अगर यह ट्रेलर है तो पूरी पिक्चर झोलमझोल ही होगी

२० लाख करोड़ का आत्मनिर्भर भारत अभियान

राजेंद्र तिवारी

राजेंद्र तिवारी, वरिष्ठ पत्रकार 

वित्तमंत्री निर्मला सीतारमन ने बुधवार को २० लाख करोड़ के आत्मनिर्भर भारत अभियान का पहला चरण रखा। इसमें कुल मिलाकर ५.४० लाख करोड़ रुपये की रकम का जिक्र किया गया। बहुत सी अच्छी बातें इसमें की गईं। इन घोषणाओं को देखकर कोई कह ही नहीं सकता कि कोरोना के चलते भारत देश किसी बड़े संकट से गुजर रहा है और कोरोना संकट से निपटने के पैकेज का एलान वित्तमंत्री कर रही थीं। बकौल सीतारमन, जुलाई २०१९ के बजट में और १ फरवरी २०२० के बजट में एमएसएमई को प्रोत्साहन के कदम उठाये गये थे, ये घोषणाएं उन्हीं का विस्तार हैं। अगर इस पहली किस्त को पूरे पैकेज का ट्रेलर माना जाए तो पिक्चर झोल भरी दिखाई दे रही है।
मसलन एमएसएमई को बिना कोलैटरल के लोन, एनबीसीएफसी को गारंटी, विद्युत वितरण कंपनियों को रिसीवेबल्स के एवज में ९०००० करोड़ की आपातकालीन लिक्विडिटी, ठेकेदारों व ठेका कंपनियों के लिए कार्यावधि छह महीने बढ़ाना, २०० करोड़ तक की सरकारी खरीद को ग्लोबल टेंडर के दायरे से बाहर करना, रिटर्न फाइल करने की तिथि आगे बढ़ाना और TDS/TCS की दरों में २५ फीसदी की कटौती आदि-आदि। मुझे लगता है कि इन सब मदों में जितनी रकम का जिक्र किया गया, उसको जोड़ लें तो कुल रकम ५.४० लाख करोड़ आती है। लेकिन सिफत यह कि इस किस्त में केंद्र सरकार को एक भी पैसा अपनी जेब से खर्च नहीं करना पड़ा।
अगर यह माना जाए कि ५.४० लाख करोड़ इस २० लाख करोड़ का ही हिस्सा हैं और अगले कुछ दिनों में जो घोषणाएं होनी हैं, उनके लिए मात्र ४.८६ करोड़ का ही रोकड़ा बचता है। वैसे जिस तरह प्रधानमंत्री गरीब कल्याण पैकेज की कुल रकम की गणना की गई थी, उसी तर्ज पर चलें तो पैकेज कितना भी बड़ा करने में कहीं कोई दिक्कत आनी नहीं चाहिए।
एक चौकाने वाली बात वित्तमंत्री की प्रेस कांफ्रेंस में आई और वह थी पीएफ कंट्रीब्यूशन का १२ से १० फीसदी किया जाना। यानी संकट के समय में भी सरकार कम वेतन पाने वाले कर्मचारी की अंटी से पैसा निकालकर मालिकों की अंटी में डाल रही है। कई राज्यसरकारों ने तमाम श्रम कानूनों से छूट की घोषणा तो पहले कर दी है। इस सबसे सरकार की चिंता के केंद्र व मंशा का पता चलता है।

वित्तमंत्री में एमएसएमई को लेकर जो भी घोषणाएं पहली किस्त में की हैं, उनका प्रभाव तो लॉकडाउन खत्म होने के बाद ही दिखाई देने के संकेत हैं। इस समय इन यूनिट्स को सस्ती वर्किंग कैपिटल की जरूरत थी लेकिन सरकार ने ब्याज में कोई सब्सिडी नहीं दी। इन एमएसएमई के श्रमिकों को दो माह के नुकसान की कुछ पूर्ति करने का कोई उपक्रम भी नहीं दिखाई दिया। जबकि इस समय सबसे बड़ी जरूरत जेब में पैसा डालने की है। इससे ही मांग पैदा होगी और जब मांग पैदा होगी तब ही अर्थव्यवस्था के पहिए तेजी पकड़ पाएंगे।

पैकेज फुलाने में तो महारत है मोदी जी को

प्रधानमंत्री जी जनता की मांग के मुकाबले कई गुना बड़े पैकेज की घोषणा का अनुभव रखते हैं। २०१५ में बिहार विधानसभा चुनाव से पहले प्रधानमंत्री ने आरा में जनता की भारी मांग पर १.२५ लाख करोड़ का पैकेज दिया था और वह भी बहुत नाटकीय अंदाज में….कितना चाहिए…२० हजार करोड़….४० हजार करोड़….५० हजार करोड़….लो हमने दिया सवा लाख करोड़। अब इसमें से कितना पैसा अब तक बिहार को मिला, यह जानकारी तो बिहार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही दे सकते हैं, जिन्होंने भाजपा के साथ वापसी के बाद इस पर चुप्पी ही साध रखी है। आखिरी खबर मार्च २०१७ में आई थी जिसमें कहा गया था कि २८००० करोड़ जारी किये जाने की सूचना दी गई थी।
इसी तरह, कोरोना संकट को देखते हुए विपक्षी दल ६५००० करोड़ से लेकर ४.५० लाख करोड़ तक के पैकेज की मांग कर रहे थे लेकिन प्रधानमंत्री ने उससे बहुत आगे बढ़ते हुए आत्मनिर्भरता की पैकेजिंग
में २० लाख करोड़ के पैकेज की घोषणा कर दी। अलबत्ता, इसमें से केंद्र की अंटी से कितनी रकम आएगी और कितनी रकम सीधे जनता अंटी में जाएगी, यह अगले एक-दो दिन में साफ हो जाएगा।

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