“गोमूत्र और गोबर कोविड का इलाज नहीं “- लिखने वाले पत्रकार समेत दो गिरफ्तार

प्रभाकर मानी तिवारी

पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर में खासकर बीजेपी के सत्ता में आने के बाद पत्रकारों को उत्पीड़न और दमन के मामले तेजी से बढ़े हैं. हालत यह है कि सरकार को ऐसा कोई पत्रकार पसंद नहीं है जो सोशल मीडिया के जरिए भी उस पर अंगुली उठा रहा हो. ताजा मामले में एक पत्रकार और एक मानवाधिकार कार्यकर्ता को महज इसलिए गिरफ्तार कर लिया गया है कि उन्होंने अपनी सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा था कि गोमूत्र और गोबर कोरोना का इलाज नहीं है. उन्होंने यह पोस्ट कोरोना संक्रमण से प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष टिकेंद्र सिंह के निधन के बाद लिखी थी.पत्रकार किशोर चंद्र वांगखेम के खिलाफ तो राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए) लगा दिया गया है.

बीते सप्ताह मणिपुर प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष सैखोम टिकेंद्र सिंह की कोरोना संक्रमण से मौत हो गई थी. उसके बाद पत्रकार किशोर चंद्र वांगखेम ने अपनी एक फेसबुक पोस्ट में लिखा था, “गोबर और गोमूत्र काम नहीं आया. यह दलील निराधार है. कल मैं मछली खाऊंगा.” इसी तरह एक मानवाधिकार कार्यकर्ता एरेंड्रो लिचोम्बम ने लिखा था, “गोबर और गोमूत्र से कोरोना का इलाज नहीं होता है. विज्ञान से ही इलाज संभव है और यह सामान्य ज्ञान की बात है. प्रोफेसर जी आरआईपी.” इसके बाद प्रदेश बीजेपी उपाध्यक्ष उषाम देबन और महासचिव पी प्रेमानंद मीतेई ने इन दोनों के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी. उसके आधार पर पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत उनको गिरफ्तार कर लिया.

किशोरचंद्र और एरेन्ड्रो के वकील चोंगथाम विक्टर ने कहा, “दोनों को सोशल मीडिया की एक पोस्ट के लिए गिरफ़्तार किया गया है. दरअसल उन्होंने चिकित्सा विज्ञान के आधार पर गाय के गोबर और गोमूत्र के इस्तेमाल पर अपनी बात कही थी. उन लोगों ने अपनी पोस्ट में किसी भी व्यक्ति का नाम उल्लेख नहीं किया था.”

वैसे, पत्रकार किशोर चंद्र और लिचोम्बम से सरकार की खुन्नस कोई नई नहीं है. इससे पहले भी उनको दो बार फेसबुक के कथित आपत्तिजनक पोस्ट के लिए गिरफ्तार किया जा चुका है. किशोर चंद्र को तो मुख्यमंत्री के खिलाफ टिप्पणी के लिए राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. उन्होंने आरोप लगाया था कि रानी लक्ष्मीबाई का मणिपुर से कोई लेना-देना नहीं था. उन्होंने मुख्यमंत्री एन.बीरेन सिंह की आलोचना करते हुए उनको केंद्र की कठपुतली करार दिया था. वांगखेम ने मुख्यमंत्री से पूछा था कि क्या झांसी की रानी ने मणिपुर के उत्थान में कोई भूमिका निभाई थी? उस समय तो मणिपुर भारत का हिस्सा भी नहीं था.

वांगखेम ने अपनी पोस्ट में कहा था कि वे मुख्यमंत्री महोदय को यह याद दिलाना चाहते हैं कि रानी का मणिपुर से कोई लेना-देना नहीं था. अगर आप उनकी जयंती मना रहे हैं, तो आप केंद्र के निर्देश पर ऐसा कर रहे हैं.

इसके बाद उनको देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. तब उनको लगभग छह महीने जेल में रहना पड़ा और मणिपुर हाईकोर्ट के निर्देश के बाद वे अप्रैल, 2019 में जेल से रिहा सके. इसके बाद उनको फेसबुक की एक पोस्ट की वजह से बीते साल 29 सितंबर को ही दोबारा गिरफ्तार किया गया था. लिचोम्बम ने कुछ साल पहले पीपुल्स रिसर्जेंस एंड जस्टिस एलायंस नामक एक राजनीतिक दल का गठन किया था. मशहूर सामाजिक कार्यकर्ता इरोम शर्मिला ने भी इसी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा था.

बीजेपी के प्रवक्ता चोंगथम बिजॉय का कहना था, “यह सज्जन अक्सर आदतन ऐसे मौखिक अपराध करते रहे हैं. पहले भी वह हमारी पार्टी के ख़िलाफ़ अपमानजनक बयानों के लिए जेल जा चुके है. उस दौरान भी उनपर एनएसए लगाया गया था लेकिन अदालत ने बाद में किसी तरह एनएसए तो हटा दिया था लेकिन वह क़रीब छह महीने तक जेल में रहे थे.”

किशोर चंद्र औऱ लिचोम्बम की गिरफ्तारी पर स्थानीय पत्रकारों और पत्रकार संगठनों में तो रहस्यमय चुप्पी है. लेकिन इसके खिलाफ देश के कई मानवाधिकार और पत्रकार संगठनों ने आवाज उठाई है. कई संगठनों ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से भी इस मामले में हस्तक्षेप की अपील की है. मुंबई प्रेस क्लब ने रविवार को अपने एक ट्वीट में इन गिरफ्तारियों की कड़ी निंदा करते हुए उन दोनों को शीघ्र रिहा करने की मांग की है.

राज्य के वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप फंजोबम के अनुसार साल 2017 में बीजेपी सरकार आने के बाद से यहाँ के पत्रकारों पर काफ़ी दबाव है.

मणिपुर के एक वरिष्ठ पत्रकार नाम नहीं छापने की शर्त पर कहते हैं, “बीजेपी के सत्ता में आने के बाद राज्य में पत्रकारों के खिलाफ उत्पीड़न के मामले लगातार तेज हो रहे हैं. कब किस पोस्ट या रिपोर्ट के आधार पर हमें राजद्रोह का आरोप लगा कर जेल भेज दिया जाएगा, यह कहना मुश्किल है. सरकार अपनी आलोचना बर्दाश्त नहीं कर पाती.” उनका कहना था कि यहां होने वाले उत्पीड़न की खबरें अमूमन देश के दूसरे हिस्से में नहीं पहुंच पाती.

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