मानसिक रोगों की ग्रह चिकित्सा


आयुर्वेद के आठ अंग माने गए हैं – काय बाल ग्रहों ऊर्धवांग शल्य दृष्टा जरा तथा वृषे । इनमें ग्रह चिकित्सा भूत विद्या है इस भूत विद्या के अंतर्गत ही चिकित्सा ज्योतिष भी समाविष्ट है किंतु इस क्षेत्र में प्राचीन ग्रंथ लगभग अनुपलब्ध है। फलत: यह क्षेत्र आयुर्वेद में भी उपेक्षित सा रह गया है।
आयुर्वेद किसी व्यक्ति को तब तक स्वस्थ नहीं मानता जब तक उसमें दोष अग्नि धातु एवं मल की क्रिया की समानता के साथ-साथ उस व्यक्ति के मन और आत्मा में प्रसन्नता ना हो।
आधुनिक मनोवैज्ञानिकों में सिगमंड फ्रायड अल्फ्रेड एल्डर तथा सी. जी. जुंग आदि ने मनोरोगों के कारणों पर गहन शोध किया था तथा मनोविश्लेषण पद्धति द्वारा उनके साधन के सिद्धांत को भी प्रतिपादित किया था।
महर्षि इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी, फेयरफील्ड, इवोवा, यू.एस.ए से संबंधित वैदिक ज्योतिष के अनुसंधानकर्ताओं ने नौ ग्रहों बारह राशियों तथा सत्ताईस नक्षत्रों से आने वाली रश्मियों का मानव मस्तिष्क तथा केंद्रीय स्नायु संस्थान के विभिन्न भागों के मध्य अंतर्संबंध के रहस्य को उजागर किया हैं।
यदि हम मानव मस्तिष्क की बात करे तो एक वह भाग हैं जो सोचने विचारने का कार्य करता हैं, ज्योतिष में इसका कारक सूर्य हैं।
मस्तिष्क का दूसरा भाग वह है जहा से भावनाए उत्पन होती हैं, ज्योतिष में इसका कारक चंद्रमा हैं।
जन्म कुंडली में सूर्य तथा प्रथम स्थान पीड़ित हो तो इस जातक में देखा जाता हैं की तार्किक सोच का अभाव होता हैं। चंद्रमा का लग्न पर प्रभाव होने पर जातक अपने मन का करने वाला मनमौजी होता है इसके अतिरिक्त बुध भाषा ज्ञान ब्रहस्पति व्याकरण ज्ञान और शनि दार्शनिक सोच देने वाला ग्रह हैं।
ज्योतिष ग्रंथो में यह उल्लेख हैं की चंद्रमा का मस्तिष्क पर सर्वाधिक प्रभाव पड़ता हैं।यदि हम चंद्रमा तथा मस्तिष्क में संबंध खोजने का प्रयास करें तो यह संबंध सूत्र शीघ्र ही दृष्टिगोचर होने लगता हैं। हम देखते हैं की पूर्णिमा के दिन समुद्र में ज्वार भाटा सर्वाधिक आता हैं अर्थात पृथ्वी का जल चंद्रमा से सर्वाधिक प्रभावित होता हैं, यह ज्ञात तथ्य हैं की हमारे शरीर में जल तत्व ही सर्वाधिक हैं इसलिए चंद्रमा से हमारे शरीर का जल भी अवश्य प्रभावित होगा।

फलत: जिस शरीर का रक्षा कवच दुर्बल होगा, उस शरीर का जल तत्व अधिक प्रभावित होगा तथा मस्तिष्क में हलचल मचा कर विकृति उत्पन कर सकता हैं।
लग्न कुंडली में मस्तिष्क का विचार प्रथम स्थान से, बुद्धि का विचार पंचम भाव से, तथा मन: स्थिति का विचार चंद्रमा से किया जाता हैं, इसके अतिरिक्त शनि, बुध, शुक्र तथा सूर्य का मानसिक स्थिति को सामान्य बनाए रखने में विशेष योगदान हैं तो ग्रहों से विद्युत चुम्बकीय तरंगे निकलती हैं जो मनुष्य के रत्न धारण करने पर, ग्रहों के मंत्रों का उच्चारण करने पर, मंत्र जाप करने, ग्रहों के मंत्रों से यज्ञ, हवन आदि करने से उन्हें सकारात्मक रूप से प्रभावित करती हैं और मनुष्य को मानसिक शांति मिलती हैं।
तो इस प्रकार वैज्ञानिक रूप से से भी हम कह सकते हैं की ग्रह चिकित्सा का मनुष्य पर बहुत प्रभाव पड़ता है।


-डॉ सीमा वर्मा, लखनऊ

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