करोगे याद तो हर बात याद आएगी….

कवियत्री मीनू रानी दुबे नहीं रहीं _ एक श्र्द्धांजलि

रतिभान त्रिपाठी, वरिष्ठ पत्रकार, प्रयागराज से 

   अरुण पाठक जी की फेसबुक पोस्ट आज शाम को देखी तो कलेजा धक कर गया। मीनू रानी दुबे नहीं रहीं…। प्रयागराज शहर की स्वनामधन्य रचनाकार, कवयित्री, पत्रकार, रेडियो-टीवी और साहित्यिक मंचों का एक सुपरिचित नाम मीनू रानी दुबे…। 

  राजनीति के साथ साथ साहित्य जगत में अपनी धाक के लिए पहचाने जाने वाले इलाहाबाद यानी प्रयागराज में साहित्यिक सांस्कृतिक मंचों में पिछले दो तीन दशकों का कालखंड मीनू रानी दुबे को शामिल किए बिना अधूरा रहेगा। इस दौर में उनके अस्वस्थ होने के दिनों को छोड़ दिया जाए तो शायद ही ऐसा कोई बड़ा मंच होगा, जहां प्रथमत: संचालक या किसी न किसी अन्य रूप में मीनू रानी की मौजूदगी न रही हो। 

    बाबा नागार्जुन, त्रिलोचन शास्त्री से लेकर रामकुमार वर्मा, महादेवी वर्मा और बाद के कालखंड में रवींद्र कालिया से लेकर ममता कालिया तक, देश के सुपरिचित और नामी गिरामी साहित्यकारों में कौन ऐसा रहा होगा, जो मीनू रानी के सवालों से रूबरू न हुआ हो। एक दौर में एक मंजी हुई साहित्यिक इंटरव्यूअर के तौर पर उनका नाम उभरकर सामने आया था। इलाहाबाद, लखनऊ दूरदर्शन के साहित्यिक कार्यक्रमों में भी उनकी मौजूदगी रहा करती थी। इलाहाबाद की सक्रिय महिला पत्रकारों की जब भी चर्चा होगी, मीनू रानी के बगैर पूरी ही नहीं हो सकती। 1973 के आसपास एक दौर ऐसा भी रहा, जब इस शहर के रेड लाइट एरिया मीरगंज पर देशदूत अखबार में एक रपट छपी। प्रदीप सौरभ के साथ मीनू रानी भी उस रिपोर्टिंग में शुमार थीं। एक महिला के तौर पर बदनाम गलियों पर रपट लिखना उस दौर के पुरातनख्याल शहर में यह मीनू रानी की क्रांतिकारिता ही कही जाएगी।

    इस शहर में दो बड़े प्रकाशनों की स्थिति 1990 के बाद से ही डांवाडोल हो चली थी। मित्र प्रकाशन यानी माया प्रेस के लाॅकडाउन और पत्रिका प्रेस की तबाही के दौर ने इलाहाबाद शहर के सैकड़ों पत्रकार बेजार-लाचार कर दिए। जिंदगी की जिद्दोजहद ने जिन कुछ लोगों को शहर से बाहर जाने की ताकत दी, वह तो बच गए लेकिन जो किन्हीं कारणों से बाहर नहीं जा पाए, उनमें से बहुतों को यहीं ‘होम’ होना पड़ा। मीनू रानी दुबे भी माया प्रेस के लाॅकडाउन का शिकार हुई थीं लेकिन उनके हुनर ने जैसे तैसे उन्हें बचाए रखा। नौकरी गई तो मीनू रानी ने साहित्यिक मंच पकड़ लिये। जीवनयापन के लिए वह प्रर्याप्त भले न रहे हों लेकिन स्वाभिमान रक्षा के लिए तो थे ही। 

  बहुत खुद्दार थीं वो। स्वाभिमान पर कोई चोट करे और मीनू रानी उस पर फट न पड़ें, यह असंभव। इस शहर के वरिष्ठ पत्रकार डॉ. रामनरेश त्रिपाठी ने नवभारत टाइम्स के तत्कालीन संपादक रामपाल सिंह के यह कहने पर कि अपने यहां की किसी महिला पत्रकार से कुछ विषयों पर लिखवाइए, तो डॉ. त्रिपाठी ने मीनू रानी को साहित्यिक इंटरव्यू करने का जिम्मा सौंपा। मीनू जी ने वह दायित्व बखूबी निभाया। 

   मैं 1990 के आसपास उनके संपर्क में आया। मुझे वह बड़ी बहन जैसा स्नेह देती थीं। एक दौर में मैं त्रिवेणी महोत्सव समिति का सदस्य हुआ करता था। वह मेरी साहित्यिक सांस्कृतिक अभिरुचि से वाकिफ थीं। शाम को रिक्शे पर सवार होकर अपने घर त्रिपौलिया से सीधे दैनिक जागरण के दफ्तर मेरे पास पहुंच जातीं। कुछ साल तक त्रिवेणी महोत्सव के मंच का संचालन उन्हीं के जिम्मे था। अपनी श्रमसाध्य प्रतिभा के बावजूद मुझसे कुछ टिप्स मांगतीं। मैं कहता कि आपको सब पता है, फिर भी मेरे कुछ न कुछ वाक्य और शब्द अपनी डायरी में जरूर नोट करतीं। यह उनका बड़प्पन और जिज्ञासु भाव था। पिछले एक दशक में मेरी उनसे मुलाकात तो बहुत कम हुई लेकिन टेलीफोनिक संपर्क जरूर बना रहा। उनकी बहुत सी बातें आज एक एक करके याद आ रही हैं।

   प्रयागराज का कौन सा पढ़ा-लिखा या समाज में प्रतिष्ठित परिवार है, जो मीनू रानी दुबे से लगाव नहीं रखता रहा हो। तभी तो इस शहर के तकरीबन हर रचनाकार, कवि, कलाकार और संस्कृतिकर्मी ने आज उन्हें पूरे श्रद्धाभाव से याद किया। इलाहाबाद उत्तरी क्षेत्र के विधायक हर्षवर्धन बाजपेई ने खुद अपनी फेसबुक पोस्ट में मीनू जी को याद करते हुए लिखा कि वो हमारी अभिभावक थीं। 

मीनू बहन, आप भले अब इस दुनिया में नहीं हो लेकिन आपका कृतित्व चिरजीवी रहेगा। हम आपको अश्रुपूरित नेत्रों से याद कर रहे हैं।

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