पेमा खांडू – जनता से मिलने को 11 घंटे पैदल चले

प्रभाकर मणि तिवारी। अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने नेताओं के लिए एक मिसाल कायम की है।

पूर्वोत्तर राज्यों का जिक्र अक्सर उग्रवाद के सिलसिले में किया जाता रहा है।

लेकिन इलाके की सकारात्मक खबरें न तो मुख्यधारा की मीडिया तक पहुंचती हैं और न ही देश के दूसरे लोग इस बारे में भनक मिलती है।

इलाके में तमाम राजनेता अक्सर अपने कामकाज से ऐसी मिसाल कायम करते रहे हैं।

इनके बारे में देश के बाकी हिस्सों में रहने वाले लोग कल्पना भी नहीं कर सकते।

तमाम राज्यों के मुख्यमंत्री सुरक्षाकर्मियों की भारी भरकम फौज, कारों के लंबे काफिले और हेलीकाप्टरों से दौरों पर निकलते हैं।

तो ऐसे में किसी को इस बात का भरोसा नहीं होगा कि कोई मुख्यमंत्री अपने चुनाव क्षेत्र में गांव वालों की समस्याएं जानने-समझने के लिए 11 घंटे पैदल सफर भी कर सकता है।

सुनने में यह मामला भले अविश्वसनीय लगे, लेकिन है सोलहों आने सच।

यह मिसाल कायम की है चीन की सीमा से लगे पूर्वोत्तर राज्य अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने।

अंतरराष्ट्रीय सीमा के पास महज एक सुरक्षाकर्मी के साथ 14 किमी सफर किया
लुगुथांग जाने के रास्ते में मुख्यमंत्री पेमा खांडू (बीच में)
लुगुथांग जाने के रास्ते में मुख्यमंत्री पेमा खांडू (बीच में)

उन्होंने इसी सप्ताह तवांग जिले के दुर्गम गांव लुगुथांग पहुंचने के लिए महज एक सुरक्षाकर्मी के साथ 14 किमी पैदल यात्रा की।

इसमें उनको 11 घंटे लगे। यह गांव अंतरराष्ट्रीय सीमा को विभाजित करने वाली मैकमोहन लाइन के करीब है।

यहां इस बात का जिक्र प्रासंगिक है कि बीते सप्ताह चीनी सेना के हाथों पांच युवकों की अपहरण की घटना की वजह से यह इलाका सुर्खियों में रहा था।

सबसे नजदीकी शहर से लुगुथांग पहुंचने के लिए न तो कई सड़क है और न ही कोई हवाई पट्टी या हेलीपैड।

साढ़े चौदह हजार फीट की ऊंचाई पर बसे इस गांव में महज दस घर हैं और कोई पचास लोगों की आबादी।

गांव के लोगों की आजीविका याक (पशु) पर ही निर्भऱ है।

सरकार की योजनाएँ पहुँची या नहीं, यह देखने गये सीएम
पेमा खांडू ने जंगचुप स्तूप के कार्यक्रम में हिस्सा लिया।
पेमा खांडू ने जंगचुप स्तूप के कार्यक्रम में हिस्सा लिया।

मुख्यमंत्री के इस दौरे का मकसद इस बात की समीक्षा करना थी कि सरकार की ओर से शुरू की गई योजनाएं वहां तक पहुंच रही हैं या नहीं।

यूं तो यह पूरा इलाका ही दुर्गम पहाड़ियों से घिरा है।

लेकिन लुगुथांग पहुंचने के लिए मुख्यमंत्री को पहले 16 हजार फीट की ऊंचाई वाली करपू-ला पहाड़ियों को पार करना पड़ा।

जिला मुख्यालय तवांग से करीब सौ किमी दूरी पर स्थित यह गांव मुख्यमंत्री के चुनाव क्षेत्र मुक्तो के अधीन है।

सीएम ने गांव वालों के साथ बैठक में सरकारी योजनाओं की समीक्षा की।

उसके बाद खांडू ने वहां जंगचुप स्तूप में आयोजित एक समारोह में भी हिस्सा लिया।

यह स्तूप उनके पिता और पूर्व मुख्यमंत्री दोर्जी खांडू की स्मृति में बना है।

इनकी इसी इलाके में वर्ष 2011 में एक हेलीकाप्टर दुर्घटना में मौत हो गई थी।

मुख्यमंत्री के साथ तवांग के विधायक शेरिंग ताशी औऱ तवांग बैद्ध मठ के भिक्षुक भी समारोह में शामिल थे।

परिवहन और संचार करे समुचित साधन नहीं

राज्य के सीमावर्ती इलाके के दर्जनों गांवों में सड़कें और परिवहन का कोई साधन नहीं है।

इस वजह से वहां तक पहुंचने के लिए पैदल जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।

इलाके में संचार के समुचित साधन भी नहीं हैं।

कई गांव तो साल के ज्यादातर समय देश के बाकी हिस्सों से कटे रहते हैं।

सेना के लिए बार्डर रोड्स आर्गनाइजेशन (बीआरओ) ने जो सड़कें बनाई हैं वह भी बदहाल हैं।

सामरिक लिहाज से अरुणाचल प्रदेश की काफी अहमियत है।

राज्य की 1,080 किमी लंबी सीमा चीन से लगी है।

इसके अलावा 520 किमी लंबी सीमा म्यांमार औऱ 217 किमी लंबी सीमा भूटान से भी लगी है।

वर्ष 1962 के युद्ध के दौरान चीनी सेना इसी इलाके से भारत में घुस कर असम के तेजपुर शहर के करीब पहुंच गई थी।

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