फिल्म सिटी बनाने के लिए अनुकूल है प्रयागराज

वीरेंद्र पाठक। फिल्म सिटी या उसका एक भाग प्रयागराज में स्थापित हो।

यहां पर वह सभी जरूरतें पूरी होती हैं जो एक फिल्म सिटी के लिए आवश्यक हैं।

हमारी प्रयागराज में फिल्म सिटी या उसकी एनेक्सी बनाने की मांग निम्न तर्कों पर आधारित है जिस पर विचार किया जाय।

प्रयागराज में फिल्म सिटी के लिए तर्क

1- प्रयागराज में फिल्म शूट करने के लिए प्राकृतिक पहाड़ नदी जंगल और भूमि उपलब्ध है जिस पर स्टूडियो बनाया जा सकता है।

प्रयागराज के दक्षिण सीमावर्ती मध्य प्रदेश से लगी भूमि पर कई नदियां, पहाड़ स्थित हैं।

2- प्रयागराज में सरस्वती विद्यमान है। कलाप्रेमी यहां घर-घर मिलेंगे।

प्रयागराज के लगभग 10000 लोग वर्तमान में मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में काम करते हैं। यह सभी विधाओं में लगे हैं।

3- हिंदी सिनेमा की जब भी बात होगी वहां पर इस्तेमाल की जाने वाली भाषा “खड़ी बोली” प्रयागराज में ही बोली जाती है।

फिल्म “चुपके चुपके” से लेकर आज तक जो भी फिल्में हिंदी भाषा में बनती है उनकी बोली प्रयागराज के मध्य बोले जाने वाली भाषा है।

4- फिल्में प्री प्रोडक्शन और पोस्ट प्रोडक्शन में तकनीकी रूप से दक्ष लोगों तथा कम्प्यूटर के जानकारों की जरूरत होती है।

यहां कई संस्थान हर वर्ष हजारों तकनीकी रूप से युवकों को पढ़ा कर दक्ष करते हैं जो देश-विदेश में जाते हैं।

और भी हैं अनुकूल बातें

उक्त प्रमुख के अलावा बहुत सारी बातें फिल्म सिटी के लिए प्रयागराज में अनुकूल है।

फिल्म सिटी प्रयागराज में बने इसके लिए मेरे यह तर्क हैं।

जब इसके पीछे का तर्क जाना तो समझ में आया कि उनका मानना है फिल्म सिटी बनने से फिल्मों की गंदगी प्रयागराज में आ जायेगी! धन्य है इस दृष्टिकोण का।

वास्तव में जो लोग ऐसा सोचते हैं वह #कुएं के मेंढक के सामान हैं , जिन्हें दुनिया दिखती ही नहीं।

क्या प्रयागराज में ऐसा कोई अपराध है जो नहीं होता? शायद नहीं नशे के कारोबार से लेकर देह व्यापार तक धड़ल्ले से होता है।

छोटी सोच

अब चलते हैं इनकी छोटी सोच पर। प्रयागराज के लगभग 10,000 से अधिक लोग वर्तमान फिल्म सिटी मुंबई में काम कर रहे हैं।

उत्तर प्रदेश सरकार की #फिल्म_बंधु नीति ने पिछले कई सालों से कम बजट वाली फिल्मों को यहां पर आकर्षित किया है अनुदान की नीति के कारण थोड़े परिवर्तन के बाद फिल्में उत्तर प्रदेश में बन रही हैं।

“मेरी शादी में जरूर आना “बहुत सारी फिल्में है जो प्रयागराज में सूट होकर प्रदर्शित भी हुई। स्थानीय सैकड़ों लोगों को काम भी मिला। क्या गंदगी फैली?

मूर्खता की कोई सीमा नहीं होती। फिल्म सिटी प्रयागराज में बनती तो इसका लाभ आगे भी प्रयागराज के स्थानीय लोगों को होता।

मेरा एक मित्र एनएसडी करके मुंबई में फिल्में कर रहा है। मैंने उससे बोला कभी-कभी इलाहाबाद प्रयागराज चक्कर लगा लिया करो। कुछ दिन रह लिया करो।

इसका जवाब सुन मैं हतप्रभ रह गया। वीरेंद्र भाई इलाहाबाद में कुछ नहीं रखा।

सर मैं यहां नाटक करो तो 30 दिन बाद ₹15000 बड़े एहसान के साथ मिलेगा। और मुंबई में ₹5000 प्रति शिफ्ट।

घूमने को कहो तो आ जाऊं, लेकिन इलाहाबाद में रहना मतलब समय खराब करना।

शायद बहुत कम लोगों को पता होगा की कई व्यक्तियों के एक समूह ने इलाहाबाद मिर्जापुर में फिल्म सिटी बनाने का प्रयास किया लेकिन सरकारों ने कोई सहयोग नहीं किया।

वर्तमान में साहित्य प्रेमी प्रयागराज से बाहर

ऐसे अपने जन्म से सुना है कि प्रयागराज साहित्य कला की धरती है। यहां #सरस्वती अदृश्य रूप में विद्यमान है। लेकिन यह एक किवदंती ही है।

वर्तमान में अधिकतर साहित्य प्रेमी प्रयागराज से बाहर चले गए।

#इलाहाबाद_विश्वविद्यालय आकाशवाणी व अन्य शिक्षण संस्था में काम करने वाले लोग जीवकोपार्जन इन संस्थाओं से करते थे।

खाली समय में बैठकी होती थी। विमर्श और चिंतन से सृजन के रास्ते खुलते थे।

फिल्म सिटी बनती तो उन लोगों को रोजगार मिलता जिनकी चाहत कला के प्रति है।

तकनीकी दक्ष लोगों को काम मिलता जो साउंड इंजीनियर लाइटिंग वीडियो एडिटिंग आदि का काम जानते हैं।

कारीगरों को का मिलता जो सेट डिजाइनिंग करते, इसमें कारपेंटर से लेकर अन्य शामिल है।

उन सामान्य लोगों को भी काम मिलता जिन्हें एक्स्ट्रा के रूप में सेट पर उपयोग किया जाता। मतलब यह कि हजारों लोगों को काम मिलता।

घर-घर में कला

जरा पीछे चलते है आज से 30 साल पहले शहर के पुराने इलाकों के किसी घर में अगर नाच गाना होता तो वहां तबला और ढोलक बजाने वालों की कमी नहीं होती थी।

मैं यह दावे के साथ कह सकता हूं कि हिंदुस्तान में सबसे ज्यादा तबला और ढोलक बजाने वाले या जानने वाले तब के इलाहाबाद में थे।

बनारस में तो घरानों में यह कला थी, लेकिन इलाहाबाद के घर घर में प्रयाग संगीत समिति और अन्य संस्थाओं ने बच्चे बच्चे को यह कला सिखाई थी।

#प्रयाग_संगीत_समिति की स्थापना नॉन कमर्शियल संस्था की तरह से हुई और जिस समय हुई उस समय भारत में इससे बड़ा कोई संस्थान नहीं था।

यह इलाहाबादी थे जिनका संगीत और कला के प्रति रुझान था और उन्होंने बिना सरकारी सहयोग के यह स्थापित किया।

तब के #गेलार्ड वर्तमान तंदूर में #रीना_राय नाचती थी। प्रयाग संगीत समिति के कार्यक्रम में हिंदुस्तान के कलाकार भाग लेने के लिए लालायित रहते थे।

#शास्त्रीय_संगीत और नृत्य के कलाकार जो फिल्मों में भी काम करते थे यहां आकर धन्य हो ते थे इनमें से एक हेमा मालिनी भी है।

प्रायगराज के हंडिया 700 परिवारों ने बचा कर रखा था कत्थक

थोड़ा और पीछे चलते हैं, जब कत्थक और शास्त्रीय गायन की बात आती है तो आज हमें सिर्फ बनारस दिखता है,,, अट्ठारह सौ के आसपास यह प्रमाण मिलता है कि इस इलाहाबाद के हंडिया क्षेत्र में सात सौ के आसपास ऐसे परिवार थे जिन्होंने #कत्थक को बचा कर रखा था ,और उस पर महारत हासिल की थी।

शास्त्रीय गायक भी इन्हीं परिवारों में संरक्षित था। आप समझ सकते हैं कि जब कत्थक नृत्य होगा तो ताल की समझ वादन और गायन भी होगा।

#बिरजू_महाराज ऐसे ही एक परिवार से थे ,जो बाद में बनारस चले गए और जिन्हें आज आप सब जानते हैं वास्तव में उनके पूर्वज इसी प्रयागराज के थे।

छप्पन छुरी जद्दनबाई और बहुत सारे ऐसे लोग जिन्होंने कला की ऊंचाइयों को छुआ।

शायद आप नहीं जानते होंगे कि #पृथ्वीराज_कपूर जैसे कलाकार यहां पर पंडाल में नाटक करके चले गए।

मुगलकाल में भी कलाकारों का जिक्र

थोड़ा और पीछे ले चलते हैं,,, मुगलों के समय भी यहां पर बहुत सारे कलाकारों का जिक्र मिलता है।

तुलसीदास जीने रामलीला इसी प्रयागराज में स्वरूप की जो नाटक का ही एक स्वरूप है।

इतिहास का एक ब्लैक होल है जिसके कारण तथ्य तो नहीं मिलते लेकिन ऐसी कड़ियां मिलती हैं जिसे पता लगता है कि प्रयागराज ही वह स्थान था जहां पर ललित कलाओं ने गुरुकुल में मजबूती पाई।

प्रयागराज ही वह स्थान था जहां पर सबसे ज्यादा गुरुकुल थे। और सबसे बड़ा गुरुकुल महर्षि भारद्वाज का था।

प्रयागराज ही वह केंद्र था। जहां पर सृष्टि की सबसे पहले ऋग्वेद ने आकार लिया। वेद गेय हैं जिसे पश्चिमी विद्वानों ने चरवाहों का गान बताया।

खैर, फिल्म सिटी कहीं पर बने लेकिन मेरे दिल में मेरी चाहत में और मेरे प्रयास में प्रयाग ही रहेगा।

राजीव गांधी के बाद प्रयागराज राजनीतिक दुश्मनी का शिकार

मुझे व्यक्तिगत रूप से यह कहने में जरा भी संकोच नहीं है की राजीव गांधी के बाद इलाहाबाद या प्रयागराज राजनीतिक दुश्मनी का शिकार होता रहा।

उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र उसके पश्चात वी पी सिंह द्वारा दूरदर्शन केंद्र की स्थापना हुई लेकिन इसके बाद सिर्फ और सिर्फ जिल्लत मिली।

अमिताभ बच्चन से लोगों ने कुछ उम्मीद लगा रखी। लेकिन वह तो लुटेरे साबित हुए। यहां के लोगों का विश्वास लूटकर चले गए। सपने दिखाए लेकिन कुछ नहीं हुआ।

उल्टे प्रयागराज वासियों ने उनके नाम से म्योहाल स्पोर्ट्स कांप्लेक्स का नाम अमिताभ बच्चन के नाम पर रख दिया अल्लापुर में एक सड़क भी।

डॉ मुरली मनोहर जोशी संकट मोचन जरूर बने लेकिन राजनीति के खेल में शह और मात का हिसाब नहीं लगा पाए।

शायद इलाहाबाद के लोग भूल गए जब उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी तो यहां पर यानी प्रयागराज में कैबिनेट की बैठक की चर्चाएं हुई।

लगा कि प्रयागराज का मान बढ़ने वाला है। कुछ दिनों के लिए ही सरकार यहां से चलेगी तो कुछ भला हो जाएगा। केशरी नाथ जी ने प्रयास भी किया। वह मील का पत्थर बन गया। बस।

बंद पड़ा है शिक्षा विभाग का स्टूडियो

जो लोग नहीं जानते, उन्हें बताना चाहता हूं शिक्षा विभाग ने यहां पर एक स्टूडियो भी बनाया है कैमरे भी हैं फिल्में भी बनती रही। सब बंद पड़ा है।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में चट्टोपाध्याय जी ने फिल्म मेकिंग पर कोर्स भी चलाया।

या तो आप यह कहना बंद कर दो कि प्रयागराज में सरस्वती है नहीं तो कम से कम उसके मान के लिए कुछ तो करो।

यहां तो एक अदद थिएटर भी नहीं है जहां कलाप्रेमी अपना प्रदर्शन कर सकें।

स्मार्ट सिटी में यह बात मैंने उठाई देखिए क्या होता है। लेकिन यह जरूर कहूँगा आज भी प्रयागराज राजनैतिक द्वेष का शिकार है।

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