राष्ट्रपति चुनाव – विकल्प और संभावनाएँ 

देश के राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति के चुनाव आगामी दो माह के भीतर होने हैं।उपराष्ट्रपति के चुनाव में संसद के दोनों सदनों के सदस्य तथा राष्ट्रपति चुनाव के संसद के दोनों सदन व सभी राज्यों की विधानसभा के निर्वाचित सदस्य मतदान करते हैं। वर्तमान निर्वाचक मंडल के अनुसार उपराष्ट्रपति के चुनाव में सत्तारूढ़ एन डी ए गठबंधन के प्रत्याशी की जीत में कोई संदेह नहीं है, लेकिन राष्ट्रपति के चुनाव में विजय के लिए अपेक्षित 50%+1 मतों के समीकरण में इसे थोड़े मतों की आवश्यकता पड़ सकती है, जिसके लिए बीजू जनता दल, वाई आर एस कांग्रेस व कुछ अन्य दलों का समर्थन लेना पड़ सकता है।

सत्ताधारी एन डी ए /भाजपा के समक्ष राष्ट्रपति पद हेतु प्रत्याशी चयन के लिए संभावित निम्न कारक महत्वपूर्ण हो सकते हैं –

1. दक्षिण भारत में पार्टी का विस्तार

2. आदिवासियों में पैठ बनाना

3. सिख समुदाय में बढ़ रहे असंतोष को थामना

4. उत्तर-पूर्व राज्यों को संदेश देना

5.मुस्लिम प्रत्याशी उतार कर मुस्लिम समाज को साथ लेना

6. उक्त सभी मापदंडों के साथ महिला सशक्तिकरण का संदेश

 उल्लेखनीय है कि वर्तमान राष्ट्रपति उत्तर भारत व अनुसूचित समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं, लेकिन उम्र व परंपराओं (डा. राजेंद्र प्रसाद के अपवाद को छोड़कर) को देखते हुए उन्हें दूसरा कार्यकाल मिलने की संभावना नहीं के बराबर है। अतः जो नाम इन पदों के लिए विचारणीय हैं, आइए, उन पर एक नज़र डालते हैं –

 1. वर्तमान उपराष्ट्रपति श्री वेंकैया नायडू के दक्षिण भारतीय व तेलगू भाषी होने के फलस्वरूप उनका दावा सबसे मजबूत है। उनकी भाजपाई पृष्ठभूमि और तेलंगाना मे भाजपा के विस्तार के लिए उनका राष्ट्रपति बनना सहायक होगा। उनके कारण तेलगू भाषी आंध्र व तेलंगाना के क्षेत्रीय दलों का समर्थन मिलने में भी आसानी होगी, लेकिन यदि मोदी जी के मन में कुछ और पक रहा हो, तो उन पर भी चर्चा करते हैं।

2. दक्षिण भारत से तेलंगाना की राज्यपाल डा. तमिलसाई सौंदर्य राजन तमिलनाडु से आती हैं और लगभग दो दशक से भाजपा में सक्रिय हैं। अन्ना द्रमुक के क्षरण के कारण भाजपा तमिलनाडु में अपने विस्तार की संभावनाएं देख रही है और इस दृष्टि से इनका चयन उपयोगी होगा।

3.यदि पार्टी आदिवासी समाज के प्रत्याशी की ओर देखना चाहे तो झारखंड की पूर्व राज्यपाल श्रीमती द्रौपदी मुर्मू और छत्तीसगढ़ की राज्यपाल श्रीमती अनुसुइया उईके के नाम सबसे आगे हैं। इनमें से किसी को इन संवैधानिक पदों पर बैठाकर भाजपा के लिए छत्तीसगढ़, उड़ीसा व झारखंड के मतदाताओं को रिझाने का एक कारण होगा।

4. पिछले कुछ महीनों में अकाली दल के साथ साथ सिख समाज भाजपा से विमुख होता दिखाई दे रहा है और खालिस्तानी अलगाववादी सक्रिय हो रहे हैं, ऐसे में सिख समाज से राष्ट्रपति बनाकर सिखों का समर्थन प्राप्त करने की दिशा में एक सार्थक कदम होगा। यदि अकाली दल साथ होते, तो प्रकाश सिंह बादल एक स्वाभाविक पसंद हो सकते थे। अब केंद्रीय मंत्री श्री हरदीप पुरी एक अच्छे विकल्प हो सकते हैं। उपराष्ट्रपति पद के लिए कैप्टन अमरिंदर सिंह के नाम पर भी विचार किया जा सकता है।

5. पिछले कुछ सालों में मुस्लिम समाज जिस तरह भाजपा और मोदी सरकार पर आक्रामक रहा है, ऐसे में किसी राष्ट्रवादी मुस्लिम को संवैधानिक पद पर आसीन कर भाजपा आलोचनाओं का जवाब दे सकती है। इस दृष्टि से केरल के राज्यपाल श्री आरिफ मोहम्मद खान का नाम पर भी विचार किया जा सकता है। मुख्तार अब्बास नकवी भी एक विकल्प हैं।

6. यदि इन पदों के लिए अनुसूचित जाति के किसी प्रत्याशी पर चर्चा होती है, तो कर्नाटक के राज्यपाल श्री थावर चंद गहलौत का नाम सबसे ऊपर  होगा।

7.वर्ष 2012 में भाजपा /एनडीए ने राष्ट्रपति पद के लिए मेघालय के पी ए संगमा को प्रत्याशी बनाया था, यदि उत्तर पूर्व क्षेत्र पार्टी के एजेंडे में है, तो केंद्रीय मंत्री श्री सर्वानंद सोनोवाल भी दौड़ में रहेंगे, जिन्होंने मुख्यमंत्री रहते हुए पार्टी को दोबारा असम में जीत दिलाई, लेकिन उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनाया गया।

8. इन नामों के अतिरिक्त सर्वश्री लालकृष्ण आडवाणी, सुमित्रा महाजन,बंडारू दत्तात्रेय, भर्तृहरि मेहताब के नाम भी विचार सूची में हो सकते हैं।

9.जहां तक विपक्ष का सवाल है, संयुक्त विपक्ष श्री शरद पवार के नाम पर सहमति बन सकती है, लेकिन अपने सुदीर्घ राजनीतिक जीवन के इस पड़ाव पर वह हारने के लिए लड़ना पसंद नहीं करेंगे। किसी लिबरल-सेक्युलर बुद्धिजीवी का नाम सामने आ सकता है। 

10. लेकिन राजनीतिक सूत्रों के अनुसार अभी कुछ भी तय नहीं है और प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के मन में क्या चल रहा है, इसका अनुमान लगाना मुश्किल है। अंतिम समय पर यदि किसी ऐसे नाम की घोषणा हो, जो आपको चौंका दे, तो आश्चर्य नहीं!

आखिर मोदी जी की कार्यशैली है ही सबको चौंका देने वाली है। 

अरुण कुमार गुप्ता

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