तेल दाम गिरना पर्यावरण के लिए घातक हो सकता है

शिव कांत

शिव कांत, पूर्व सम्पादक बीबीसी हिंदी रेडियो, लंदन से 

पिछले दो दिनों से अमरीका के तेल आढ़त बाज़ारों में तेल मुफ़्त से भी सस्ता बिक रहा है। मतलब यह कि यदि आप मई में तेल की सप्लाई लेने को तैयार हों तो बेचने वाले दलाल तेल मुफ़्त में देने के साथ-साथ ग्राहक को दो-तीन डॉलर प्रति बैरल का कमीशन भी देने को तैयार हैं। इतिहास में ऐसा पहली बार हो रहा है। आपने लोगों को अपना माल मुफ़्त में बाँटते या फिर फेंकते तो देखा होगा। लेकिन यह शायद नहीं देखा होगा कि कोई अपना माल भी दे और साथ में शुक्रिया के तौर कमीशन और दे और वह भी तेल जैसी चीज़ के लिए जिसकी माँग और खपत दुनिया के हर कोने में मौजूद है। तेल के साथ एक समस्या और है कि उसे खेती के माल या कारख़ानों के माल की तरह फेंका भी नहीं जा सकता। क्योंकि वह पर्यावरण के लिए घातक है।

दरअसल हुआ यह है कि कोरोना वायरस के संकट के चलते अमरीका में तेल की माँग यकायक नाटकीय रूप से गिर गई है इसलिए तेल की सप्लाई लेने को कोई तैयार नहीं है। तेल के उत्पादन की प्रक्रिया काफ़ी लंबी होती है। सबसे पहले तेल निकालने वाली कंपनियाँ ज़मीन, समुद्रतल या चट्टानों से कच्चा तेल निकालती हैं। फिर उसे तेलवाहक जहाज़ों या पाइपलाइनों के ज़रिए तेलशोधक कारख़ानों में पहुँचाया जाता है। वहाँ कच्चे तेल को साफ़ कर उससे डीजल, पैट्रोल, घासलेट और दूसरी तमाम चीज़ें बनाई जाती हैं। उसके बाद एकबार फिर जहाज़ों, पाइपलाइनों, रेलगाड़ियों और ट्रकों के ज़रिए तेल को तेल के गोदामों में भेजा जाता है जहाँ से वह पैट्रोल पंपों तक आता है और वहाँ से आप अपनी गाड़ियाँ भरते हैं।

इस पूरी प्रक्रिया में कई महीने लगते हैं। इसलिए तेल बाज़ारों में होने वाले तेल के सौदे कई-कई महीने पहले कर लिए जाते हैं। तेल के सौदे उसकी मात्रा के साथ-साथ सप्लाई के महीने के हिसाब से तय होते हैं। उसके बाद शेयरों या सोने-चाँदी के भावी दामों की तरह तेल के सौदों की भी दलाली होती है जिन्हें फ़्यूचर्स कहते हैं। तो, कोरोना संकट की वजह से अमरीका के बाज़ारों में मई में होने वाली तेल की सप्लाई के सौदों का कोई ग्राहक नहीं बचा है। क्योंकि यातायात और कल-कारख़ाने बंद पड़े हैं। इसलिए तेल की खपत नहीं हो रही है। तेल के गोदामों में भी जगह नहीं बची है। लेकिन तेल की सप्लाई करने वाले जहाज़ और ट्रक तेल से लदे खड़े हैं। कहाँ, किसको दें। इसलिए जिन दलालों ने मुनाफ़े में बेचने के लिए मई की तेल सप्लाई के सौदे ख़रीद रखे थे उनको लेने के देने पड़ रहे हैं। वे अपनी जान छुड़ाने के लिए सौदा बेचने के साथ-साथ कमीशन भी दे रहे हैं। यह नौबत कोरोना संकट की वजह से अचानक सब-कुछ ठप हो जाने की वजह से हुआ है।

इससे पहले के आर्थिक संकट इस महामारी के संकट जितनी तेज़ी से नहीं फैले थे। 1930 की महामंदी दो से पाँच साल तक चली थी और अस्सी के दशक की मंदी भी एक से दो साल चली थी। कोविड19 की महामारी ने उतना ही या उससे भी ज़्यादा नुकसान दो महीनों के भीतर कर दिखाया है। तेल के दामों में आई नाटकीय गिरावट इस महामारी से दुनिया की आर्थिक सेहत को लगे आघात को रेखांकित करती है। तेल व्यापारियों जैसी ही दशा नेदरलैंड्स के फूल उत्पादकों की भी हुई है। राजधानी एम्सटरडैम के दक्षिण में बसे ऑल्समीयर शहर में दुनिया की सबसे बड़ी फूल मंडी है जहाँ मार्च और अप्रेल के महीनों में वर्ष का सबसे भारी कारोबार होता है। इस साल वहाँ फूलों को कोई मुफ़्त में लेने वाला भी नहीं है। नेदरलैंड्स के विश्वप्रसिद्ध ट्यूलिप के फूलों समेत तरह-तरह के फूल उगाने वाले किसानों को एक करोड़ चालीस लाख ट्यूलिप के फूलों समेत कुल चालीस करोड़ फूल फेंकने पड़े हैं। मार्च से मई के सीज़न में यहाँ तीन करोड़ डॉलर रोज़ाना की दर से करीब 750 करोड़ डॉलर का कारोबार होता है जिसमें करीब अस्सी प्रतिशत का नुकसान हो चुका है।

ब्रिटन के करीब पाँच लाख कारोबारियों की भी लगभग वही कहानी हो जो ऑल्समीयर के फूल किसानों की है। कारोबार और पर्यटन ठप हो जाने की वजह से कारोबार ठप हो चुके हैं। स्पेन और इटली के कारोबारियों की दशा तो और भी ख़राब है। सरकारें कर्मचारियों के वेतन भरने से लेकर टैक्स और किराए माफ़ करने और बिना ब्याज के आसान किस्तों पर कर्ज़े देने जैसी योजनाओं के ज़रिए कारोबारों को ज़िंदा रखने की कोशिशें कर रही हैं। लेकिन, पाबंदियाँ खुलने के बाद लोग कितना बाहर निकलेंगे, कर्मचारी कहाँ और किस हाल में होंगे, देनदारियों के आगे कितने कारोबारी दिवालिया होने पर मजबूर होंगे जैसे कई सवाल हैं जिनका जवाब किसी के पास नहीं है। यूरोप के बड़े व्यावसायिक बैंक UBS का अनुमान हो कि लगभग एक लाख करोड़ के कर्ज़े डूब जाने वाले हैं। इनका असर बैंकों पर होगा, बैंकों का असर व्यापारों पर और व्यापारों का सरकारों और उनकी अर्थव्यवस्थाओं पर। कोविड19 की आर्थिक मार सेहत की मार से भी ज़्यादा घातक सिद्ध होने वाली है।

और हाँ, अमरीकी तेल बाज़ार में तेल के दाम मुफ़्त से नीचे चले जाने का मतलब यह नहीं है कि आपके पैट्रोल पंपों पर तेल पानी के भाव बिकने लगेगा। तेल को ख़रीद कर ख़ुदरा बाज़ार में बेचने वाली कंपनियाँ और उनसे टैक्स वसूल करने वाली सरकारें तेल के दामों की गिरावट का फ़ायदा आप तक नहीं पहुँचने देंगी। दाम थोड़े-बहुत ज़रूर गिरेंगे लेकिन कामकाज शुरू होते ही दाम फिर बढ़ने लगेंगे। कोविड19 की मार से पर्यावरण और हमारी धरती को थोड़ी राहत की साँस मिली है। लेकिन यदि तेल के दाम इतने नीचे बने रहे तो इस राहत को ग़ायब होते वक़्त नहीं लगेगा। तेल सस्ता होने की वजह से सौर और पवन ऊर्जा अपेक्षाकृत मँहगी लगने लगेगी और लोग एक बार फिर वैकल्पिक ऊर्जा को छोड़ कर तेल की तरफ़ भागने लगेंगे। इसलिए तेल के दामों का गिरना केवल तेल उत्पादकों और आढ़तियों के लिए ही नहीं हम सब के लिए घाटे का सौदा बन सकता है।

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