देश की अभूतपूर्व एकता के निर्माता सरदार पटेल

डॉ0 रवीन्द्र कुमार

आपको यह अवश्य स्मरण रहना चाहिए कि आपने जिस स्वतंत्रता को प्राप्त किया है, वह उत्तरदायित्त्वों के निर्वहन की अपेक्षा भी करती है I(इस हेतु), लोगों को इस प्रकार व्यवहार करना चाहिए कि जिससे यह प्रकट हो कि वे (वास्तव में ही) नई के स्वतंत्रता के योग्य हैं। उनमें आपसी समझ और सहनशीलता के साथ ही सामान्य हितों (की प्राप्ति) के लिए सहमति होनी चाहिए…–सरदार वल्लभभाई पटेल

15 अगस्त, 1947 ईसवीं को ब्रिटिश दासता से मुक्ति के बाद साढ़े पाँच सौ से भी अधिक देशी राज्यों का भारतीय संघ में विलय कराकर देश की अभूतपूर्व राजनीतिक एकता का निर्माण करने वाले, संगठित भारत के निर्माता सरदार वल्लभभाई पटेल की 15 दिसम्बर, 2020 ईसवीं को सत्तरवीं पुण्यतिथि है I

सरदार वल्लभभाई पटेल देश की एकता के निर्माण जैसे भगीरथ कार्य को अपनी उच्च और परिपक्व राष्ट्रीय राजनीतिक सोच के बल पर, जिसके मूल में विशुद्धतः भारत की एकता, अखण्डता, समृद्धि और आन्तरिक व बाह्य दोनों रूपों में सुरक्षा थी, कर सके थे I इसी के साथ, वे देशवासियों,सभी आम और खास को, अपने व्यवहारों में प्राचीनकाल से भारतीयता की पहचान के रूप में स्थापित सहनशीलता के आधार पर वृहद् जन-कल्याण के लिए कार्य करने, व राष्ट्र हित को अपने परम कर्त्तव्य के रूप में सर्वोच्च रखने की अनुभूति कराकरउनका सहयोग लेकर भी कर सके थे I इस संक्षिप्त चर्चा के प्रारम्भ में उद्धृत स्वयं सरदार पटेल के लघु वक्तव्य से यह बात पूर्णतः स्पष्ट है I

पाँच सौ पचास से अधिक देशी राज्योंके, जिनका कुल क्षेत्रफल लगभग छह लाख वर्गमील था, भारतीय संघ में विलय के साथ ही देश के दो भागों में विभाजन के बाद सरदार पटेल ने लाखों लोगों की पाकिस्तान-भारत में अदला-बदली कराई, और पाकिस्तान से भारत आए लाखों शरणार्थियों के लिए राहत और पुनर्वास की व्यवस्था भी कराई I इस कार्य को उन्होंने देशवासियों को स्वाधीन राष्ट्र में उनके कर्त्तव्यों –जनकल्याण व सुरक्षा हेतु उनके उत्तरदायित्त्वों का भान कराते हुए अति कुशलतापूर्वक सम्पन्न किया I14  दिसम्बर, 1947 को कटक (उड़ीसा) में अपने जन-सम्बोधन द्वारा जिस प्रकार देश के लोगों का स्वतंत्र भारत में उनके कर्त्तव्यों की याद दिलाते हुए उन्होंने आह्वान किया, वह बहुत ही श्रेष्ठ एवं महत्त्वपूर्ण था, तथावह आजतक भी प्रासंगिक है I सरदार पटेल ने कहा था, हमने जो स्वराज प्राप्त किया है, उसके फल (अपने कर्त्तव्यों का पालन करते हुए) हमें चखने हैं…” भारत अब स्वाधीन और स्वतंत्रहै…सामूहिक इच्छा शक्ति, औरकड़ी मेहनत से (इसे अपने कर्तव्य के रूप में लेते हुए) आप देश को समृद्ध बनाएँ…अपने सभी मतभेदों को (अब) आपको सुलझाना चाहिए और सामान्य हित में और राष्ट्र की एकता, सुरक्षा और समृद्धि के लिए कड़ा परिश्रम करना चाहिए।”

भारत की स्वतंत्रता के तुरन्त बाद पूर्वी पंजाब में जनसंख्या के आदान-प्रदान की प्रक्रिया में एक गम्भीर समस्या उत्पन्न हो गई थी। भारत से पाकिस्तान की ओर जाने वाले लोगों के एक बड़े जन-समूह को अमृतसर में रोक लिया गया था, जिससे दूसरी ओर से भारत आने वाले लाखों शरणार्थियों के लिए भी बड़ा खतरा उत्पन्न हो गया। ऐसी गम्भीर स्थिति में सरदार वल्लभभाई पटेल अविलम्ब अमृतसर नगर पहुँचे। उसी दिन, 30 सितम्बर, 1947 को एक सार्वजनिक सभा में उन्होंने लोगों का, व्यापक जन हित व राष्ट्र के प्रति अपने कर्त्तव्यों के निर्वहन हेतु सहिष्णुता के साथ व्यवहार करने का आह्वान किया। उन्होंने लोगों को वास्तविकता की अनुभूति कराई और जिस प्रकार गम्भीर समस्या का अति कुशलता व बुद्धिमानी से सफलतापूर्वक समाधान किया, वह आजतक भी अद्वितीय, प्रासंगिक और अनुकरणीय है।

अपने जन-सम्बोधन में सरदार पटेल ने सबसे पहले कहा, हमने अपने देश को महान और समृद्ध बनाने के लिए स्वतंत्रता प्राप्त की है, न कि उस थोड़े-बहुत को भी नष्ट करने के लिए जो हमारे विदेशी शासकों ने हमें सौंपा है। यदि हम सावधान नहीं रहते हैं, तो हम अपनी दीर्घकाल से प्रतीक्षित उस स्वतंत्रता को भी गवा देंगे, जिसे हमने इतने कष्टों और  संघर्षों के बाद प्राप्त किया है। आपको स्मरण रहना चाहिए कि लाखों लोगों का जीवन दांव पर है; उनके जीवन को, अपने प्रतिशोध या प्रतिशोध-भावना की पूर्ति के लिए, दांव पर नहीं लगाया जा सकता Iयह आवश्यक है कि आप शान्ति बनाए रखें और आक्रमण, प्रति-आक्रमण और प्रतिशोध के दुष्चक्र को तोड़ें, और यह देखें कि शरणार्थी सुरक्षित निकल जाएँ।” लोगों को मानवीयता की अनुभूति कराते हुए सरदार पटेल ने आगे कहा, शरणार्थियों के विरुद्ध लड़ना, वास्तव में, कोई लड़ाई ही नहीं है। मानवता या युद्ध का कोई भी कानून आश्रय और सुरक्षा की माँग करने वाले की हत्या की अनुमति नहीं देता है…आप (इसलिए,) विवेक और दूरदर्शिता के साथ ही काम करें।”

सरदार पटेल ने लोगों से भारतीयता की मूल भावना सहनशीलता (सहिष्णुता) अपनाने का विशेष आह्वान किया और लाखों पुरुषों, महिलाओं और बच्चों के हित में शान्ति बनाए रखने के साथ ही देश की एकता और अखण्डता के लिए अपनी शक्ति और ऊर्जा व्यय करने की अपील की I उनके आह्वान का लोगों के मस्तिष्क तथा हृदयों पर  तत्काल वांछित प्रभाव पड़ा। एक गम्भीर समस्याका, न्यूनाधिक, तुरन्त समाधान हो गया I

स्वतंत्रता के साथ देश के समक्ष जिस प्रकार गम्भीर समस्याएँ थीं, जैसाकि हमने उल्लेख किया है; देश की एकता के निर्माण के साथ ही कानून और व्यवस्था बनाए रखने, सिविल सेवाओं के पुनर्गठन और देश को आन्तरिक-बाह्य राष्ट्रविरोधी तत्त्वों से सुरक्षित रखने जैसी चुनौतियाँ थीं। लेकिन, सरदार पटेल ने अपनी अद्वितीय व परिपक्व राष्ट्रीय राजनीतिक सोच और कार्यों में देश की एकता और व्यापक जनहित को सर्वोच्च रखते हुए उन सभी पर एक-एक करके विजय प्राप्त की; स्वयं अपने को एक युगपुरुष व महानतम भारतीय के रूप में स्थापित किया।

सरदार वल्लभभाई पटेल को लौह पुरुष के रूप में जाना जाता है। वास्तव मेंही वेदृढ़निश्चयी, अदम्य साहस से भरपूर और विजयी प्रकृति वाले महा मानव थे I देश की एकता, अखण्डता, समृद्धि और सुरक्षा के लिए उन्होंने कई कठोर निर्णय भी लिए। लेकिन, उनकी किसी से कोई निजी शत्रुता नहीं थी; उन्हें किसी से व्यक्तिगत घृणा नहीं थी। मानव-प्रेम उनका मूल स्वभाव था, जो उनकी सहनशीलता (सहिष्णुता) का परिचायक था I यह उनका महान गुण था, जिसके बल पर वे भारत की अभूतपूर्व राष्ट्रीय एकता की स्थापना कर सके और देश को अनेक गम्भीर समस्याओं से सुरक्षित कर सके I सरदार पटेल के सत्तरवें निर्वाण दिवस पर उनके विचारों और कार्यों का स्मरण करते समय, उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए, उनकी सहनशीलता (सहिष्णुता) से भी परिचय होना चाहिए।

सरदार पटेल: एक आदर्श कर्मयोगी

सरदार पटेल: एक उदार प्रजातंत्रवादी

वर्धा में एक साथ भोजन करते डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, सरदार वल्लभभाई पटेल, मौलाना आजाद और बादशाह खान

आलइण्डियारेडिओ,नई दिल्ली से राष्ट्र को सम्बोधित करते हुए सरदार

जयपुर में एक जनसभा को सम्बोधित करते हुए सरदार

हैदराबाद के बेग़मपेठहवाईअडडे सरदार पटेल की अगवानी करते नीजामउस्मान अली खान

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