महिला सुरक्षा की दरकार

शिव कुमार खरवार

हाल ही में ,एनसीआरबी (National Crime Records Bureau) ने देश में होने वाले अपराधों से सम्बन्धित आंकड़े जारी किये , साल 2020 के आंकड़े बताते है कि पिछली सरकार के मुकाबले इस सरकार के कार्यकाल के दौरान उत्तर प्रदेश में महिला उत्पीड़न के मामलों में ज्यादा बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है , जो यह बताने के लिए पर्याप्त है कि महिला उत्पीड़ना को लेकर सरकारी महकमे कितने सजग है , बची कुची कसर साल 2021 में आई , राष्ट्रीय महिला आयोग की रिपोर्ट ने पूरी कर दी, जिसने महिला सुरक्षा के लिए मुस्तैदी के सरकारी दावे उलट दिये , महिला सुरक्षा को लेकर मुस्तैदी कितनी दुरस्त है ? यह , तो एक गहन विचार का मसला है | क्योंकि महिला सुरक्षा को लेकर वैश्विक पटल की छवि भी कोई खास बेहतर नहीं रही है |

वैश्विक स्तर पर बड़े पैमाने पर महिलांए हो रही उत्पीड़न का शिकार

संयुक्त राष्ट्र के महिला संगठन द्वारा वैश्विक स्तर पर महिला उत्पीड़न को लेकर जारी की गई, एक रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि साल 2020 में दुनियाभर में 81 हजार महिलाओं एवं लड़कियों की हत्या की गई | इसमें 58 प्रतिशत यानी तकरीबन 47 हजार मामलों से जुड़े हुए शख्स या तो महिला के परिवारवाले पाए गए या फिर उनके सहयोगी| यदि महिला हिंसा की व्यापकता की बात करे , तो दुनियाभर की 73.6 करोड़ महिलाओं में से ‘प्रत्येक तीन में से एक महिला’ उत्पीड़न का शिकार हुई है| हालांकि, इसमें यौन हिंसा के मामले शामिल नहीं हैं, लेकिन उसके बावजूद महिला उत्पीड़न की स्थिती भयावह है|

यौन हिंसा से जुड़े मामले कम डराने वाले नहीं है | दुनियाभर में तकरीबन 6 प्रतिशत महिला यौन हिंसा का शिकार होती है | विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक, दुनियाभर में प्रत्येक तीन में से एक महिला शारीरिक अथवा यौन हिंसा का शिकार बनाई जाती है, जबकि दुनिया के 158 देशो में महिला सुरक्षा के मद्देनजर घरेलू हिंसा रोकथाम के लिए घरेलू हिंसा का कानून पारित किया गया है, साथ ही 141 देशो ने महिला सुरक्षा को दुरस्त करने के लिए रोजगार के क्षेत्र में यौन उत्पीड़न पर पाबन्दी लगाने के उद्देश्य से भी कानून लागू किये गए है |

वहीं प्रशासनिक व्यवस्था का हाल भी महिला सुरक्षा को लेकर सजग प्रतीत नहीं होता, क्योंकि तकरीबन 40 प्रतिशत से भी कम मामलों में महिला द्वारा उत्पीड़न के विरुद्ध कानून के समक्ष गुहार लगाये जाते है , जिसमें से मात्र 10 प्रतिशत की ही शिकायत दर्ज की जाती है |

देश में महिलाओं की सुरक्षा पर विचार करने की आवश्यकता

हाल ही में यूनाइटेड नेशन ड्रग एंड क्राइम के द्वारा “ Research brief: What crime and helpline data say about the impact of the COVID-19 pandemic on reported violence against women and girls ” नामक शीर्षक से जारी एक रिपोर्ट में बताया कि देश में लॉकडाउन के बाद महिला उत्पीड़न से सम्बन्धित घरेलू हिंसा के मामले में बढोत्तरी दर्ज की गई | वहीं दूसरी तरफ राष्ट्रीय महिला आयोग की तरफ से , जो आंकड़े जारी किये गए हैं , उनके मुताबिक साल 2020 की तुलना में साल 2021 में महिला उत्पीड़न के मामलों में 30 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है, जहां साल 2020 में महिला उत्पीड़न के 23 हजार से अधिक मामले दर्ज किये गए , वहीं साल 2021 में यह संख्या बढ़कर 30 हजार से अधिक हो गई , जिसमें आधे से ज्यादा मामलें अकेले उत्तर प्रदेश राज्य में दर्ज किये गए | साल 2021 में महिला उत्पीड़न को लेकर जारी किये गए लगभग 34 हजार मामलों में साल 2014 के मुकाबले लगभग तीन हजार ही कम पाए गए|

यदि तथ्यों पर गौर फरमाया जाए , तो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कार्यकाल के बीते 4 वर्षो में प्रदेश के महिला उत्पीड़न मामलों की संख्या में निरंतर न केवल बढ़ोत्तरी होती रही , वरन लगातार 4 वर्षो में से तीन वर्ष तक महिला उत्पीड़न के मामलों में उत्तर प्रदेश राज्य देश के प्रथम स्थान पर बना रहा |

एनसीआरबी के आंकड़ो के मुताबिक साल 2017 में महिला उत्पीड़न के लगभग कुल 56011 मामले दर्ज किये गए जबकि साल 2018 में यह संख्या बढ़कर 59445 हो गई | वहीं साल 2019 में यह आंकड़ा 59853 था | साल 2020 में भी ये सिलसिला जारी रहा , एनसीआरबी 2020 की रिपोर्ट के मुताबिक प्रत्येक 2 घंटे में, महिला ने रेप का मामला दर्ज कराया तो वहीं, नाबालिग के खिलाफ प्रत्येक 90 मिनट में एक रेप उत्पीड़न का मामला सामने आया। साल 2017 में आई जेंडर इनइक्वलिटी इंडेक्स में भी भारत 123वें पायदान पर रहा, जो यह बताने के लिए पर्याप्त है कि भारतीय समाज की सोच आज भी कितनी पूर्वधारणा से ग्रसित है |

सम्भवतः पूर्वाग्रह से ग्रसितता के कारण ही आज भी समाज में महिलाओ की स्थिती दयनीय बनी हुई है | आज भी पितृसत्तात्मक की सोच की बेली पर महिला की बलि चढ़ाई जा रही है | आमतौर पर ऐसा देखने को मिलता है कि हर समाज अपने समाज को बहुत प्रोग्रेसिव बताना एवं दिखाना चाहता है , भले ही वह व्यावहारिकता के धरातल पर सच्चाई से कितना ही दूर क्यों न हो , लेकिन लोग बड़ी – बड़ी डिगे हांकने से नही थकते | किन्तु वास्तविकता यह है कि भारतीय परिवेश की महिलाएं आज भी ब्रिटेन जैसे देशो की महिला की तुलना में 150 साल पीछे है |

विडम्बना ऐसी है कि हमारा समाज पितृसत्तात्मक मानसिकता का शिकार है, जहां एक ओर महिलाएं इसकी बलि चढ़ रहीं, तो वही दूसरी ओर पुरुष भी इससे अछूता नहीं है | पितृसत्तात्मक मानसिकता ने पुरुष को एक कठोर सांचे में ढाल दिया है | पुरुष रो नही सकता , पुरुष विलाप नही कर सकता , पुरुष को दर्द नही होता जैसी भ्रांतियां समाज में चलायमान है | मै इन पुरुषवादी मानसिकता को बतलाना चाहता कि महिलओं के समान ही पुरुष में भी भावना की प्रधानता पाई जाती है | पितृसत्तात्मक सोच दो धारी तलवार की तरह है, जो स्त्री को अपना शिकार, तो बनाती ही है, लेकिन पुरुष भी इसका शिकार हो रहे है |

देश में केवल महिलाओं के साथ हो रही हिंसा ही निंदा की पात्र नही है अपितु अपराध की समस्या का सामना महिला एवं पुरुष दोनो ही वर्ग के लोगो को करना पड़ रहा है | हाल ही में आए, एनसीआरबी द्वारा जारी किए गए आंकड़े यह बताते है कि देशव्यापी अपराध के मामलो में साल 2019 के मुकाबले साल 2020 में कुल 28 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई | यदि हम केवल दो सालो के बीच के जाति आधारित आकड़ो का विश्लेष्ण करे , तो हम पाते है कि साल 2019 के मुकाबले साल 2020 में जाति आधारित अपराध में अनुसूचित जाति के लोगो के खिलाफ होने वाले अपराध में 9.4 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई |

वहीं इन दो सालों के बीच जाति आधारित अपराधों में अनुसूचित जनजाति के लोगो के साथ होने वाले अपराध में भी कोई खास सुधार नही हुआ है | यानी कि साल 2019 के मुकाबले साल 2020 में जाति आधारित अपराध में अनुसूचित जनजाति के लोगो के विरुद्ध होने वाले अपराध में भी 9.3 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई और इस साल यानी कि 8 मार्च 2022 को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की थीम भी “ ब्रेक बायसेज ” यानी कि पूर्वाग्रह को तोड़े रखा गया है | बिना पूर्वाग्रह को तोड़े स्त्री एवं पुरुषो की बीच खुदी लम्बी खाई को पाटा नहीं जा सकता है |

हाल ही के दिनो में सिनेमाघर में लगी “ गंगूबाई काठियावाड़ी ” नामक फिल्म में परम्परागत रुप से चली आ रही है , देहगत व्यापार की प्रथा को तोड़ते दिखाया गया , जिसमें गंगू का किरदार निभाते हुए , आलिया भट्ट बोलती है , “ इज्जत से जीना का अरे ! जब शक्ति , सम्पत्ति , सदबुद्धि तीनो ही औरते है , तो इन मर्दों को किस बात का गुरुर |” एक अन्य जगह पर गंगूबाई का किरदार निभते हुए , आलिया भट्ट बोलती है कि “ हम दिल में आग और होठो पर गुलाब रखते है , मिटाकर तुम्हारे मुर्दों की भूख हम तुम औरतो का रुवाब रखते है | ” इस फिल्म में देहगत व्यापार की प्रथा में प्रचलित पूर्वाग्रह पर बहुत ही सटीकढंग से प्रहार किया गया है | एक अन्य स्थान पर इस फिल्म में , महिला की व्यक्तिगत पहचान का मसला भी उठाया गया है , जहां स्कूल में दाखिले के समय फादर गंगूबाई से बच्चो के पिता का नाम पूछता है ! बाप का नाम ? जिस गंगूबाई का तर्क हावी होता प्रतिक होता है , पिता का नाम जरुरी है क्या ? चलो पिता का नाम देवान्नद लिख दो | ” इस समय में बदलाव की जरुरत है , जरुरत है , समाज में प्रचलित तमाम प्रकार के पूर्वाग्रह के दरकिनार करने की |

संक्षिप्त रूप में यह कह सकते है कि ये पितृसत्तात्मक सोच एक दो धारी तलवार की भांति है , जो स्त्री के साथ ही पुरुष को भी अंदर से निगलती जा रही है | इस सोच ने समाज को अंदर से खोखला बना दिया है | इस खोखलेपन से उबरने के लिए समाज को पितृसत्तात्मक सोच का त्याग करना होगा | तभी जाकर वास्तविक अर्थो में समानता पर आधारित समाज होगा | इस सृष्टि ने केवल महिला और पुरुष बनाया है, लेकिन समाज ने महिला और पुरुष के बीच दीवार बना दी |

पितृसत्तात्मक सोच की दिवार को गिराने के लिए यह जरुरी है कि महिला न केवल संक्रिय राजनीति में भाग ले बल्कि आर्थिक रूप से भी सम्पन्न बने , शिक्षा के क्षेत्र में महिला को तेजी में बढ़ाया जाए , हो सके , तो महिलाओं को पुरुषो के समान लाने के लिए मानव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में रियायत दी जाए | चूंकि आज भी भारत की बहुत बड़ी संख्या भीषण गरीबी , भूखमरी का सामना कर रही जैसा कि हाल ही में यानी वर्ष 2020 – 2021 के नीति आयोग की रिपोर्ट में बताया गया कि आज भी देश का बहुत बड़ा हिस्सा विकट गरीबी का सामना कर रहा है | इसलिए जितना हो सके रियायत दी जाए , हो सके तो मानव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में महिला को पुरुष के समकक्ष लाने के लिए आरक्षण की नीति को तब तक लागू की जाए , जब तक स्त्री पुरुष के समतुल्य न खड़ी हो जाए |

लेखक : शिव कुमार खरवार, शोधार्थी , राजनीति विज्ञान विभाग  ,बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय

( केन्द्रीय विश्वविद्यालय ) , विद्या विहार  रायबरेली रोड ,  लखनऊ (  उत्तर प्रदेश – 226025  )

ई – मेल –  Kumar95shiv@gmail.com

Leave a Reply

Your email address will not be published.

7 + seven =

Related Articles

Back to top button