष अनुराग था. अपने इसी अनुराग की अभिव्यक्ति के रूप में उन्होंने “अक्षर अनुराग” नाम से एक पत्र संग्रह वर्ष 2006 में प्रकाशित किया था. वैसे तो सुमन जी और दद्दू के बीच सैकड़ों खतों का आदान-प्रदान हुआ लेकिन सुमन जी के अट्ठासी ऐसे खत उनकी पोटली में निकले जो समाज को संदेश-निर्देश और प्रेरित करने वाले थे. डॉ गणेश नारायण शुक्ला के संपादन एवं डॉक्टर रामनरेश के संयोजन में प्रकाशित यह पत्र संग्रह हिंदी प्रेमी समाज में सुमन जी के आचार विचार व्यवहार को जानने की जिज्ञासा रखने वाले लोगों के लिए एक थाती है.

पारिवारिक सुमन जी

सुमन जी से हम लोगों को अपनी छोटी सी उम्र में बड़ा सा प्यार मिलता रहा है. एक तरह से सुमन और अवस्थी परिवार एक ही थे. हर वर्ष उनका अपने पूर्वजों की देहरी पर आना हम लोगों के लिए उत्सव सरीखा होता था. उनकी स्मृतियां आज भी हम लोगों के मन में तरोताजा है. सुमन जी आतिथ्य भाव के भी धनी थे. एक बार हम लोग सपरिवार ( 14 सदस्य) दतिया दर्शन करते हुए रात 11:30 बजे उज्जैन पहुंचे. सुमन जी तब 86 वर्ष के रहे होंगे. स्वास्थ्य खराब होने के बावजूद वह अवस्थी परिवार के स्वागत के लिए दरवाजे पर खुद खड़े थे. पहली बार ही मिलने वाला कोई भी व्यक्ति उनका होकर रह जाता था.
ऐसे सुमन जी की आज 104 वीं जयंती है. सरल-सहज स्वभाव के धनी सुमन जी के श्री चरणों में श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए जयंती पर उन्हें शत शत नमन..

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Related Articles