प्रधानमंत्री केयर्स फंड की पारदर्शिता  

अशोक कुमार शरण,

प्रबंधक ट्रस्टी, सर्व सेवा संघ, सेवाग्राम (वर्धा)

 प्रधानमंत्री केयर्स फंड बन तो गया परन्तु इस पर राजनीति थमने का नाम नहीं ले रही और अभी तक सरकार का जो रुख है उससे लगता भी नहीं कि इस पर राजनीति थमेगी. कोरोना से लोगों विशेषकर गरीब मजदूर जो आजकल प्रवासियों की श्रेणी में आ गए हैं की समस्या बढ़ेगी तो इस पर राजनीति और तल्ख़ होती जाएगी. यह सरकार के लिए कठिन स्थिति पैदा कर सकती है. यह सवाल अब नेपथ्य में चला गया है कि जब पहले से ही एक फंड है तो दूसरे की  आवश्यकत क्यों पडी. अब तो जो सवाल खड़े हो रहे हैं वह इसकी पारदर्शिता पर है.

 छत्तीसगढ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का मुख्यमंत्री राहत कोष को लेकर एक बयान सोमवार ११ मई को आता है – “आपने संकट के समय सरकार पर विश्वास प्रकट किया है और मेरा यह कर्तव्य है की मै इन खर्चों में पारदर्शिता रखूं”. उन्होंने जानकारी दी कि 7 मार्च से 7 मई तक इस कोष में रूपए 56.04 करोड़ प्राप्त हए हैं जिसमे से रुपये10.25 करोड़ स्वीकृत कर जिलों को जारी किये जा चुके हैं. इस बयान के आते ही ट्विटर पर यह ट्रेंड होने लगा. निश्चित रूप से यह कांग्रेस पार्टी के लिए एक संजीविनी का कार्य करेगा और वह प्रधानमंत्री केयर्स फंड की पारदर्शिता के लिए उन्हें घेरने की कोशिस करेगा.

 प्रधानमंत्री केयर्स फंड की स्थापना कोरोना महामारी जैसी अन्य आपातकालीन, संकट की स्थिति में प्रभावित लोगो की सहायता के लिए किया गया है. नरेन्द्र मोदी ने कहा कि कोरोना महामारी को रोकने के लिए लोगो ने इसमे अपनी सहायता देने की इच्छा जाहिर की. उनकी भावनाओं का सम्मान करते हुए इस कोष की स्थापना की गयी है जो स्वस्थ भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा. यह आपदा प्रबंधन क्षमता को मजबूत करेगा और शोध आदि के माध्यम से लोगो की सेवा करने में सहायक होगा. जन साधारण के अतिरिक्त प्रसिद्ध व्यक्तियों एवं कंपनियों ने भी इस कोष में दान देने का संकल्प लिया है.

इस फंड के स्थापित होते ही इस के पक्ष और विपक्ष में लोग खड़े हो गए. प्रसिद्ध इतिहासकार रामचंद्र गुहा ‘प्रधानमंत्री केयर्स फंड’ की तीखी आलोचना करते हुए कहते हैं कि ‘प्रधानमंत्री राष्ट्रीय सहायता कोष’ के वजूद में होते हुए इस कोष के स्थापना की कोई आवश्यकता नहीं थी. यह स्वयं की प्रशंसा के लिए गढ़ा गया है.  कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री को एक पत्र लिख कर दिए गए सुझावों में एक सुझाव यह भी दिया है कि ‘प्रधानमंत्री केयर्स फंड’ की समस्त राशि ‘प्रधानमंत्री राष्ट्रीय सहायता कोष’ में स्थान्तरित कर दी जाये जिसमे पहले से ही तीन हजार आठ सौ करोड़ रूपए हैं. कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने कहा कि इसके नियम और खर्चे अपारदर्शी हैं और उन्हें अपने अतार्किक निर्णयों का जवाब देश को देना होगा. इस फंड के पक्ष में भारतीय जनता पार्टी के सांसद राकेश सिन्हा कहते हैं कि इस फंड का उपयोग न केवल कोरोना वायरस से लड़ने के लिए किया जायेगा बल्कि लाक डाउन की वजह से प्रभावित लोगो की सहायता के लिए भी किया जा सकेगा. हाल ही में राहुल गांधी और अभिषेक मनु सिंघवी ने भी प्रधान मंत्री से इस कोष से किये गए खर्च का हिसाब मांगा है 

लॉक डाउन के समय मजदूरों के लिए विशेष रेल गाड़ियां चलाने के बावजूद हजारों मजदूरों को भूखे पेट सैकड़ों मील पैदल घर जाना पड़ रहा है. कई अमानवीय स्थिति में कंक्रीट बनाने के डम्फर में तो कई टैम्पू में लदे हो कर घर जाने के लिए मजबूर है. जब पुलिस ने सडको के माध्यम से उन्हें जाने से रोका तो वे गांवो के रास्ते और रेल के पटरियों के सहारे सहारे चलने लगे. उस दर्दनाक हादसे ने पूरे देश को झकजोड़ कर रख दिया जब महाराष्ट्र में एक लोहे के कारखाने के 16 मजदूर मालगाड़ी द्वारा कुचल कर मारे गए. लाखो लोगो को काम के साथ साथ कई राज्यों से विस्थापित होना पड़ा. ऐसी विषम परिस्थिति में भी प्रधानमंत्री केयर्स फंड का नाम नहीं आ रहा है कि उससे किनको कितनी सहायता दी जा रही है. वास्तव में सरकार इस फंड में प्राप्त राशी और उससे किये गए खर्चे के बारे में अभी तक चुप्पी साधे हुए है जिसे राजनैतिक दल शंका की दृष्टी से देख रहे हैं. 

प्रधानमंत्री केयर्स फंड में दिए गए दान पर आयकर अधिनियनिम १९६१ की धारा ८० (जी) के अंतर्गत शत प्रतिशत छूट प्राप्त है. इसे FCRA (फॉरेन कॉन्ट्रिब्यूशन रेगुलेशन एक्ट) से भी मुक्त रखा गया है. इसके हिसाब किताब को CAG या अन्य किसी ऑडिट के दायरे से बाहर रखा गया है.  इसमे ‘कंपनियो के सामाजिक उत्तरदायित्व’ २०१३ (कार्पोरेट सोशल रेस्पोंसिबिलिटी) फंड में से दान दिया जा सकता है. जिन कंपनियों का नेट वर्थ रूपए ५०० करोड़, रेवन्यू रूपए १००० करोड़, प्रॉफिट रूपए ५ करोड़ का दो प्रतिशत दान दिया जा सकता है. कंपनी मामलो के मंत्रालय ने एक आदेश जारी कर यह भी छूट दे दी है कि यदि दो प्रतिशत से अधिक राशी भी दी जाती है तो वह आगामी वितीय वर्ष में से समायोजित की जायेगी. इस फंड के जरिये सरकार  कितना पैसा एकत्रित करना चाहती है यह समझ से परे है. अभी तक इस फंड  का अधितर हिस्सा सामाजिक संगठनो द्वारा देश के दूर दराज इलाको में सानाजिक कार्यों के लिए खर्च किया जाता था. CSR फंड की कमी की वजह से देश में लाखों स्वयं सेवी संगठनो के सामाजिक कार्य में रूकावट आ सकती है. 

 कई लोगो के मन में पारदर्शिता का सवाल उठ रहा है उस पर भी एक नजर डालते हैं. नरेन्द्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे तो उन्होंने एक जनसभा में कहा था कि जनता को राष्ट्रीय कोष के बारे में RTI से जानने का अधिकार है. अब सवाल उठ रहे कि जब उन्होंने प्रधानमंत्री केयर्स फंड बनाया तो उसे RTI के दायरे से बाहर क्यों रखा? आर. टी. आई. कार्यकर्ता असीम तकयार प्रधानमंत्री रहत कोष में मिले दान का हिसाब जानने के लिए कानूनी लडाई लड़ रहे हैं. प्रधानमंत्री कार्यालय से उन्हें यह कह कर जानकारी नहीं दी गयी कि यह सार्वजनिक हित में नहीं है तो उन्होंने दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया जहां दो बेंच की पीठ ने उनकी याचिका पर खंडित आदेश सुनाया. जस्टिस ए रविन्द्र भट ने फैसला दिया कि प्रधानमंत्री राष्ट्रीय कोष पब्लिक अथॉरिटी है इसलिए सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत सूचना मिलनी चाहिए. दूसरे जज जस्टिस सुनील गौड़ ने फैसला दिया कि यह पब्लिक अथॉरिटी नहीं है और सूचना के अधिकार अधिनियम के दाएरे में नहीं आता. दोनों जजों ने चीफ जस्टिस को यह मामला तीसरे जज को भेजने के लिए कहा है. अब इस केस की सुनवाई जुलाई 2020 में निर्धारित की गयी है. 

इससे पहले पूर्व केन्द्रीय सूचना आयुक्त और आर. टी. आई. कार्यकर्ता शैलेश गांधी ने इस सम्बन्ध में कहा था कि यह सूचना क्यों नहीं मिलनी चाहिए. वर्ष 2008 में केंद्रीय सूचना आयोग ने निर्णय दिया था कि प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री राहत कोष सूचना के अधिकार अधिनियम के अंतर्गत रखा जाता है जिसे बाद में एकल बेंच ने सही टहराया, परन्तु प्रधानमत्री रहत कोष की  वेबसाईट केवल प्राप्त और खर्च हुए फंड का एक ग्राफ दिखता है और कोई जानकारी नहीं देता. हम उम्मीद कर सकते हैं कि दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला आने के बाद प्रधानमंत्री केयर्स फंड में पारदर्शिता आएगी और जनता को अपने दान के खर्चे का हिसाब जानने का अधिकार मिलेगा.     

  

 

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