पासवान सभी पार्टियों और कार्यकर्ताओं को साधे रखते थे

डॉ. सुनीलम

कल रात को मुझे भाई ने कनाडा से फोन करके सूचना दी कि रामविलास जी नहीं रहे।

मुझे लगा कि सोशल मीडिया में किसी ने हरकत की होगी और परन्तु जल्दी ही कंफर्म हो गया कि उनकी मौत हो चुकी है।

ढेर सारी स्मृतियां दिमाग में कौंधने लगी। उनमें से कुछ आपके साथ श्रद्धांजलि स्वरूप साझा कर रहा हूं।

संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से 1969 में बिहार विधान सभा के सदस्य होकर रामविलास जी ने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की।

फिर 8 बार सांसद बने। सबसे अधिक वोट पाने का दुनिया मे कीर्तिमान बनाया।

एक बार उन्हें एक प्रखर समाजवादी पूर्व मुख्यमंत्री राम सुंदर दास जी ने हराया।

मेरा परिचय उनसे जॉर्ज साहब के यहां 1984 के आसपास हुआ। जनता पार्टी, लोकदल, जनता दल में हम साथ काम करते रहे।

रामविलास जी के साथ मेरा घनिष्ठ रिश्ता तब बना जब जॉर्ज साहब ने समता पार्टी बना ली।

पार्टी बनाते समय सभी समाजवादी साथियों से विचार परामर्श नहीं होने को लेकर मैंने आपत्ति की।

इसका उत्तर जॉर्ज साहेब ने यह दिया था कि यदि मैं सभी समाजवादियों को बतला देता तो वे पार्टी नहीं बनने देते। उन्होंने कई प्रमाण भी बतलाए।

उस दिन जॉर्ज साहेब के घर 3, कृष्ण मेनन मार्ग से निकलकर मैं जनता दल कार्यालय पहुंचा तभी रामविलास जी ने फोन करके पूछा कि जॉर्ज साहेब ने ऐसा निर्णय क्यों लिया? मैंने उनको विस्तार से जानकारी दी।

तब रामविलास जी ने मेरे समक्ष दलित सेना के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनने तथा न्याय चक्र पत्रिका के संपादन का प्रस्ताव रखा।

कहा दोनों भाई मिलकर काम करेंगे। समाजवादी परिवार के पुराने साथी होने के कारण मैंने दोनों प्रस्ताव स्वीकार किए।

उस समय मैं युवा जनता दल का राष्ट्रीय महामंत्री भी था। रामविलास जी वीपी सिंह जी के बहुत नजदीक थे।

हम युवा शक्ति अभियान, दिल्ली में झोपड़ियों को तोडे जाने के खिलाफ तथा डंकल ड्राफ्ट के खिलाफ आंदोलन तथा किसान आंदोलन चलाते थे।

इसलिए राम विलास जी के साथ मेरी नजदीकी बढ़ती चली गई।

हमने लोकदल, जनता पार्टी, जनता दल में एक साथ काम किया। देश और विदेश की कई यात्राएं भी साथ की । उन्होंने हर साथी को बराबर का सम्मान दिया।

एक बार उनकी एसपीजी ने मुझे न्याय चक्र कार्यालय जाने से रोक दिया, मैंने निवास पर धरना शुरू कर दिया तब उन्होंने माफ़ी मांगी।

दलित सेना के एक आंदोलन में पार्लियामेंट स्ट्रीट थाना के असिस्टेंट पुलिस कमिश्नर अशोक हरि की मौत हो गई।

तब हम पर फर्जी तौर पर मुकदमे दर्ज हो गए। उन्होंने मुकदमे वापस कराने का प्रयास किया।

रामविलास जी ने एक बार अंतरराष्ट्रीय दलित माइनॉरिटी कॉन्फ्रेंस दिल्ली में आयोजित की।

वहां उन्होंने मुझे दलित सेना का एक सदस्यीय थिंक टैंक बतलाया था।

जब रामविलास जी के पिताजी का देहांत हुआ तब वे 3 दिन तक घर से नहीं निकले।

हर बार यही कहते रहे कि मैंने कभी बाबूजी को समय नहीं दिया।

मैं अब उनके लिए कुछ करना चाहता हूं।

पिताजी के बारे में उन्होंने मुझसे विस्तार से बात की जिसके आधार पर मैंने न्याय चक्र में रामविलास जी के नाम से एक लेख लिखा।

उस लेख को पढ़ने के बाद वे बोले कि मैं कभी अपने पिताजी को इतना अधिक नहीं जान पाया जितना अच्छे तरीके से डॉ. सुनीलम ने लिख दिया है।

जॉर्ज साहब के बारे में एक किस्सा है जिसका उल्लेख मैं करना चाहता हूं।

जॉर्ज साहब जनता दल के संसदीय दल के नेता पद का चुनाव लड़ रहे थे । चुनाव में उनको शरद यादव जी चुनौती दे रहे थे।

पार्टी के भीतर जॉर्ज फर्नांडिस नई अर्थव्यवस्था – वैश्वीकरण, निजीकरण और उदारीकरण, डंकल डॉफ्ट के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन चला रहे थे।

तब पार्टी में मंडलवादी हावी थे, इस स्थिति में भी रामविलास जी से लंबी बातचीत के बाद उन्होंने जॉर्ज साहब का समर्थन किया।

जब मधु दण्डवते जी ने पार्टी के संसदीय कार्यालय में मतों की गिनती मुझसे करवाई तब नतीजा अकल्पनीय तरीके से शरदजी के पक्ष में था।

मंडलवादियों की प्रतिक्रिया जॉर्ज साहब को नीचा दिखाने वाली थी।

सभी मुझे तथा एक दूसरे को मिठाई खिला रहे थे। किसी ने जॉर्ज साहेब से बात करने तक कि जहमत नहीं उठाई।

उसी दिन तय हो गया था कि जॉर्ज साहब ज्यादा दिन तक पार्टी में नहीं रहेंगे।

चुनाव नतीजे को सुनकर रामविलास जी बहुत ज्यादा दुखी हुए। उन्होंने मुझसे कहा कि तुमने मुझे चेहरा दिखाने लायक नहीं छोड़ा।

वे इतने दुखी हुए कि उन्होंने मुझसे कहा कि रात को मैं बगल के तेलुगू देशम संसदीय दल कार्यालय सोऊंगा।

मुझे यह भी याद आ रहा है कि जब मैंने राष्ट्र सेवा दल और युसूफ मेहर अली के साथ मिलकर डॉ लोहिया जी की जन्म शताब्दी वर्ष पर देश भर की यात्रा की थी तब वे दिल्ली के समापन कार्यक्रम में आए थे।

मंच से मैंने उनसे अपील की थी कि आपको चुनाव हराने वाले रामसुंदर दास जी ने यात्रा के लिए 50 हजार रूपये दिए हैं, आपको भी देना चाहिए।

उन्होंने तुरंत घर से बुलाकर मुझे यात्रा के लिए सहयोग किया था । वे सभी के साथ संबंध निभाते थे।

दलितों की राजनीति करने के बावजूद वे मानसिक तौर पर जातिवादी नहीं थे जबकि उनकी राजनीति जाति समीकरण के आधार पर ही बिहार में चलती थी।

वे बराबर समाजवादी नेता एसएम जोशी, मधु लिमये और मधु दण्डवते जी उदाहरण देते हुए उनके योगदान का जिक्र किया करते थे। सुरेंद्र मोहन का अत्यधिक सम्मान किया करते थे।

मेरी उनसे तामझाम वाली जीवन शैली को लेकर काफी बहस होती थी।

वे कहते थे कि सबल और सवर्ण लोग जब सादे कपड़े पहनते हैं तब उनकी हैसियत बढ़ती है।

लेकिन जो समाज फटेहाल स्थिति में सदियों से रहा है उसके समाज के लोग यह चाहते हैं कि उनका नेता तामझाम के साथ रहे ताकि वे सिर ऊंचा करके कह सकें वे किसी से कम नहीं हैं।

रामविलास जी 8 बार चुनाव जीते, यूपीए, एनडीए और तीसरे मोर्चे की सरकारों में मंत्री रहे।

जब भी मंत्री रहते थे उनके घर रोज सैकड़ों लोग बिहार से आते थे। अधिकतर रोजगार और इलाज के लिए आते थे।

इलाज वालों के लिए तो चिट्ठी मिल जाती थी, इलाज हो जाता था लेकिन रोजगार वालों को तो रोजगार मिलना संभव नहीं था।

कार्यकर्ता अपने बाल बच्चों और रिश्तेदारों को लेकर आते थे। रामविलासजी आश्वासन देने के अलावा और क्या कर सकते थे?

लेकिन कई बार चक्कर लगाने से कार्यकर्ता नाराज हो जाता था।

तब मुझे याद है कि रामविलास जी उसे मंत्रालय बुलाते थे वहां बिठाकर चाय नाश्ता करवाते।

निजी सचिव को बुला कर डांटते, कार्यकर्ता को अपनी मजबूरी बतलाते।

जब वे रेल मंत्री बने तब मैंने कई बार उनके संसदीय क्षेत्र हाजीपुर के कार्यकर्ताओं को उन्हें हड़काते धमकाते देखा।

यहां तक कि चुनाव हरवाने की धमकी देते, गांव में नहीं घुसने देंगे की घोषणा करते देखा लेकिन रामविलासजी ने कभी धैर्य नहीं खोया, हंसते हुए सुनते रहते थे।

थोड़ी देर बाद कार्यकर्ता का जब गुस्सा शांत हो जाता तो अगली बार आने का निमंत्रण दे देते।

मेरी रामविलास जी से अंतिम मुलाकात जॉर्ज साहब के देहांत के बाद हुई थी। तब वे जॉर्ज साहब को श्रद्धांजलि देने आए थे।

तब उन्होंने बहुत लंबे समय खड़े रहकर बात की थी तथा जॉर्ज साहब के साथ अपने लंबे करीबी रिश्तों को याद किया था मुझे उलाहना भी दिया था कि मैं सोशलिस्ट हूँ। आप क्यों नहीं मिलते कोई काम क्यों नहीं बतलाते।

यही बात उन्होंने एक बार संसद में मुलाकात होने पर उन्होंने कही थी। वे देश भर के समाजवादियों के संपर्क में रहना चाहते थे क्योंकि वे खुद की पहचान सोशलिस्ट के तौर पर मानते थे।

हालांकि मोदी- अमित शाह के मंत्रीमंडल में रहने और परिवार केंद्रित राजनीति करने तथा खर्चीली जीवन पद्धति अपनाने के कारण उन्हें समाजवादी मानना किसी के लिए भी कठिन था।

परन्तु यह तथ्य है कि उन्होंने सामाजिक न्याय के मुद्दे पर कभी कोई समझौता नहीं किया। व्यवस्था के भीतर रहकर भी बहुजन का सवाल बराबर उठाते रहे ।

दुखी मन से भावभीनी श्रद्धांजलि।

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