नाना रूप धरा देवी ने

नवरात्रि आ गयी है यानी कि 9 दिनों तक शक्ति की उपासना के लिए देवी के अलग-अलग रूपों की पूजा का क्रम चल रहा है।

दुर्गा सप्तशती में उल्लेख है –

‘प्रथमं शैल पुत्री च द्वितीयम ब्रह्मचारिणी

तृतीयं चंद्रघंटेति कूष्माणडेति चतुर्थकम

पंचमं स्कंदमातेति षष्ठं कात्यायनी च

सप्तमं कालरात्रि महागौरीति चाष्टमम

नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा प्रकीर्तीत:”

यानी कि प्रत्येक दिन अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती है जो कहीँ शान्ति स्वरूपा हैं, तो कहीं काली का रूप धर कर बिना सोचे-समझे विध्वंस कर डालती हैं।

यह शक्ति मनुष्य में नाना रूपों में निवास करती है। कभी भूख, कभी चेतना, कभी निद्रा, कभी क्षमा, कभी आलस्य, कभी धैर्य यानी कि मानव के प्रत्येक कृत्य के लिए यही शक्ति उत्तरदायी होती है। भगवान शिव शक्ति के पति बिना उनके शव हो जाते हैं।

हमारी हिन्दू संस्कृति नाना मिथकों और कल्पनाओं से भरी है। अब शंकर जी का ही वर्णन देखिये! सर पर चन्द्रमा, गले में सांप, जटा से निकलती गंगा, लगता है जैसे किसी पर्वत का वर्णन है, प्रकृति का मानवी करण है। वैसे भी त्रिदेव अजन्मा माने जाते हैं और सबके कार्यकलाप निश्चित होते हैं। कोई सृष्टिकारक है, कोई पालक तो कोई संहारक। प्रणव अक्षर मे उन तीनों की महत्ता छुपी हुई है।

देवियों का जन्म विश्व कल्याण के लिए हुआ, ऐसे उदाहरण देखने को मिलते हैं। पर देवी का दुर्गा नाम क्यों पड़ा और क्यों सारे रूप उनमें समाहित हैं और देवी का दुर्गा नाम ही क्यों जग में अधिक प्रचलित है, यह किसी ने सोचा है? दुर्गा सप्तशती में लिखा है कि दुर्गम नामक राक्षस का वध करके वह जगत में दुर्गा नाम से विख्यात हुईं तो केवल यही कारण नहीं हो सकता है।

मुझे तो कुछ और ही कारण लगता है। देवियों के मन्दिर पहाड़ों पर और द्वार संकरा होना इस बात का संकेत देता है कि वह वास्तव मैं दुर्गाधिपति होती थीं और जब जनसाधारण, जो अधिकतर किसान होते थे और अपने खेतों की सुरक्षा को लेकर चिंतित रहते थे. तो पहाड़ों पर अपने मन्दिर से उनके खेतों की रखवाली करती थी क्योंकि पहाड़ों से अधिक भूक्षेत्र पर नजर रखी जा सकती है।

इसके लिए कुछ भाग उन्हें उनके नाम पर बोये जौ के रूप मे मिल जाता था। इसके अलावा जब शत्रु इनके निवास स्थान के संकरे द्वार से प्रविष्ट होता था तो अपनी जान से ही हाथ धोता था। मुख्य फसल रबी और खरीफ के बाद इनके पास समय ही समय रहता था और उस समय यह जनजीवन की उस समय की बीमारी बाँझपन, कोढ़, अन्धा रोग दूर करती थीं, कन्याओ का विवाह कराती थीं, गरीबों को धन देती थीं, क्योंकि पहाडी क्षेत्र मे औषधीय जड़ी-बूटी आराम से मिल जाती है।

फ़िर कुलदेवी के रूप मे इनको मान मिलने लगा। हर घर की एक कुलदेवी होती थी जिसे बिना प्रसन्न किये कोई शुभ कार्य नहीं होता था। वैक्सीन के अभाव में चेचक की भी देवी कह कर पूजा की जाती थी। असल मे दो बार जब मौसम बदलने पर बीमारी की आशंका अधिक होती है तो देवी की पूजा करके बासी भोजन किया जाता है और शरीर में बीमारी के कीटाणु पहुँचाया जाता है ताकि स्वस्थ कीटाणु उन्हें लड़ कर समाप्त कर सकें। लोकगीतों में भी इनके इसी लोक कल्याणकारी रूप का वर्णन है जहाँ वह अपनी कृपा से लोक कल्याणकारी कार्य करते हैं। वैसे इस शक्तिस्वरूपा की कल्पना विराट पुरुष की चरण सेवा करने वाले के रूप में की गई। वह त्रिगुणमयी महालक्ष्मी हैं, सबका आदिकारण हैं और

“मातु लूंगा,गदा,पानपेत्रेयं विभूति

नाम,लिंग च योनि विभूति नृप मुर्धनि”

भुवनेश्वरी संहिता के अनुसार मातु लुंग कर्म राशि का, गदा क्रियाशील का,और पान पात्र तुरीय वृत्ति का सूचक है। इसी प्रकार नाम से काम का, योनि से प्रकृति का और लिंग से पुरुष का गृहण होता है।

देवी ने अपने मूर्त स्वरूप मे महिषासुर, शुम्भ-निशुंभ, धुमृलोचन आदि का वध किया। आज तो लोग इनकी शक्ति से प्रेरणा न लेकर इनके बड़े-बड़े पंडाल सजाते है, लाखों दर्शक उसे देखने आते हैं। छोटे-मोटे मेले का आयोजन होता है। अबकी संभवतः कोरोना की वजह से इनकी रंगत फीकी पड़ जाये।

वैसे नवरात्र हम लोगों का एक प्रकार से डॉटर्स डे ही है। पश्चिमी संस्कृति में इसे एक दिन में मना कर समाप्त कर देते हैं पर हम 9 दिन तक मनाते हैं और कन्याओं में ही देवी का वास मान कर उनकी पूजा करते हैं।

किस संस्कृति मे इतनी उदारता है? यहाँ पर यदि स्त्री पर किसी प्रकार का अत्याचार होता है तो बड़े शर्म की बात है क्योंकि हमारी सँस्कृति नारी का सम्मान करना सिखाती हैं, अपमान नहीं तो हमें इस उत्सव के मूल उद्देश्य को समझना चाहिए और जो कुछ भी समाज में स्त्रियों पर अत्याचार हो रहे हैं, उनका नामोनिशान मिटा देना चाहिए। यही मेरी इस नवरात्र की पूजा है और यही कामना है।

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