रामराज्य: हर पेंटिंग कुछ कहती है

राजेश शर्मा

जुमलों, भाषणों या रैलियों में लोगों को शब्दों की कलाकारी ना समझ आए तो फिर भी समझा जा सकता है लेकिन अगर लोग एक चित्र में भी कुछ बड़ा नोटिस करने में चूक रहे हैं तो वो वाकई बहुत सरसरी हो चुके हैं या आसपास के हालात से बेखबर हैं या उनको असली कहानी पता ही नहीं चल रही. इस चित्र को देखने से साफ पता चलता है कि या तो चित्र बनाने वाला कलाकार किसी खास मानसिकता और व्यक्ति -पूजा रोग से प्रभावित है या उसने खास निर्देश पर यह चित्र बनाया है.

यह तो सबने देख लिया कि इसमें एक व्यक्ति एक बच्चे के साथ जा रहा है. बड़ा कद किसका होना चाहिए था और छोटा किसका, इस पर बहुत लोग बात कर चुके हैं तो उसका जिक्र छोड़ कर आगे बढ़ते हैं लेकिन आगे बढ़ने से पहले एक सवाल का जवाब हर पाठक को खुले दिमाग से सोचने की जरूरत है.

क्या आप कभी किसी बच्चे के साथ किसी मेले या भीड़भाड़ वाली जगह में गए हैं. अगर आप परिवार वाले हैं और थोड़े भी समझदार और संवेदनशील व्यक्ति हैं तो आप बच्चे का हाथ कस कर पकड़ेंगे ताकि वो कहीं आप से अलग ना हो जाए और अगर आप अमानवीय और हिंसात्मक पर उत्पीड़न की पाश्विक प्रवृत्ति के उपासक हैं तो आपका ध्यान मेले पर या बाजार में आने के मकसद और उस लक्ष्य को हासिल करने पर होगा, जो आपको यहां खींच लाया है. आपको बच्चे की कोई चिंता नहीं होगी, ना ही उसका हाथ पकड़ने की चिंता होगी कि कहीं वह गुम ना हो जाए. संभावना है कि अगर आपका अपना बच्चा, किसी रिश्तेदार का बच्चा या किसी अजनबी का भी हो और आपको अपना समझ कर हाथ पकड़ना चाहे…और गलती से पकड़ भी ले तो आप उसे नोटिस भी नहीं करेंगे और उदासीन से अपने में मस्त चलते रहेंगे. हो सकता है आगे जाकर हाथ झटक भी दें और बच्चा लुढ़कता-पुढ़कता कहीं दूर जाकर दलदल में गिर जाए और गुमनामी के अंधेरों में दफन हो जाए क्योंकि उसको इस्तेमाल किए जाने का मकसद अब अपनी मंजिल पर है.

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बच्चा कोई भी हो सकता है. कहने को तो लोग यह भी कहते हैं कि बच्चे भगवान का रूप होते हैं. हो सकता है कि यह वाला बच्चा भगवान ही बताया जा रहा है पर भगवान चाहे बाल रूप में भी हो, यह कलाकार के लिए शर्म से डूब मरने की बात है कि वह भगवान और एक आम व्यक्ति के बीच का अंतर ढंग से चित्रित ना कर सके.

अब यह अलग शोध का विषय है कि उस कलाकार ने ऐसा जानबूझकर किया या उसे ऐसा करने के निर्देश दिए गए. लेकिन इतने ऊंचे स्तर का गुनाह या पाप सिर्फ कलाकार के दिमाग की उपज नहीं हो सकती बल्कि उसके पीछे किसी खास मानसिकता वाले थिंक टैंक द्वारा सालों पहले से तैयार किया गया बल्कि दशकों पहले से तैयार किया गया प्लान काम कर रहा है.

इस चित्र का बचाव करने वाले कुंद और मंदबुद्धि प्रकांड अज्ञानियों को पता होना चाहिए कि भगवान चाहे बाल रूप में हो या. विराट रूप में, उनकी आभा और महिमा कम नहीं की जा सकती. उदाहरण के तौर पर गणेश और कृष्ण के बाल रूप 33 करोड़ देवी देवताओं में से पहले 20 भगवानों में हैं और उनका कद इन सब से कहीं अधिक विशालकाय है.

चित्र को एक बार फिर गौर से देखिए. व्यक्ति की कोई रुचि नहीं है. वह आगे बढ़ता जा रहा है. बच्चे ने जबरदस्ती हाथ पकड़ा हुआ है.

अगर बच्चा या बाल रूप भी मान लिया जाए तो बच्चा युद्ध लड़ने, गुरुकुल या महल में नहीं जा रहा. बच्चा मंदिर में मूर्ति के तौर पर भगवान के रूप में, रामलला के रूप में स्थापित होने जा रहा है लेकिन बच्चे के कंधे पर बस्ता नहीं है, हाथ में किताब में नहीं हैं. बच्चे के हाथ में तीर धनुष है. यह सांकेतिक रूप है.

जनता, प्रजा और अवाम को यह बताने की कोशिश है कि आधुनिक शिक्षा की जरूरत नहीं है और अपने बच्चों को हथियार चलाने का प्रशिक्षण दीजिए. बच्चे को पढ़ने के लिए नहीं बल्कि हथियार चलाने की शिक्षा के लिए जाना जाए क्योंकि महाभारत हो या रामायण, सैनिकों, वानरों, मोहरों और प्यादों की आवश्यकता पड़ती ही है.

चित्र को सरसरी तौर पर देखने के बाद शायद कई लोगों को ना समझ आया हो पर अब इंगित करने के बाद यह बताने की जरूरत नहीं है कि ऐसी मानसिकता किस संस्था की है. इस बच्चे का ऐसा चित्रण करके सीधे-सीधे संदेश दिया जा रहा है कि आगे सत्ता की लड़ाई में देश के भविष्य माने जाने वाले बच्चों को किस तरह से तैयार किया जाना जरूरी है. मनोवैज्ञानिक और मानसिक तौर पर लोगों को तैयार किया जा रहा है कि उन्हें आधुनिकता के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने के बजाय पाषाण युग के गुरुकुल काल में रहने की आदत डालनी शुरू कर देनी चाहिए. एक ऐसा रामराज्य, जिसे स्थापित करने की योजना 100 सालों की प्लानिंग के बाद मूर्त रूप में शक्ल ले रही है, साकार हो रही है क्योंकि सत्ता का जुआ खेलने वालों की मानसिकता अब धर्म की बिसात पर इसी राजनीतिक चाल के मास्टरस्ट्रोक के सहारे अगले युग में प्रवेश करने की है.

दरअसल नोटबंदी से लेकर जीएसटी तक, कश्मीर फैसले से लेकर सी ए बी तक, ईवीएम से लेकर अर्थव्यवस्था तक और कोरोना से लेकर काम धंधे चौपट होने तक, लोग हकीकत से नजरें नहीं मिलाना चाहते. शुतुरमुर्ग या कबूतर की तरह आंख बंद रख अपने कंफर्ट जोन में बने रहना चाहते हैं और रोज बढ़ते जा रहे संकेतों को नजरअंदाज कर रहे हैं. समय खिसकता जा रहा है और इसका अंजाम तय है. उसे ख्याली पुलाव या बेवजह की बेहूदा कल्पना मानना सिर्फ सच से नजरेें चुराना है. इसी तरह, उससे भी बड़ा सच यह है कि वक्त इतिहास और सभ्यताएं अपनी कहानी खुद लिखती हैं.

30 से 40 साल बाद सिर्फ चार संभावनाएं बचती हैं. रामराज्य स्थापित हो जाएगा, शायद कुछ नहीं बचेगा. हो सकता है कि एक मॉडर्न अवतार, एक नया भगवान किताबों में स्थापित किया जाएगा या फिर एक ऐसी सांस्कृतिक क्रांति, जिसकी जरूरत इस मुल्क को लगभग 2000 साल से है.

(लेखक वरिष्ठ टिप्पणीकार हैं. ये लेखक के निजी विचार हैं)

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