विश्वयुद्ध की विभीषिका से झुलसता विश्व और नई आर्थिक, सामाजिक और व्यापार व्यवस्थाएं

Dr. Amitabh Shukla
डॉ. अमिताभ शुक्ल

प्रथम विश्व युद्ध सन 1914 में प्रारंभ होकर  सन 1918 तक जारी रहा था।

इसमें संपूर्ण विश्व में डेढ़ करोड़ लोगों की मृत्यु हुई थी।

48, 000 भारतीय व्यक्तियों की जान भी गई थी।

यह युद्ध 28 अगस्त 1914 को  प्रारंभ हुआ था, आज से लगभग 106 वर्ष पूर्व।

विश्व के प्रमुख देश दो खेमों में बँटे थे, और विश्वयुद्ध की समाप्ति के पश्चात अमेरिका विश्व की “प्रमुख महाशक्ति” बनकर उभरा था।

इसके केवल चौबीस वर्ष बाद 1 सितंबर 1939 को दूसरा विश्वयुद्ध प्रारंभ हुआ था, जिसकी समाप्ति 2 सितंबर 1945 को हुई थी।

दूसरे विश्वयुद्ध की सर्वाधिक विनाशकारी लीला अमेरिका द्वारा जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर  शक्तिशाली और भीषण बमों के द्वारा भीषण जनहानि  थी।

उसका परिणाम आज भी वहां की जनसंख्या पर अनेक रूपों में  बना हुआ है।

दूसरे विश्वयुद्ध से उभरा शक्ति संतुलन और आर्थिक विकास

इस विश्वयुद्ध की विकरालता और उससे संपूर्ण विश्व में भयानक आर्थिक क्षति हुई थी।

उसके प्रभाव स्वरूप विश्व अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जो प्रयास किये गये थे, उनकी परिणीति के रूप में ” ब्रेटन वुड्स सिस्टम”  का जन्म हुआ था।

इस व्यवस्था के अन्तर्गत दो संस्थाओं  अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और  विश्व बैंक का गठन हुआ।

इन्होंने संपूर्ण विश्व अर्थव्यवस्था का संचालन प्रारंभ किया।

युद्ध से प्रभावित अधिकांश देश इन संस्थाओं के सदस्य बने।

अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में विनिमय दरों में जो उतार-चढ़ाव आ रहे थे, उनको नियंत्रित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और युद्ध से प्रभावित देशों की अर्थव्यवस्थाओं के पुनर्निर्माण के लिए आर्थिक- सहायता उपलब्ध कराने के लिए विश्व बैंक का गठन हुआ था।

इसके साथ ही साथ विश्व बैंक की सहायक संस्थाओं के रूप में अंतरराष्ट्रीय विकास एसोसिएशन और अंतरराष्ट्रीय वित्त निगम की स्थापना भी हुई थी।

ये क्रमश: सदस्य देशों के विकास की योजनाओं के लिए सरकारी सहायता और निजी क्षेत्र के लिए वित्तीय सहायता और प्रवाह बढ़ाने के लिए गठित की गई थी।

विश्व अर्थव्यवस्था का पुनरावलोकन करते हुए संक्षेप में यह निष्कर्ष प्रकट किया जा सकता है कि इन संस्थाओं के गठन के बाद अब से कुछ वर्ष पूर्व तक अर्थात लगभग 70 वर्ष तक  अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक का विश्व और सदस्य देशों की अर्थव्यवस्थाओं को संचालित और नियंत्रित करने में बोलबाला रहा।

यद्यपि, बाद के वर्षों में धीरे-धीरे यह प्रकट होने लगा कि, इसके माध्यम से अमेरिका ने  सदस्य देशों और खासकर विकासशील देशों को प्रभावित कर उनकी अर्थव्यवस्थाओं पर नियंत्रण स्थापित किया और  ऋणों के माध्यम से उनकी आर्थिक नीतियों को अपने नियंत्रण में लेकर अमेरिकन साम्राज्यवाद का विस्तार कियाl

अमेरिकी वर्चस्व

कुल मिलाकर, संपूर्ण विश्व पर अमेरिका का आर्थिक और सामरिक दबदबा बना रहा।

इसलिए बाद के वर्षों में विकासशील राष्ट्रों द्वारा नई अंतरराष्ट्रीय विश्वव्यवस्था के गठन पर चर्चाएं की जाने लगीं और क्षेत्रीय व्यापारिक संगठनों की स्थापना भी हुई।

उदाहरणार्थ एशियाई देशों में सार्क और यूरोपियन देशों में यूरोपीय आर्थिक समुदाय इत्यादि।

इसके बाद और भी कई क्षेत्रीय  व्यापारिक संघ बनाए गए, लेकिन किसी ना किसी रूप में “ब्रेटनवुड्स” व्यवस्था के माध्यम से अमेरिकन वर्चस्व बना रहा।

1990 के दशक में “गेट” के माध्यम से “डंकल प्रस्ताव”  जैसी योजनाओं के द्वारा विश्व व्यापार में विकासशील देशों के संदर्भ में विभिन्न  विभेदकारी नीतियां जारी रहीं ।

अमेरिकन लॉबी जिनका इन संस्थाओं पर  “वीटो पावर” के माध्यम से प्रभाव था,  वह लाभान्वित होती रही।

यहां विश्व के आर्थिक और सामरिक  संतुलन को भंग करने वाले घटनाक्रम अर्थात रूस के विघटन और वहां ग्लास्नोस्ट और पेरेस्ट्रोइका के माध्यम से पूंजीवाद के प्रवेश का उल्लेख करना आवश्यक है।

इसके कारण ब्रेटन वुड्स  व्यवस्था के बावजूद विश्व में आर्थिक और सामरिक संतुलन बना रहा था,और संपूर्ण विश्व पूंजीवादी और समाजवादी खेमों  में  विभाजित रहा था।

इस काल खंड में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शांति की योजनाएं बनाने, निशस्त्रीकरण किए जाने को लेकर भी चर्चा होती रहीं और संधियों और समझौतों  के व्यापक दौर चलते रहे,  जिनसे ऐसा आभास होता रहा कि, संभवत अब तीसरा विश्व युद्ध न हो।

इसके बाद के घटनाक्रमों में पिछले कुछ दशकों में  चमत्कारिक रूप से चीन का शक्ति बनकर उभरना अमेरिका के लिए परेशानी का सबब बन कर आया ,जब व्यापार के माध्यम से चीन ने अपने आर्थिक हितों का प्रभाव कारी विस्तार करने में सफलता प्राप्त की।

वर्तमान दशा तृतीय विश्वयुद्ध है

कोविड -19 विश्व का तीसरा महायुद्ध  है, जो हथियार के स्थान पर वायरस से प्रारंभ होकर चल रहा है।

अंतरराष्ट्रीय आर्थिक, व्यापारिक और सामरिक संतुलन पूर्णत: भंग  होकर नए तरीकों से नवपूंजीवादी  शक्तियों के प्रभाव में आ चुका है।

यह शक्तियां हैं, पूंजी के द्वारा व्यापार के नए प्लेटफार्म स्थापित करते हुए अकूत आर्थिक संपदा अर्जित करने वाला वर्ग।

इसमें ऑनलाइन व्यापार वाला नया क्षेत्र  प्रमुख  है, जिसकी पृष्ठभूमि विगत एक दशक से ज्यादा समय से ऑनलाइन व्यापार के अभूतपूर्व विस्तार और उससे प्राप्त अभूतपूर्व लाभ से तैयार हो चुकी थी।

अब तक जो विश्लेषण और शोध प्रस्तुत किए जा चुके हैं उनसे यह भी स्पष्ट हो चुका है कि यह सब कुछ अचानक नहीं हुआ,  बल्कि इसके लिए  पृष्ठभूमि में  बहुत समय से तैयारियां थीं।

न ही राष्ट्रवाद, न ही  वैश्वीकरण अभूतपूर्व पूंजीवाद

अब इस समय, विश्व में जो आर्थिक परिदृश्य सामने आया है, वह पूंजीवाद का अत्यधिक भयानक  रूप है, जिसका उद्देश्य जनता को  प्रथमत:  स्वास्थ्य और जीवन की चुनौती से डराकर और फिर विभिन्न रूपों में नियंत्रित करते हुए व्यापार  के नए स्वरूपों के माध्यम से उनका शोषण और अकूत लाभ अर्जित करना है।

जिस प्रकार,  विभिन्न देशों की सरकारें पिछले 70 –  75 वर्षों में  ब्रेटन वुड्स व्यवस्था के माध्यम से अमेरिका से प्रभावित और नियंत्रित रहे, उसी प्रकार सरकारें  अब उन शक्तिशाली पूंजीवादी ताकतों से प्रभावित और नियंत्रित होकर इस नव पूंजीवादी व्यवस्था के विस्तार में सहायक ही होंगी, जो अब स्पष्ट रूप से सामने आने लगा है।

भारत के संदर्भ में रेलवे का निजीकरण इसी श्रृंखला  की एक महत्वपूर्ण कड़ी है।

शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं निजी क्षेत्रों के नियंत्रण में आ ही चुकी है।

इस भीषण स्वास्थ्य संबंधी घटनाक्रम के बावजूद एवं पश्चात भी भारत जैसे विशाल देश में स्वास्थ्य सेवाओं को सुधारने के लिए कोई ठोस और दवाई कदम ना उठाया जाना भी उन्हीं शक्तियों को और ताकतवर बनाएगा जो भारतीय और विदेशी पूंजी के गठजोड़ से सत्ता के नए समीकरणों के रूप में अवतरित हुए हैं।

अमेरिका की चुनौती आंतरिक अर्थव्यवस्था के संकटों से निपटना होगा।

फ्रांस, जर्मनी, ब्राज़ील जैसे देश, जो तुलनात्मक रूप से बेहतर हैं, अपनी अर्थव्यवस्था  के महत्व को कायम रखने में सफल होंगे।

न्यू नॉर्मल व्यवस्था का लाभ पूंजीवादी शक्तियों को

इस विश्वयुद्ध के बाद तैयार यह नया ढांचा, दूसरे  शब्दों  में  “न्यू नॉर्मल  व्यवस्था”  या “जीवन शैली” विवशतावश  जनता की निर्भरता  नई उपभोक्ता सामग्री, स्वास्थ्य व्यवस्थाओं और उपकरणों पर बढ़ाएगी।

इनका लाभ सीधे-सीधे पूंजीवादी शक्तियां प्राप्त करेंगी।

खासकर भारत  जैसे देश में जहां का कमजोर सार्वजनिक सेवाओं और  सामाजिक सुरक्षा  का ढांचा  और पर  निर्भर  अर्थव्यवस्था विश्व में  पूंजीवाद के  एक महत्वपूर्ण केंद्र (देश)  के रूप में  स्थापित हो चुका है, भले ही   बहलाव और दिखावे के लिए   आत्मनिर्भरता के नारे लगाए  जाते   रहेंगे।

लेखक प्रख्यात अर्थशास्त्री हैं। पिछले चार दशकों से अर्थशास्त्र के अध्यापन, शोध और लेखन से जुड़े हुए  हैं। अनेकों किताबों और शोध पत्रों के लेखक हैं।

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