राहुल गॉंधी की राजनीति

           

                  कल 16 सितंबर को एक अद्भुत दृश्य देखकर मेरे आंखों में आंसू आ गए। भारत जोड़ो यात्रा के दौरान एक बूढ़ी महिला, संभवतः मलियाली, आकर राहुल गांधी से यूं लिपट गई जैसे लंबे समय से बिछड़े बेटे से मिल रही हो। निश्चय ही, भारी सुरक्षा के दायरे में चल रहे राहुल गांधी से मिलने केलिए उसने अनुमति नहीं ली होगी। लेकिन उसका संदेश पहुंच गया होगा, क्यों कि प्रेम का संदेश भाषा की गुलाम नहीं होती।

जो प्रेम का खजाना उसने राहुल गांधी पर न्योछावर कर दिया, वह नरेंद्र मोदी जी को मिलना असम्भव है, जिन्हें हमेशा आतंकवादियों का डर बना रहता है।

                  राहुल गांधी केलिए जितनी भारी सुरक्षा व्यवस्था है उसमें यह घटना भारी चूक ही मानी जायेगी। राहुल गांधी ने यात्रा की शुरुआत ही पेरंबदूर से की थी, जहां उनके पिता स्वर्गीय राजीव गांधी ने इससे मिलती जुलती घटना में ही अपनी जान गंवा थी। फिर भी राहुल गांधी उस महिला का प्यार ठुकरा नहीं सके। लेकिन यह उनके सुरक्षा करने वालों की भारी गलती थी, जिसे आगे से हर हाल में रोका जाना जरूरी है।इस यात्रा में जिस प्रकार से हजारों हजार लोग शामिल हो रहे हैं उसमें गलत तत्वों के शामिल होने और कोई गंभीर घटना को अंजाम देने का खतरा बहुत ज्यादा है। इस यात्रा से जिस तरह देश का माहौल बदल रहा है और विपक्षी घबराये हुए हैं, उससे यह खतरा और भी वास्तविक हो गया है।

               राहुल गांधी यह यात्रा कांग्रेस को खड़ा करने केलिए नहीं, देश की एकता और लोकतंत्र की रक्षा केलिए कर रहे हैं। वैसे इसका लाभ स्वाभाविक रूप से कांग्रेस को मिलेगा ही। लेकिन अन्य दलों और जनसंगठनों में भी चेतना का संचार हो रहा है। पर यह कहना कठिन है कि भाजपा अगला लोकसभा चुनाव हार जायेगी। कालेधन को समाप्त करने का वादा कर के सत्ता पाने वाली भाजपा आज कालेधन के व्यापक दुरूपयोग के आधार पर ही चुनावों में सफलता हासिल कर रही है। पन्ना प्रमुख से लेकर ट्रोल आर्मी तक भारी पैमाने में पैसा पहुंच रहा है। इलेक्शन बांड का  भी अधिकांश पैसा भाजपा को ही पहुंच रहा है। चुनाव खर्च जुटाने केलिए अनेक विपक्षी दल अपनी सीट बेच देते हैं और भ्रष्टाचार का भी सहारा लेते हैं। टिकट भी भ्रष्ट लोगों को दे देते हैं। ऐसे जनप्रतिनिधि को खरीद कर सरकार बना लेने में काला धन का ही उपयोग किया जाता है। यदि कालेधन के बल पर ही सरकार बननी है तो चुनाव की क्या जरूरत है। वैसे भी भ्रष्ट नेताओं, अधिकारियों, न्यायाधीशों को cbi, ed, nia आदि के माध्यम से ब्लैकमेल करना बहुत आसान है। जब तक इस सबके खिलाफ विपक्ष एकजुट नहीं होता है, भाजपा को हराना असंभव लगता है। वैसे चुनाव में भाजपा को यदि पुर्ण बहुमत मिल जायेगा तो यह सुनिश्चित है कि संविधान बदल दिया जायेगा। चुनाव का चक्कर ही खत्म कर दिया जायेगा। दलितों, पिछड़ों, महिलाओं और अल्पसंख्यकों को मनुवादी व्यवस्था की जंजीरों से जकड़ दिया जायेगा।

                 इस खतरे को देखते हुए अधिकांश कांग्रेस जन चाहते हैं कि राहुल गांधी ही कांग्रेस के अध्यक्ष बने। पर राहुल गांधी कांग्रेस पर लगने वाले वंशवाद के आरोप से बहुत खिन्न हैं और भाजपा के इस हथियार को बर्बाद कर देना चाहते हैं। उन्होंने देखा भी है कि अनेक कांग्रेसी,जो वंशवाद के चलते आगे बढे, दल केलिए नुकसान दायक सिद्ध हुए। यदि राहुल गांधी खुद अध्यक्ष बन जाते हैं तो उनके लिए वंशवाद का विरोध करना कठिन होगा। वैसे भी वे अध्यक्ष बनते हैं तो भाजपा को यह कहने का मौका मिल जायेगा कि यह सारा नाटक था।

                  जयराम रमेश ने ठीक ही कहा है कि राहुल गांधी अध्यक्ष नहीं भी बनते हैं तो उन्हें GPS दिशानिर्देशक बनने से कौन रोक सकता है। अपनी नैतिक शक्ति के बल पर वे बिना चुनाव लड़े आजीवन संरक्षक की भूमिका निभा सकते हैं। गांधी जी कांग्रेस के सदस्य नहीं थे, फिर भी कांग्रेस उनकी इच्छाओं का पालन करने को बाध्य थी। 

                 वैसे भी इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की हत्या के बाद इस परिवार पर सुरक्षा केलिए प्रत्यक्ष राजनीति से दूर रहने केलिए भारी दबाव है। वैसे सोनिया गांधी खुद प्रधानमंत्री बनने के बदले मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाने और सरकार चलाने का सफल प्रयोग किया था। लेकिन राहुल गांधी सत्ता से अलग रह कर भी सरकार के दैनंदिन कार्यों में हस्तक्षेप करेंगे तो सवाल उठने लगेंगे। गांधी जी राजनीति में नैतिकता को जोड़ना जरूरी मानते थे। यह काम राहुल गांधी निश्चित रूप से कर सकते हैं। उन्होंने भ्रष्ट जनप्रतिनिधियों को संरक्षण देने वाले बिल को फ़ाड़ कर इसका संकेत बहुत पहले कर दिया था। आशा है राहुल भारतीय राजनीति के ध्रुव तारा बनेंगे।

रामशरण

   

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