कलम और माइक वहाँ , जहां आम आदमी का दर्द

हिंदी पत्रकारिता दिवस ३० मई पर विशेष

ज्ञानेंद्र शर्मा

ज्ञानेन्द्र शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार एवं पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त 

पिछले कई सालों से एक सिलसिला बदस्तूर जारी है। हाई स्कूल और इंटर की परीक्षाओं में अंग्रेजी की तुलना में हिन्दी विषय में फेल होने वाले छात्र-छात्राओं की संख्या कहीं अधिक है। एक ही निष्कर्ष  निकलता है और वह यह कि हिन्दी को उतनी गंभीरता से पढ़ा और पढ़ाया नहीं जाता जितना कि अंग्रेजी का पठन-पाठन होता है। वास्तव में हिन्दी में न तो अभिभावकों की ज्यादा दिलचस्पी होती है और ही विद्यार्थियों की। आखिर यह क्यों न हो जब अंग्रेजी की सब जगह कहीं ज्यादा पूजा होती है, उसे  बेहतर सम्मान दिया जाता है। अंग्रेजी मीडियम में पढ़कर निकलने वालों को कहीं ज्यादा बुद्धिमान माना जाता है। उनकी हर जगह ज्यादा इज्जत होती है। शान -शौक़त तो रहती ही है, नौकरी भी कहीं जल्दी मिलती है। 

    अब हिन्दी पूजनीय भर रह गई है। 12 सितम्बर को हिन्दी दिवस और 30 मई को हिन्दी पत्रकारिता दिवस पर हिन्दी के लिए जलसे होते हैं। हिन्दी भवन सक्रिय हो जाता है। उधर धीरे- धीरे हिन्दी के बड़े बड़े अखबार, जिसमें से एक में राजेन्द्र माथुर जैसे स्वनामधन्य संपादक कभी काम करते थे, हिन्दी भाषा  की व्याकरण अंग्रेजी में लिखने लग गए हैं। हिन्दी भाषियों  को ‘ट्विंकिल ट्विंकिल लिटिल स्टार’ समझाने लगे हैं। लेकिन संतोष की बात अब भी यह है कि भले ही जितनी तरक्की हिन्दी नहीं कर पाई हो, उतनी हिन्दी पत्रकारिता ने कर ली है। तकनीकी मामलों में हिन्दी के अखबार अब किसी भी मामले में अंग्रेजी वालों से पीछे नहीं हैं। आज हिन्दी के बेहतरीन कम्प्यूटर हैं, उनकी हिन्दी की वैबसाइट हैं और मोबाइल फोन्स और व्हाट्स-अप ने हिन्दी पत्रकारिता को आसमान छुला दिया है। इंटरनैट, ब्राडबैंड, टैबलेट, मोबाइल ने लोगों की खबरों की भूख बढ़ाई है और हिन्दी ने इसका पूरा लाभ लिया भी है। सभी हिन्दी अखबारों की अब अपनी वैबासाइट हैं।

कृपया मार्क टली को सुनें   https://youtu.be/AHRV84mLMKk

    लेकिन इलैक्ट्रानिक  मीडिया ने तो हिन्दी पत्रकारिता की बेहद किरकिरी की है। घटिया किस्म की विषय वस्तु, टेबुल पर बैठकर सारी पत्रकारिता की बेतुकी चीरफाड़, अज्ञानता से भरपूर ऐंकरिंग  और मंजनों के सरोकारों से कहीं दूर हटकर मूल पाठों से खिलवाड़ आम बात हो गई है। इसके चलते टी0वी0 पत्रकारिता पहचान, नाम और विश्वसनीयता के बड़े संकटों में घिरी पड़ी है।

कृपया श्रवण गर्ग का लेख फिर देखें :  https://mediaswaraj.com/media_under_pressure_from_government/

यह प्रातः स्मरणीय मंत्र भुला दिया गया कि मीडिया, सरकार से जनता को नहीं, जनता से सरकार को प्रभावित करने की कसमें लेकर जन्मा और पनपा है और इसकी कोई और भिन्न भूमिका न पहले कभी थी और न आज है। पत्रकारिता के एक बड़े हिस्से का सरकार का भोंपूं बजाना कोई नई बात नहीं है। लेकिन मजबूत विपक्ष उसकी काट के लिए मौजूद होता था। अब जबकि विपक्ष टुट-रूॅ-टू है, खुद अपने पैरों पर खड़े हो पाने में लाचार है तो मीडिया को उसकी ताकत का संचार अपने बाजुओं से करके देना चाहिए था, जो नहीं हो रहा है। मीडिया से इस समय कहीं अधिक अपेक्षाएं हैं, क्योंकि विपक्ष या तो अदृश्य  है और या फिर अकर्मण्य और अक्षम है। लेकिन गिने चुने वरिष्ठ  पत्रकारों, अखबारों व चैनलों को छोड़कर बाकी तो वंदनवार, जय- जयकार, फूलों के हार से अपनी ऊर्जा को श्रृंगारित किए पड़े हैं।

    फिर दुखती रग एक और भी है। बड़ी कुर्सियों पर बैठे पत्रकारिता के वरिष्ठ जन खुद  तो मूल पाठ भूल ही गए हैं, सामने मौजूद कनिष्ठों  को उनकी याद भी नहीं कराना चाहते। एक जमाना था जब पत्रकार कलम चलाते समय अपने संपादक के चाबुक की याद अपनी गाँठ  में बाँधकर रखते थे। संपादक की सशरीर उपस्थिति कहीं जरूरी नहीं थी। और अब? अब तो तमाम खबरें संपादक की मेज से न तो प्रेरित होती हैं और न ही उनकी नजरों से गुजरती हैं। इस हालात ने टेलिविजन पत्रकारिता को तो और भी कहीं बहुत खतरनाक मोड़ पर पर पहुँच  दिया है क्योंकि मौके से भेजी गई रिपोर्ट तो किसी छोटे बड़े सब एडीटर की आँखों  से होकर तक नहीं जाती।

कृपया राम दत्त त्रिपाठी को सुनें :  https://mediaswaraj.com/ramdutt_tripathi_bbc_yashvant_singh/ 

  बदलाव की तुरंत जरूरत हैः दृष्टिकोण  में और संवेदनशीलता में। नेताओं के भाषणों और बयानों की लम्बाई कम हो. कलम भी और माइक्रोफोन भी वहाँ  हो, जहां  आम आदमी का दर्द छिपा हो, अत्याचार हो, अन्याय हो, उत्पीड़न हो और वह कथ्य हो जो सरकार के बहरे कानों को गुंजा देने की क्षमता रखता हो।

    इसकी जरूरत अंग्रेजी से ज्यादा हिन्दी की पत्रकारिता को है आज!

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