नेपाल में सत्ता की चाभी किसके पास

नेपाल सुप्रिमकोर्ट का फैसला दुनिया को अचंभित करने वाला रहा। किसीको शायद ही ऐसे फैसले का अंदाजा रहा हो। नेपाल की राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले एक से एक टिप्पणी कार ओली के संसद भंग करने के बाद मध्यवाधि चुनाव को लेकर मुत्मइन थे। यहां तककि नेपाल के राजनीतिक दलें भी। वे संसद भंग करने के ओली के फैसले के खिलाफ पहाड़ से मैदान तक आंदोलनरत थे। इस आंदोलन के बहाने दरअसल वे प्रचार अभियान शुरू कर चुके थे।

नेपाल सुप्रीमकोर्ट फैसले से केपी शर्मा ओली का दंभ तो चूर कर दिया , लेकिन इस नन्हे राष्ट्र के अधकचरे लोकतंत्र के परिपक्व होने पर सवाल अभी जस का तस है। नेपाल में लोकतंत्र तो बहाल हो गया लेकिन स्थिर सरकार के बिना नेपाली जनता में परिवर्तन की अनुभूति होना अभी बाकी है। यह अलग बात है कि राजनीतिक दलें बारी- बारी सरकार का मजा ले रही हैं। इसमें छोटे बड़े सभी राजनीतिक दल शामिल हैं।छोटे दल कभी उनके साथ तो कभी इनके साथ सत्ता का आनंद लेते रहते हैं।

अंदरखाने की खबर है कि अपने विरोध में चल रहे आंदोलन को कुचलने के लिए ओली इमरजेंसी लगाने की गुपचुप तैयारी में थे कि न्यायालय ने उनके गरदन पर उल्टे तलवार रख दी। नेपाल सुप्रिमकोर्ट का यह फैसला सत्तारूढ़ नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के मुख्य सचेतक देव प्रसाद गुरूंग के सत्ता बहाल करने की याचिका पर आया है। गुरूंग ने कुल 13 याचिकाएं दाखिल की थी।

सुप्रिमकोर्ट का यह फैसला राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी के अधिकार पर भी चोट है जिन्होंने बिना स्थितियों का मूल्यांकन किए चुनाव तिथि तक की घोषणा कर दी थी। सुप्रिमकोर्ट ने ओली के सरकार भंग करने के फैसले के खिलाफ फैसला सुनाया ही,एक तरफा अध्यादेश जारी कर सांविधानिक निकायों पर जो 35 से ज्यादा नियुक्तियां की गई थी उसे भी रद कर दिया है।

संसद के निचले सदन में ओली बहुमत में नहीं हैं। नई सरकार के लिए उन्हें इस्तीफा देना होगा या संसद में उनके खिलाफ मतदान के जरिए उन्हें पदच्युत किया जाय। तीन साल पहले आम चुनाव में ओली के नेतृत्व वाली कम्युनिस्ट धड़ा एमाले और प्रचंड के नेतृत्व वाली नेकपा माओवादी एक होकर चुनाव लड़े थे और सत्ता हासिल की थी।बाद में ओली और प्रचंड में ऐसी प्रगाढ़ता बढ़ी की प्रचंड ने गरम मिजाज समझे जाने वाले अपने नेतृत्व की कम्युनिस्ट धड़ा नेकपा माओवादी का एमाले में विलय कर लिए।

दोनों कम्युनिस्ट दलें अभी भी एक साथ हैं केवल ओली के खिलाफ प्रस्ताव पारित कर उन्हें पार्टी से निष्कासित किया गया है। यद्यपि कि ओली के खास माधव कुमार नेपाल, बामदेव गौतम भी ओली का साथ छोड़ चुके हैं लेकिन यह कहना मुश्किल है कि ओली अब अलग थलग हैं।

सुप्रिमकोर्ट के फैसले के बाद संभावित शक्ति परीक्षण के जरिए यह भी तय होना है। ओली आसानी से सत्ता छोड़ने वाले नहीं। सुप्रिमकोर्ट से हार जाने वाले ओली सत्ता की जंग मजबूती से लड़ना चाहेंगे। सत्ता की जंग में खुले तौर पर मुकाबले में अभी प्रचंड ही दिख रहे हैं लेकिन प्रचंड ही अकेले रह जाएंगे यह कहना मुश्किल है। ठीक है प्रचंड गुट और कुछ ओली के सहयोगी उनका साथ छोड़ चले हैं और ओली पार्टी से निष्कासित भी किए जा चुके हैं बावजूद इसके कोई एलायंस बनाकर ओली का नई सरकार बनाने का सपना अभी बचा हुआ है।

लेकिन यह स्थिति तब आएगी जब नई सरकार के लिए प्रचंड के अलावा कोई और चेहरा सामने आएगा जिसकी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसी स्थिति आई तो प्रचंड भी खामोश रहने वाले नहीं है।उनकी पुरजोर कोशिश होगी कि वे नहीं तो कोई नहीं।

फिलहाल सत्ता की जंग में नेपाली कांग्रेस और मधेसी दलों की निगाहें ओली और प्रचंड की ओर है। क्योंकि स्पष्ट है कि नई सरकार में नेपाली कांग्रेस और मधेसी दलों की भूमिका महत्वपूर्ण होने जा रही है।यह सरकार चाहे प्रचंड के नेतृत्व में हो, ओली के नेतृत्व में हो या किसी तीसरे के? जब तीसरे की बात होती है तो बाम देव गौतम और माधव कुमार नेपाल का नाम सामने आता है।ये दोनों एमाले के हैं और पीएम रह चुके हैं। सुप्रिमकोर्ट के ओली विरोधी फैसले के बाद यदि सत्ता की जंग त्रिकोणात्मक हुई तो पलड़ा उसका भारी होगा जिधर नेपाली कांग्रेस और मधेसी दलों का झुकाव होगा।

यशोदा श्रीवास्तव , नेपाल मामलों के जानकार

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