हिन्दी में जासूसी उपन्यासों के सम्राट सुरेंद्र मोहन पाठक

— त्रिलोक दीप  , वरिष्ठ पत्रकार, दिल्ली 

सुरेंद्र मोहन पाठक को मैं कब से जानता हूं यह प्रश्न अक्सर मुझसे किया जाता है। इसका उत्तर सीथा सपाट नहीं है। काफी पीछे मुड़ कर देखना होगा। लगता है हम दोनों की विरासत कमोबेश एक जैसी रही है। हम दोनों अविभाजित हिंदुस्तान की पैदाइश हैं। पाठक जी पूर्वी पंजाब खेमकरण, ज़िला अमृतसर के 19 फरवरी, 1940 के और मैं पश्चिमी पंजाब तहसील फालिया, ज़िला गुजरात का 11 अगस्त, 1935 का यानी सुरेंद्र मोहन मुझसे साढ़े चार साल छोटे हैं। उनके पिता जी लाहौर में काम करते थे इसलिए उनका वहीं रहना होता था और मेरे पिता जी रावलपिंडी में काम करते थे । लिहाज़ा मेरा वहीं रहना और पढ़ना लिखना होता था। लाहौर के करीब गुरु नानक का जन्मस्थान ननकाना साहब है जबकि रावलपिंडी के निकट पंजा साहब है जहां उन्होंने घमंडी वली कंधारी का अहम चूर करने के लिये उनके द्वारा फेंके गये पहाड़ को एक पंजे से रोककर पानी का सोमा प्रस्फुटित कर दिया था। इस आध्यात्मिकता का असर पाठक की आत्मकथा 'न बैरी न कोई बेगाना' तथा ' हम नहीं चंगे बुरा न कोय पर देखने को तो मिलता ही है उनके कई उपन्यासों पर भी गुरुबाणी का खासा प्रभाव देखने को मिलता है जैसे उनका एक उपन्यास है ;जो लरे दीन के हेत। उन दिनों पढ़ाई का माध्यम उर्दू हुआ करता था। मैंने रावलपिंडी के डायनीज़ स्कूल में उर्दू औऱ अंग्रेज़ी की पढ़ाई छठी क्लास तक की थी और दिल्ली आते आते उर्दू भूल सा गया था लेकिन सुरेंद्र मोहन तीसरी तक उर्दू पढ़े थे लेकिन उस उर्दू की पढ़ाई का इस्तेमाल उन्होंने अपने कई उपन्यासों में भी किया।

अलबत्ता मेरी थोड़ी बहुत पढ़ी उर्दू 1990 में पाकिस्तान के दौरे पर उसी तरह काम में आयी जैसे हमारे पत्रकार मित्र शम्भूनाथ शुक्ल की कानपुर के स्कूल में पढ़ी गुरुमुखी चंडीगढ़ औऱ पंजाब में उस समय काम आयी जब वह;जनसत्ता; में काम किया करते थे। तब के मुख्यमंत्री प्रकाशसिंह बादल के साथ उनके घने संबंध थे। भाषा का ज्ञान कभी व्यर्थ नहीं जाता। जैसे पाठक जी के पिता को कुछ अनहोनी का इलहाम हो गया था और वह समय रहते ही लाहौर छोड़ कर जालंधर आ गये थे वैसे ही मेरे पिता ने भी 5 अगस्त, 1947 को रावलपिंडी छोड़ दी थी और लाहौर से होते हुए हम लोग बस्ती के पास टिनिच, जिसे आमा बाजार भी कहते हैं, पहुंच गये थे।

था तो उस वक्त हिंदुस्तान एक, सूबों को लोग अपने अपने हिसाब से याद रखते या किया करते थे जैसे कि पश्चिमी पंजाब में इसे लोग'हनूर' कहा करते थे। ऐसा अपने कुलदेवता की वजह से होता होगा। हमारे अज़ीज़ पत्रकार विवेक शुक्ल के दादा और पिता रावलपिंडी में रहते थे लेकिन अपनी पृष्ठभूमि वह उत्तरप्रदेश बताते थे।ऐसे ही गीतकार शैलेंद्र (फ़िल्म तीसरी कसम के निर्माता) का जन्म रावलपिंडी में हुआ था लेकिन वह खुद को बिहार का कहते थे। क्योंकि शैलेन्द्र के पिता जी का जन्म बिहार के आरा जिला अंतर्गत किसी गांव में हुआ था । ऐसी सोच के बारे में उनकी अपनी राय हो सकती है लेकिन मैंने और शायद सुरेंद्र मोहन पाठक ने भी ऐसी सोच से दूरी इसलिये बनाये रखी कि तब भारत एक था औऱ उसमें सभी संस्कृतियों, जातियों, धर्मों, संप्रदायों, समुदायों के लोग बेखौफ और बिना किसी भेदभाव के निवास किया करते थे। आज के उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश,बंगाल,ओड़िसा, राजस्थान आदि के लोग पूरे भारत के नागरिक थे और वे कहीं भी जाकर बस सकते , ज़मीन खरीद सकते, संपति खड़ी कर सकते थे। कई उदाहरण हैं जैसे सच्चिदानंद वात्स्यायन अज्ञेय का जन्म बेशक़ कुशीनगर में हुआ लेकिन उनके पिता पंडित हीरानंद शास्त्री लाहौर निवासी थे।

बाद में वात्स्यायन जी ने भी लाहौर में उच्च शिक्षा प्राप्त की, क्रांतिकारी का जीवन भी लाहौर और उसी पंजाब में बिताया। वह जितनी अच्छी अंग्रेज़ी, हिंदी, संस्कृत, बंगला और फ़ारसी बोल सकते थे पंजाबी में भी उतने ही सहज थे। उद्योगपति संजय डालमिया भी लाहौर जन्मा हैं और आज कई डालमिया परिवार अमृतसर और उसके आसपास इसलिये रहते हैं कि देश के विभाजन के बाद उन्हें लाहौर और रावलपिंडी छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा था। उन दिनों लाहौर और अमृतसर जुड़वां नगर थे वैसे ही जैसे बम्बई और कराची या आजकल रावलपिंडी और इस्लामाबाद। कभी रावलपिंडी को दिल्ली का जुड़वां शहर माना जाता था। सुरेंद्र मोहन पाठक की उर्दू की प्रारंभिक पढ़ाई उनकी निरंतर ज्ञान पिपासा बढ़ाती रही। पहले अमृतसर में अपने मामा के घर उपलब्ध किताबें पढ़ते रहे। मुंशी प्रेमचंद की गोदान उन्होंने उर्दू में पढ़ी। वहीं रहते हुए उन्हें जासूसी नॉवेल पढ़ने का चस्का भी पढ़ गया।

फिर क्या था दिल्ली आकर हर किस्म के उपन्यासों को पढ़ने का उन्हें नशा सवार हो गया। कृशन चंदर की सारी किताबें चाट गये, राजेंद्र सिंह बेदी को पढ़ा,ख्वाजा अहमद अब्बास को पढ़ा। बेदी की एक चादर मैली सी ' तथा अब्बास की ;चार दिल चार राहें;माया में कई किश्तों में छपी थी वह भी पढ़ गये। एक चादर मैली सी उन्हें ज़्यादा पसंद आयी । पाठक जी ने इस्मत चुगताई, सआदत मंटो, वाजिद तबस्सुम, अहमद नदीम कासिमी के अलावा गुलशन नंदा, गोबिंद सिंह, वेद प्रकाश शर्मा जैसे लेखकों को पढ़ने के साथ अंग्रेज़ी में जासूसी और रहस्यवादी किताबें लिखने वाले लेखकों को भी पढ़ा।

जासूसी उपन्यास और उससे संबंधित सभी पत्रिकाओं खास तौर पर;जासूसी दुनिया के वह दीवाने थे। दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी का सदस्य बन जाने के बाद उन्हें किताबों और पत्रिकाओं की कोई कमी नहीं रही और उन्होंने खूब अध्ययन भी किया। अलावा लाइब्रेरी के सुरेंद्र मोहन पाठक को पटरी और फुटपाथ और छोटी मोटी अखबार की दुकानों से जो भी हाथ लगता पढ़ जाते।ऐसा लगता कि उनका कोई बड़ा मिशन है जिस की तैयारी में वह जीजान से जुटे हुए हैं। सुरेंद्र मोहन पाठक डिग्रीधारी लेखक हैं। वह एमएससी होने के अलावा इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियरिंग में भी डिप्लोमाधारी हैं। शायद ही कोई जासूसी, लुग्दी या रहस्यमयी किताबें लिखने वाला उन जैसा पढ़ा लिखा होगा। यदि उनके नाम तीन सौ से अधिक उपन्यास हैं तो उनके लिखने के पीछे उनकी शिक्षा, परिश्रम, दयानतदारी, समर्पण और प्रतिबद्धता की अनदेखी नहीं की जा सकती। बावजूद इसके उन्हें कई प्रकाशकों और साथी लेखकों की जिल्लत झेलनी पड़ी। फिर भी वह अपने मिशन में जीजान से जुटे रहे। उन्हें अपने बचपन के दोस्त औऱ स्कूल के दिनों के सहपाठी वेद प्रकाश काम्बोज की उपेक्षा का सामना करना पड़ा ।

उस वक़्त के स्थापित और प्रकाशकों के करीबी माने जाने वाले ओम प्रकाश शर्मा ने तो हद ही कर दी । सुरेंद्र मोहन पाठक ने एक बार बताया कि मैंने उनका हुक्का भरा, चिरौरी की, तब कहीं जाकर उन्होंने प्रकाशक से सिफारिश की और एक उपन्यास छपवा दिया वह वैसा ही दौर था, पेपरबैक का युग था। हर कोई प्रकाशक बन गया, किताबें बेचने वाला भी और स्टेशनरी वाला भी। कुछ पत्रिकाएं पूरा का पूरा उपन्यास अंक निकाला करती थीं। लेखकों का मेहनताना एक सौ रुपये से दो ढाई तीन सौ तक। कितने फर्मे का नावेल है उसी हिसाब से पैसे दिये जाते थे। एक फर्मे में सोलह पेज होते हैं। कुछ पब्लिशर तो;भूत; लेखकों से लिखवाया करते थे। एक बार भुगतान कर देने के बाद वह पुस्तक उनकी हो जाया करती थी। लेकिन सुरेंद्र मोहन पाठक न तो ;भूत लेखक बने और न ही बिना रॉयल्टी के अपने उपन्यास किसी के पास बेचे। सुरेंद्र मोहन पाठक को हालात का सामना करने की आदत पड़ गयी थी। इस बीच उनकी नौकरी इंडियन टेलीफोन इंडस्ट्रीज में इंस्पेक्टर ग्रेड;बी; के तौर पर लग गयी। उनका काम था एक्सचेंज बेचना, उसे इंस्टाल करना, उसका रखरखाव देखना और खराब होने की हालत में मरम्मत भी करना। पाठक अपने इस गजब के पद को मिस्त्री से बड़ा नहीं मानते थे। उनका दफ्तर दरियागंज, अंसारी रोड में था। अपने इस काम के साथ उनका लेखन का कार्य भी चलता रहता। 1963 में उनका पहला उपन्यास छपा पुराने गुनाह नये गुनहगार दूसरा था समुद्र में खून। लेकिन बीस महीने तक उन्हें ;खेद वाली स्लिप ही प्रकाशकों से मिलती रहीं।

बावजूद इसके 146 उपन्यासों के बाद उनकी किस्मत ने अंगड़ाई ली और शोहरत ने उनके द्वार पर दस्तक दी।पाठक ने जेम्स हेडली चेज और इयान फ्लेमिंग के उपन्यासों का हिंदी में अनुवाद भी किया। उनके उपन्यासों के तीन चरित्र;विमल,;सुनील; तथा ;सुधीर कोहली बहुत लोकप्रिय हुए। विमल सीरीज आधुनिक रॉबिनहुड की थी जबकि सुनील सीरीज खोजी पत्रकार की और सुधीर कोहली दार्शनिक जासूस की है। दिल्ली का ;तंदूर; तथा विकासपुरी में UTI बैंक में मानव बम डकैती के मामले सुरेंद्र मोहन पाठक के उपन्यासों की कॉपी थे।

इसी प्रकार फ़िल्म आखिरी रास्ता; उनके नावेल;हार जीत पर आधारित है जबकि;रईस उनके उपन्यास मवाली पर। कई फ़िल्म निर्माता उनके उपन्यासों पर फ़िल्म बनाना चाहते हैं लेकिन पाठक तैयार नहीं होते। उनके दो उपन्यासों का अंग्रेज़ी में अनुवाद भी हुआ है जिनके बारे में अमेरिकी साप्ताहिक पत्रिका टाइम में चर्चा हुई थी । अभिनेत्री गुल पनाग ने उन्हें अपनी फिल्म रण के प्रीमियर पर आमंत्रित किया था जहां बच्चन परिवार और फ़िल्म निर्देशक राम गोपाल वर्मा भी मौजूद थे। आज पाठक के उपन्यास का प्रारंभिक प्रिंट आर्डर 50 हज़ार से कम का नहीं होता। उनका एक उपन्यास पैंसठ लाख की डकैती के 21 संस्करण छप चुके हैं जिन की संख्या पांच लाख से कम नहीं होगी। आज उनका ऐसा कोई उपन्यास नहीं जिसके चार पांच संस्करण न छपते हों। सुरेंद्र मोहन पाठक को जासूसी उपन्यासों का सम्राट माना जाता है ।उनके उपन्यासों की तीन करोड़ से ज़्यादा प्रतियां छप चुकी हैं। शायद ही कोई साहित्यिक समारोह होता होगा जहां उनकी शिरकत न होती हो। टीवी चैनल हो या अंग्रेज़ी की;इंडियन एक्सप्रेस अथवा द हिन्दू जैसे समाचारपत्र जिन्हें पाठक का इंटरव्यू छापने में गौरव प्राप्त करने का अनुभव न हुआ हो। इंडिया टुडे; के हिंदी संस्करण ने तो उनपर कवर स्टोरी छापी थी। आजकल हार्पर कॉलिंस औऱ वेस्टलैंड जैसे प्रकाशक उनकी आत्मकथा और उपन्यास छापने में अपने आप को गौरवान्वित महसूस करते हैं। हिंदी को ऐसा महत्वपूर्ण स्थान दिलाने में पाठक की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

सुरेंद्र मोहन पाठक के व्यक्तित्व के एक पक्ष से शायद ही लोग वाकिफ हों। वह बहुत अच्छे गायक भी हैं। उनकी लेखनी और भाषा की रवानगी में जिस तरह की मुरकिया देखने को मिलती हैं उसे एक अच्छे गायक की निशानी माना जाता है। जालंधर के DAV कॉलेज में उन्होंने बीएससी की पढ़ाई तीन बरस (1958-61) होस्टल में रहकर की थी। उस होस्टल के ग्राउंड फ्लोर में पाठक रहते थे और पहली मंजिल पर जगजीत सिंह। जी हां वही जगजीत सिंह जिन्हें हम सब ग़ज़ल सम्राट के तौर पर जानते हैं। पाठक उनके बारे में फरमाते हैं, कॉलेजमेट, होस्टेलमेट, क्लासमेट लेकिन सेक्शनमेट नहीं, अलबत्ता लैब मेट कह सकते हैं। एक दिन सुबह पाठक साहब कोई फिल्मी गाना गुनगुना रहे थे, ऊपर से जगजीत सिंह उतरे और उन्हें गाता-सा देखकर पूछा,गाते हो। पाठक साहब ने हामी भर दी। जगजीत सिंह ने उन्हें निमंत्रण देते हुए कहा कि कल से मेरे साथ रियाज़ करो। पाठक जी ने जब समय पूछा तो उन्होंने सुबह पांच से सात बताया। पाठक साहब ने अपनी मजबूरी ज़ाहिर करते हुए कहा कि वह तो पौने नौ से पहले उठते नहीं और नौ बजे का कॉलेज होता है। इसप्रकार पाठक साहब गायक बनते बनते रह गये।वह कहते हैं कि जगजीत सिंह जन्मजात गायक थे । वह कभी भी किसी भी देश का गाना गा सकते थे,

कहीं का साज़ बजाने में उन्हें महारत हासिल थी। कॉलेज के प्रोग्राम में तो वह गाते ही थे दोस्तों यारों के साथ बैठ कर भी महफ़िल सजा लिया करते थे। मेरा और सुरेंद्र मोहन पाठक का नाता कुछ यों है। वह कहते हैं किमैं आपको दिनमान के दिनों से जानता हूं। कभी कभी अंसारी रोड से जब आप स्कूटर पर निकलते थे तब आप दीख जाया करते थे।' मैं भी पाठक साहब को उनकी लेखनी से तो जानता ही था जब कभी दोपहर को प्रेस क्लब आते तो दूर से दीख जाया करते थे। मेरे मित्र हैं जस्विन जस्सी। एक दिन उनके पास पाठक साहब आये। दोनों पुराने परिचित हैं। जस्सी ने उनसे मेरा परिचय कराते हुए जब मेरे बारे में कुछ कहना चाहा तो उन्हें रोकते हुए बोले, मैं इन्हें बहुत अरसे से जानता हूं रूबरू आज मिले हैं। इस प्रकार पाठक साहब से दोस्ती की शुरुआत हुई। दोपहर को जब भी कभी उनका प्रेस क्लब आना होता तो वह मिले बगैर नहीं जाते। एक दिन खास तौर पर अपनी नयी पुस्तक जो लरे दीन के हेत देने के लिये क्लब आये। साथ में यह भी कहा कि कभी कभी शाम को भी आ जाया कीजिये । कुछ वक्फे बाद संडे मेलके मेरे सहयोगी कमल नयन पंकज ने शाम को मिलने के लिए प्रेस क्लब इस आश्वासन के साथ आने को बुलाया कि लौटती बार वह मुझे घर छोड़ देंगे। संडे मेल के कुछ और साथी मिले। पता लगा कि सुरेंद्र मोहन पाठक बाहर बैठे हैं।मैं उन्हें भीतर लेकर आया और अपने साथियों से परिचय कराया। उनके हाथ में इंडिया टुडे हिंदी की प्रति थी जिस में उनपर विशेष कवर स्टोरी थी, देखी, बधाई दी। उन्हें मेरे शाम को प्रेस क्लब आने की खुशी हुई। अब हम लोगों की करीबी बढ़ने लगी। कभी कभार उनसे फोन पर बात भी हो जाती। एक दिन उनकी बेटी का व्हाट्सएप पर संदेश आया कि सुरेंद्र मोहन पाठक की 50वी वैवाहिक वर्षगांठ पर शाम को एक आयोजन है। बाद में पाठक साहब ने विशेष तौर फ़ोन करके कहा कि एक दिन तो मेरे लिए रात को निकल ही सकते हो। जस्सी के साथ प्रोग्राम फिट किया और हम दोनों उन्हें बधाई देने के लिए पहुंच गये। पाठक साहब बहुत खुश। गले मिले अपनी पत्नी से मिलाने ले गये। उनके बेटा बेटी भी प्रसन्न हुए।

बाद में पाठक साहब सभी मेहमानों को छोड़ कर हमारे साथ ही रहे। उस पार्टी में मनमोहन चंद्र शर्मा (दोस्तो के लिए MMC) मिल गये। पता चला कि पाठक साहब से उनके पुराने संबंध हैं। एमएमसी कई संचार मंत्रियों के ओएसडी रहे हैं और हाल ही में बीएसएनएल से रिटायर हुए हैं। मेरे लिए खुशी की बात ही थी क्योंकि कौशांबी में वह मेरे पड़ोसी हैं और उनका साथ मिल जाने से मेरा सफर सहज हो गया था। इसके बाद पाठक से संबंध बरकरार हैं। उन्होंने अपनी आत्मकथा की दोनों पुस्तकें कृपापूर्वक भेंट की हैं जिनके माध्यम से पाठक जी के व्यक्तित्व के बारे में बहुत कुछ जानने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। सुरेंद्र मोहन पाठक एक ऐसे सेलेब्रिटी हैं आज भी खुद को सामान्य व्यक्ति से ज़्यादा नहीं मानते। यह है उनकी सिफत। सुरेंद्र मोहन पाठक ऐसे ही सफलता की सीढ़ियां चढ़ते रहें और उनका आदर सत्कार बढ़ता रहे यही दिली दुआ है।

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