‘स्थितप्रज्ञ’ गीता की आदर्शमूर्ति

गीता प्रवचन दूसरा अध्याय

संत विनोबा कहते हैं कि शास्त्र भी बतला दिया, कला भी बतला दी, किंतु इतने से पूरा चित्र आँखों के सामने खड़ा नहीं होता।

शास्त्र निर्गुण है, कला सगुण है; परंतु सगुण भी साकार हुए बिना व्यक्त नहीं होता।

केवल निर्गुण जिस प्रकार हवा में रहता है, उसी प्रकार निराकार सगुण की हालत भी हो सकती है। इसका उपाय है, जिसमें गुण मूर्तिमान् हुए हैं, उसका दर्शन।

इसीलिए अर्जुन कहता है –

“भगवन्, आपने जीवन के मुख्य सिद्धांत बता दिये, उन सिद्धांतों को आचरण में लाने की कला भी बतला दी, तो भी इसका स्पष्ट चित्र मेरे सामने खड़ा नहीं होता। अत: मुझे अब चरित्र सुनाइए।

ऐसे पुरुषों के लक्षण बताइए, जिनकी बुद्धि में सांख्य-निष्ठा स्थिर हो गयी है और फल-त्यागरूपी योग जिनकी रग-रग में व्याप्त हो गया है।

जिन्हें हम ‘स्थिरप्रज्ञ’ कहते हैं, जो फल-त्याग की पूरी गहराई दिखलाते हैं, कर्म-समाधि में मग्न हैं और निश्चय के महा-मेरु हैं; वे बोलते कैसे हैं, बैठते कैसे हैं, चलते कैसे हैं, यह सब मुझे बताइए।

वह मूर्ति कैसी होती है, उसे कैसे पहचानें ? यह सब कहिए भगवन्!

इसके लिए भगवान् ने दूसरे अध्याय के अंतिम अठारह श्लोकों में स्थितप्रज्ञ का गंभीर और उदात्त चरित्र चित्रित किया है।

मानो इन अठारह श्लोकों में गीता के अठारह अध्यायों का सार ही एकत्र कर दिया है।

स्थितप्रज्ञ’ गीता की आदर्शमूर्ति है। यह शब्द भी गीता का अपना स्वतंत्र है।

आगे पाँचवें अध्याय में जीवन्मुक्त का, बारहवें में भक्त का, और चौदहवें में गुणातीत का और अठारहवें में ज्ञाननिष्ठ का ऐसा ही वर्णन आया है; परंतु स्थितप्रज्ञ का वर्णन इन सबसे अधिक सविस्तार और खोलकर किया है।

उसमें सिद्ध-लक्षण के साथ-साथ साधक लक्षण भी बताये हैं। हजारों सत्याग्रही स्त्री-पुरुष सायंकालीन प्रार्थना में इन लक्षणों का पाठ करते हैं।

यदि प्रत्येक गाँव और घर में ये पहुँचाये जा सकें, तो कितना आनंद होगा! परंतु पहले ये हमारे हृदय में पैठें, तो फिर बाहर अपने-आप पहुँच जायेंगे।

नित्यपाठ की चीज यदि यांत्रिक हो गयी, तो फिर वह चित्तमें अंकित होने की जगह उलटी मिट जाती है। पर यह दोष नित्यपाठन का नहीं, मनन न करने का है।

नित्यपाठ के साथ-साथ नित्य मनन और नित्य आत्मपरीक्षण आवश्यक है। क्रमश:

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