एक ही वर्ष में छह ग्रहण, क्या सन्देश देना चाहते हैं ?

डा चन्द्रविजय चतुर्वेदी ,प्रयागराज 

भूतो न भविष्यत् ,वर्ष 2020 जहाँ कोरोना युग के रूप में विश्व के इतिहास में जाना जाएगा वही यह वर्ष चार चंद्रग्रहण और दो सूर्यग्रहण के वर्ष के लिए भी जाना जायेगा .

    वर्ष का पहला चंद्रग्रहण तो दस जनवरी को बीत गया .दूसरा चंद्रग्रहण पांच जून को है .जो छाया चंद्रग्रहण है यह भारत मे भी देखा जाएगा .यह चंद्रग्रहण रात में ग्यारह बजकर ग्यारह मिनट पर शुरू होगा तथा दो बजकर चौतीस  मिनट पर समाप्त होगा 

   चंद्र ग्रहण एक खगोलीय घटना है यह तब घटता है ,जब चन्द्रमा पृथ्वी के ठीक पीछे उसकी प्रच्छाया में आ जाता है। यह ऐसा तभी होता है जब सूर्य पृथ्वी और चन्द्रमा इसी क्रम में लगभग एक सीधी रेखा में स्थित रहे।  उपच्छाया चंद्रग्रहण तब घटता है जब पृथ्वी की परिक्रमा के दौरान चन्द्रमा पेनुम्ब्रा अर्थात चन्द्रमालिन्य से होकर गुजरता है। यह पृथ्वी की छाया का बाहरी भाग होता है। इस दौरान चन्द्रमा सामान्य से थोड़ा गहरा दिखलाई देता है रक्ताभ आभा के साथ। 

   उपच्छाया चंद्रग्रहण को धार्मिक दृष्टि से ज्यादा महत्त्व नहीं दिया जा रहा है। खगोलविद और ज्योतिषविद दोनों चंद्रग्रहण को नंगी आखों से देखने की सलाह दे रहे हैं। धारणवेत्ता सूतक काल नहीं मान रहे हैं और न ही धार्मिक और दैनिक कार्यक्रमों को रोकने की आवश्यकता ही बता रहे हैं। 

   इस वर्ष की महत्वपूर्ण बात यह है की तीसरा चंद्रग्रहण आषाढ़ पूर्णिमा पांच जुलाई को होगा तथा चौथा चंद्रग्रहण तीस नवम्बर को होगा।  वर्ष का पहला सूर्यग्रहण इक्कीस जून को होगा तथा दूसरा सूर्यग्रहण 14 दिसंबर 2020 को होगा। 

    ज्योतिषविदों का मानना है की वृहद संहिता के अनुसार जब भी किसी महीने में दो या दो से अधिक ग्रहण पड़े तो यह पाप ग्रहों का प्रभाव है। वर्ष में छह ग्रहणों का होना किसी पराशक्ति के कारण हो रहा है जो अनिष्ट सूचक है।  

   वैज्ञानिकों का मत है की सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण नैसर्गिक खगोलीय घटना है इसे अनिष्ट सूचक अथवा पाप ग्रहों के प्रभाव के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। भारतीय खगोलशास्त्र का ज्ञान वर्ष पुराना है पर आज वह आधुनिक विज्ञान की मान्यताओं के अनुकूल है। दोनों का मानना है की प्रतिवर्ष 18 माह के अंतराल पर विश्व में कहीं कही सूर्यग्रहण होगा। हजारों वर्ष पुराने हुए सूर्यग्रहण चाहे पूर्ण रहे हों चाहे आंशिक उसकी गणना की जा सकती है। भारतीय खगोलशास्त्र के द्वारा गणित किया गया भारतीय पंचांग कलेण्डर पृथ्वी चन्द्रमा और नक्षत्रों की गति को ध्यान में रखकर तैयार किया जाता है जिसके अनुसार चंद्रग्रहण और सूर्यग्रहण काल की निश्चित रूप से निर्धारित खगोलीय घटना है। यह ग्रहों के पाप कर्म से घटित होनेवाला खगोलीय घटना नहीं है। 

   चंद्रग्रहण और सूर्यग्रहण के अवसर पर महत्वपूर्ण वैज्ञानिक प्रयोग भी होते रहते हैं 29 मई 1919 को हुए पूर्ण सूर्यग्रहण की सहायता से आइंस्टीन के सापेक्षता  सिद्धांत पर महत्वपूर्ण अध्ययन किया गया। पृथ्वी पर जो कुछ भी अनिष्टकारी घटित हुआ या हो रहा है वह खगोलीय ग्रहों के कारण नहीं बल्कि उसके मूल में मानव रूपी अनिष्टकारी ग्रह हैं आवश्यकता इन ग्रहों को शांत करने की है।  एक वर्ष में घटित होने वाले इन ग्रहणों के पीछे मानवता का कल्याण भी जुड़ा हो सकता है। सूर्य ग्रहण और चंद्रग्रहण से पृथ्वी के तापन में कमी आती है आज पृथ्वी पर जो भी उत्पात है वायरस का हो या समुद्री तूफान का वह तापन के कारण है। 

      अथर्ववेद के एक मंत्र से हम स्तवन और शांतिपाठ करें 

      शं नो मित्रः शं वरुणः शं विवस्वान्छामान्तकः 

    उत्पाताः पार्थिवंतरिक्षाः शं नो दिविचारा ग्रहाः 

   अर्थात मित्र ,वरुण ,सूर्य ,तथा अंतक हमें शांति प्रदान करें ,पृथ्वी और अंतरिक्ष में होने वाले उत्पात एवं द्युलोक में संचरण करने वाले ग्रह हमें शांति प्रदान करें। 

     

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