बब्बा की याद में

अतीत के ग्राम जीवन की एक झलक

विश्वव्यापी कोरोना महामारी का दुष्प्रभाव शहरी जीवन पर सर्वाधिक पड़ा है. अधिकॉंश उद्योग व्यापार , होटल, परिवहन  ठप्प हो गये हैं . रोज़ी रोटी छिन जाने से करोड़ों लोग भूख से बेहाल होने पर जान बचाकर अपने पुश्तैनी गाँवों की ओर जैसे- तैसे लौट चुके हैं . गाँव में अब भी पड़ोसी से मदद  मिल जाती है. देश विदेश में लाखों और लोग लौटने के लिए  यातायात खुलने का इंतज़ार कर रहे हैं . पर अब गॉंव भी पहले जैसे नहीं रहे . विशेषकर हुनरमंद  और ज़्यादा पढ़े – लिखे लोग रोज़गार के लिए नगरों  को गए और वहीं बस गए. गाँव उजड़ गए. खेती घाटे का सौदा हो गयी.ऐसे में पुराने जमाने के आत्म निर्भर गाँवों की याद आना स्वाभाविक है .  राकेश कुमार ओझा के इस संस्मरण में प्राचीन गॉंव की एक झलक सहज रूप में मिलती है . सम्पादक 

 राकेश कुमार ओझा   

 अपने अस्तित्व की जो सब से पुरानी याद मेरे मानस पटल पर उभरती है वह निस्संदेह अपनी जन्म स्थली उपरौड़ा की ही है। हमारा यह गांव इलाहाबाद (अब प्रयागराज) जिले की मेजा तहसील  में सिरसा बाजार के नज़दीक और शहर से करीब 30-35 किमी.दूरी पर स्थित है।वर्ष 1960 में जब मैं करीब पांच वर्ष का था, मेरा नाम समीपस्थ गांव लोहारी के सरकारी प्राइमरी स्कूल में लिखाया गया था। अपने बस्ते में एक छोटी बोरी और लकड़ी की तख्ती रख कर ले जाना मुझे अभी तक याद है। नई पीढ़ी को यह जानकारी शायद मज़ेदार लगे कि यह बोरी कक्षा में अपने बैठने के काम आती थी। स्कूल में कक्षा दो में बैठते मुझे दो-तीन दिन ही हुए थे कि गुरूजी ने स्वतः प्रेरणा से मुझे कक्षा तीन के  लायक़ मानकर कक्षा तीन में भेज दिया। मुझे लगता है कि घर में ही मुझे माताजी और बड़ी बहनों ने इतना पढ़ा दिया होगा कि लोहारी के स्टैण्डर्ड से मैं कक्षा तीन लायक़ हो गया था।लोहारी के स्कूल में जाते महीने भर भी नहीं बीता होगा कि गर्मी की छुट्टियां शुरू हो गईं।लेकिन स्कूल जाने वाले दिनों में एक दिन स्कूल न जाने की जिद का नतीजा यह हुआ कि बब्बा के हाथों मेरी अच्छी पिटाई हुई।वैसे मैं उनका दुलारा था लेकिन स्कूल न जाने की जिद पर वह अपना गुस्सा रोक नही पाए।मैं ज़मीन पर पीठ के बल लेटकर विरोध में हाथ पैर चलाने लगा।इतने में मुझे बचाने रसोई से हड़बड़ी  में खाना पकाना छोड़ हाथ में कलछुल लिए मावा वहाँ आ गईं । फिर वह कलछुल छीन कर बब्बा ने दो तीन कलछुल भी रसीद की।मैं काफी चीखा चिल्लाया लेकिन उस दिन स्कूल जाने से बच गया।

       प्राइमरी पाठशाला लोहारी की अवधि और याद रहने लायक वृत्तान्त बस इतना ही है। इसके बाद वर्ष 1961 में हम लोग इलाहाबाद शहर के नेतानगर, कीडगंज मुहल्ले के अपने मकान में रहने आ गए। कीडगंज में घर के सामने की गली में जाने पर नगर महापालिका का प्राइमरी स्कूल था, जिसमें मेरा नाम कक्षा चार में लिखा दिया गया।वास्तव में यहीं पर मेरी प्रारम्भिक पढ़ाई विधिवत शुरू हुई और मैने यहीं से कक्षा चार और पाँच पास किया। कक्षा चार में मेरे अध्यापक थे प० राम किशोर मिश्र और कक्षा पांच में प्रधानाध्यापक प० हरिहर प्रसाद तिवारी । इन दोनों  की मुखाकृति व वेष भूषा मुझे आज भी नहीं भूली है।

   कक्षा पाँच पास करने के बाद कक्षा छः में एडमिशन हेतु मैं गवर्नमेंट इंटर कॉलेज (जी आई सी) में  एंट्रेंस परीक्षा में बैठा और सफल रहा। मुझे अभी तक याद है कि यह परीक्षा किसी प्रतियोगिता परीक्षा से कम नहीं थी। जी आई सी में कक्षा छः और सात की पढ़ाई की। कक्षा सात की पढ़ाई के दौरान ही मैं आवासीय पब्लिक स्कूल छात्र वृत्ति हेतु जिला व राज्य स्तर की प्रतियोगिता परीक्षाओं में सफल हुआ । परिणाम स्वरूप जुलाई 1965 में मेरा दाखिला कॉल्विन तालुक़दार्स कॉलेज लखनऊ में हो गया और मैं वहाँ के छात्रावास अंजुमन हाउस पहुँच गया। वहाँ तीन साल रहकर इंटरमीडिएट में फिर जी आई सी इलाहाबाद आया और फिर वहीं एम ए तक की पढ़ाई पूरी की।

      पढ़ाई लिखाई के इस पूरे दौर में प्रति वर्ष गर्मियों की छुट्टी में हमारा दो-ढाई महीने का समय उपरौड़ा में बीतता था और हम लोग बड़े मन से इसका इंतजार करते थे। आज का ज़माना होता तो शहर के टेलीविजन, इंटरनेट और फ़ास्ट फ़ूड को छोड़कर कोई गांव जाने का नाम न लेता । लेकिन हम लोगों के लिए तब उपरौड़ा जाना बहुत आकर्षक था क्योंकि वहाँ सही मायने में ग्रीष्मावकाश का आनन्द मिलता था। उपरौड़ा में रहने का मतलब था,  कोर्स की पढ़ाई से पूरी छुट्टी के साथ ही  बब्बा व मावा के दुलार-संरक्षण में कुछ अतिरिक्त आज़ादी में छुट्टियां बिताना।

 

मई जून के महीनों की विकट गर्मी में सुबह नौ दस बजे से लेकर करीब शाम छः बजे तक प्रचण्ड धूप  और गर्म हवाओं के कारण घर से बाहर निकलने लायक़ नहीं रहता था। हमारे घर में बड़ों के लिए यही चिंता की बात थी कि कोई बच्चा धूप और लू में न निकले और घर में सुरक्षित रहे। गांव में उस समय दो तीन जगहों पर कोठरी या मड़ई में ताश खेलने वालों की मंडली जुटती थी।  हम लोग इन मंडलियों में शामिल होने के लिए स्वयं तो आतुर रहते ही थे, साथ ही शहरी मेहमान होने के नाते वहाँ विशेष स्वागत के पात्र भी थे। लेकिन भाइयों में छोटा होने के कारण मुझे प्रायः दर्शक ही बनकर रहना पड़ता। ताश के खेल में दर्शक बने रहने की तुलना में मेरे पास दूसरा बेहतर विकल्प था –  बब्बा के विशाल “गाट घर”  में पुस्तकों व पत्रिकाओं के भंडार में उनको उलटने – पलटने का आनंद प्राप्त करना।

    गाट-घर बब्बा का एक निजी आश्रम जैसा था, जो घर से लगा होने के बावजूद घर से बिलकुल अलग भी था।इसका नाम गाट घर इसलिए पड़ा क्योंकि पहले यह घर पास में ही रहने वाले एक व्यक्ति का था, जो रेलवे में गार्ड थे।यह घर बाबूजी ने उन्ही गार्ड साहब से खरीदा था इसीलिए ये गार्ड घर से गाट घर बन गया।इसमे बाहरी लंबा अहाता  सहिजन, तुलसी और गुलदाऊदी आदि के ढेर सारे पौधों या वृक्षों से हर भरा रहता था।अहाते के बाद उतना ही लंबा बरामदा था और उसके बाद उतनी ही लंबाई में दो बड़े बड़े कमरे बने थे। एक कमरे में बब्बा रहते थे, जहाँ दो या तीन बड़ी चारपाईयां (माचा) बिछी रहतीं थीं।दूसरे कमरे  में दो बड़े तख्तों पर मोटी मोटी ढेर सारी किताबें कपड़ों के बस्तों में बहुत करीने से रखी थीं और तीन चार टीन के बक्सों में भी ऐसी ही किताबें रखी थीं। गाट घर न केवल बहुत साफ सुथरा था, इसका निर्माण का स्तर भी अच्छा था। छतें काफी ऊंचाई पर पाटी गईं थी, जिसमे लकड़ी की मज़बूत कड़ियाँ लगीं थीं जो बहुत सुंदर दिखतीं थीं।कुल मिलाकर गाट घर  एक बढ़िया गेस्ट हाउस जैसा था जो आरामदेह व अपेक्षाकृत ठंडा भी था।

     बब्बा सदैव गाटघर में ही रहते थे और दिन में दो बार केवल भोजन करने के लिए मूल घर में जाते थे। गाटघर में ताला लगाकर ‘श्री राम जय राम जय जय राम’ कहते हुए जैसे ही वे घर में प्रवेश करते थे, वहां हड़बड़ी मच जाती थी – “पंडित आएन -पंडित आएन” और बड़ी तत्परता से उनका पीढ़ा व लोटा- गिलास में जल लग जाता था। कम से कम शब्द बोलकर वह चुपचाप भोजन करके उठ जाते थे।कभी-कभार ही, खाने के गुण दोष पर कुछ बेबाक टिप्पणी करते थे।उनका समय निश्चित रहता था और पता नहीं कैसे, बिना किसी घड़ी के, नसानी मावा की तैयारी पूरी रहती थी और एक मिनट भी इंतज़ार की नौबत नहीं आती थी। हमारे घर में दो मावा थीं, एक तो हमारी बड़ी मावा (बब्बा की पत्नी) और दूसरी उनकी देवरानी नसानी मावा, जिनके पति मात्र इक्कीस वर्ष की आयु में ही दिवंगत हो गए थे ( इसी कारण उनका नाम “नसानी” मावा पड़ गया था )। नसानी मावा इतनी मेहनती और कर्तव्य परायण थीं कि घर के सारे काम काज खुद ही करती थीं और बड़ी मावा को कुछ करने का मौका  बहुत कम ही  देती थीं। इसलिए बड़ी मावा जिनका नाम जमुना देवी था, ज्यादातर आराम से बैठी रहती थीं और अपनी निगाह और ज़ुबान से  ही घर की जिम्मेदारी संभालती थीं।

      हमारे बब्बा (पं सरयू प्रसाद) दुबले और लंबे  एकहरे बदन की कद काठी वाले थे और अधिकाधिक  पैदल चलने के अभ्यस्त थे।शायद इसी कारण वे अंतिम समय तक अपनी सीधी खड़ी काया में पूरी तरह स्वस्थ रहे । बब्बा के कर्मठ, आत्मनिर्भर और संघर्षशील व्यक्तित्व का निर्माण  बाल्यकाल से ही उनके समक्ष आईं  कठिन और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों का सहज प्रतिफल प्रतीत होता है। बब्बा ने अपने कुल की वंशावली तथा पूर्वजों के इतिहास पर एक पुस्तिका प्रकाशित की थी जिसके प्राक्कथन में उन्होंने अपने बाल्यकाल का विवरण अंकित किया है। तदनुसार, उनका जन्म वर्ष 1891 में हुआ था तथा सन 1903 में, जब वह मात्र 12 वर्ष के थे, महामारी में उनके माता पिता का निधन छः माह के अंतराल में हो गया था। उस समय उनके तीन छोटे भाई श्री वेणी माधव, श्री आदित्य प्रसाद एवं श्री तीर्थ प्रसाद क्रमशः 10, 8 एवं 5 वर्ष के थे। वह ऐसा अंधकार युग था, जब बाल विवाह बड़े गौरव की बात समझी जाती थी।सभी भाइयों के विवाह हो चुके थे और पांच-सात वर्ष के अंदर घर में चारों बहुएं आ गईं।गृहस्थी का सारा भार बब्बा के दुर्बल कंधों पर आ पड़ा। कुटुम्ब के तीन पट्टीदार परिवारों तथा कुछ अन्य हितैषियों के सहयोग से बड़ी कठिनाई में परिवार का पालन पोषण हुआ।कुछ समय तक बब्बा की पढ़ाई भी छूट गई थी, जो कि बाद में एक हितैषी की प्रेरणा से पूरी हुई। कालांतर में मिडिल पास करके ट्रेनिंग के उपरांत वे जिला बोर्ड में अध्यापक बन गए। यह सन 1912 की बात है।इसके बाद धीरे – धीरे कठिनाइयों के बादल छटने लगे और कुटुम्ब प्रगति के मार्ग पर अग्रसर हुआ। बब्बा के व्यक्तित्व और पारिवारिक पृष्ठभूमि के इस संक्षिप्त परिचय के बाद हम फिर गाट घर की कथा पर वापस लौटते हैं।

       गाट घर में  बब्बा की दिनचर्या बहुत नियमित होने के साथ ही बहुत व्यस्त भी थी। सिरसा के प्राइमरी स्कूल में लंबे समय तक अध्यापन तो मात्र जीविकोपार्जन के लिए था, उनकी  विशेष रुचि धार्मिक और आयुर्वेद संबंधी साहित्य के अध्ययन तथा सामाजिक विषयों में थी।मुझे स्मरण है कि कल्याण (गीता प्रेस,गोरखपुर) और गीता-संदेश नामक मासिक पत्रिकाएँ उनके पास नियमित रूप से डाक से आती थीं। इसके अलावा वे अनेक प्रकाशकों से पत्र व्यवहार करके अपने पसंद की पुस्तकें पार्सल से मंगाते थे। बब्बा श्री सनातन धर्म सभा तथा श्री सरयूपारीण ब्राह्मण सभा, सिरसा के मंत्री थे और आर्य समाज की गतिविधियों में भी सक्रिय रहते थे। सामाजिक विषयों पर लेखन के साथ ही वे समाज के अग्रणी  महानुभावों से नियमित  पत्र व्यवहार भी करते थे। बब्बा के द्वारा सामाजिक विषयों पर लिखी दो पुस्तिकाओं का प्रकाशन भी आज़ादी-पूर्व के वर्षों में हुआ था, जिनकी पुरानी प्रतियाँ मैंने वहाँ रखी देखी थी। इनमे एक थी- “छुआछूत प्रश्नोत्तरी”और दूसरी “पुनर्विवाह का कच्चा चिट्ठा।”दोनों पुस्तिकाओं के विषय उनके नाम से ही स्पष्ट हैं।

  बब्बा के पुस्तकालय कक्ष में उपलब्ध पुस्तकों में वाल्मीकि रामायण,महाभारत छः खण्डों में,समस्त उपनिषद, वेदों के भाष्य,हिंदी साहित्य की पुस्तकें, मासिक पत्रिकाओं के संकलन आदि सम्मिलित थे। उनके संग्रह में हिंदी भाषा में बाइबिल तथा क़ुरान शरीफ भी उपलब्ध था।इनके अतिरिक्त आयुर्वेद की अनेक दुर्लभ पुस्तकें जैसे, चरक संहिता, चिकित्सा  चंद्रोदय, अभिनव निघंटु तथा रोगों के उपचार से सम्बंधित अन्य पुस्तकें भी उपलब्ध थीं। अपने विशद अध्ययन तथा गहरी रुचि के कारण उन्होंने एक कुशल वैद्य के रूप में भी अपनी सेवाओं से घर परिवार सहित गांव तथा समाज के लोगों को लाभान्वित किया। अनेक औषधियां और चूर्ण आदि बनाने का कार्य भी गाट घर में बब्बा करते थे।

     गाटघर में बब्बा का रहन-सहन एक सन्यासी के जीवन के समान था। उनकी नियमित दिनचर्या में शाम को खरीदारी और मिलने जुलने हेतु सिरसा बाजार जाना सम्मिलित था लेकिन इसके अतिरिक्त वह कहीं भी नहीं जाते थे। गांव के लोग ही दवा इलाज या सलाह मशविरे के लिए उनके पास आते थे। बाल्यकाल में बब्बा के इस सान्निध्य के उपरांत बाद में   जब वे शहर में कीडगंज वाले घर आते थे, मुझे उनके साथ समय बिताने का अवसर मिलता था। मैं परिवार में बब्बा से ही सर्वाधिक प्रभावित रहा हूँ तथा वह भी मुझ पर विशेष स्नेह रखते थे। वे विचारों में अत्यन्त प्रगतिशील थे और वैज्ञानिक सोच रखते थे। धार्मिक कर्मकाण्ड, अंधविश्वासों व टोटकों में बिल्कुल विश्वास नहीं करते थे।

वे नैतिकता व सदाचार को ही धर्म मानते थे और संत कबीर की भांति सगुण ब्रह्म की बजाय निर्गुण ब्रह्म में आस्था रखते थे। खाली समय में या चलते फिरते “श्रीराम जय राम जय जय राम” का उच्चार करते रहते थे।उन्होंने जीवन के संध्या काल में, एक बार मुझसे कहा था कि उनसे जीवन में दो बड़ी भूलें हो गईं – पहली साईकिल चलाना न सीखना और दूसरी अंग्रेज़ी भाषा न सीखना।उनके इस कथन के मर्म को उनके कर्मठ एवं विद्या-व्यसनी व्यक्तित्व के आलोक में आसानी से समझा जा सकता है। 

  वर्ष 1971 में बब्बा का देहावसान उपरौड़ा में हुआ था। इसके बाद ही उनके सामान में एक डायरी में उनका लिखा ” मृत्यु के बाद”  शीर्षक  लेख मिला जिसमें उन्होंने अपने गांव उपरौड़ा में ही अंत्येष्टि किये जाने सहित तेरहवीं के भोज तथा अन्य विषयों पर विस्तार से अपनी इच्छाएँ  व्यक्त की थी। उन्होंने अपनी पुस्तकों के सदुपयोग हेतु आशापूर्ण दृष्टि के साथ मेरे नाम का उल्लेख भी किया था। उनके इस उद्गार से मुझे गौरव की अनुभूति तो सदैव होती है लेकिन साथ ही उनकी अपेक्षाओं की कसौटी पर पूरी तरह खरा न उतर पाने की कसक भी रहती है। बब्बा हमारे कुल और गांव के लिए एक विशाल वटवृक्ष के समान थे जिसकी छाया ने सब को समान रूप से संवरने और पढ़ लिख कर आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त किया। उनकी पुण्य स्मृति को नमन।

        लेखक पूर्व प्रशासनिक अधिकारी हैं जो कमिश्नर, गोरखपुर डिवीज़न के पद से सेवानिवृत्ति के बाद लखनऊ में रहते हैं।

 

 

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