मकर संक्रांति पर्व का वैज्ञानिक और सांस्कृतिक महत्व

मकर संक्रांति — सांस्कृतिक और राष्ट्रीय एकता अखंडता का पर्व

मकर संक्रांति पर्व के पीछे खगोलीय विज्ञान के साथ – साथ कई परम्पराएँ, कथाएँ और मिथक जुड़े हैं. मकर संक्रांति पर्व भारत की सांस्कृतिक और राष्ट्रीय एकता अखंडता का भी पर्व है. प्रस्तुत है तीर्थराज प्रयागराज से वैज्ञानिक डा चंद्रविजय चतुर्वेदी का लेख. 

मकर संक्रांति कब और क्यों?

मकर संक्रांति पर्व एक खगोलीय घटना है।मकर  संक्रांति का अर्थ होता है सूर्य का एक राशि से उससे अगले राशि में जाना या संक्रमण करना। इस प्रकार पूरे वर्ष में कुल बारह संक्रांतियां होती हैं। 

आंध्र ,तेलंगाना ,कर्णाटक ,महाराष्ट्र ,तमिलनाडु ,केरल ,उड़ीसा ,पंजाब ,गुजरात प्रांतों में संक्रांति के दिन से ही माह प्रारम्भ होता है जबकि बंगाल और असम में संक्रांति के दिन माह का अंत होता है।

पौष मास में जब सूर्य धनु राशि से निकलकर शनि के राशि मकर में प्रवेश करता है तो इस खगोलीय पर्व को मकर संक्रांति के उत्सव के रूप में पूरे देश में सूर्य के आराधना के रूप में  अलग अलग तरीके से मनाया जाता है। 

वर्ष 2021 में मकर संक्रांति की विशिष्टता

वर्ष 2021 में मकर संक्रांति पर्व एक विशिष्टता के साथ अवतरित हो रहा है। इस वर्ष सूर्य अकेले मकर संक्रांति के दिन मकर राशि में नहीं प्रवेश कर रहे हैं बल्कि उनके साथ चार अन्य ग्रह बुध ,गुरु ,चन्द्रमा और शनि भी मकर राशि में उनके साथ होंगे। यह शुभता का द्योतक है जिसकी प्रतीक्षा धरती के समस्त चराचर को है। वंदन है ,अभिनन्दन है –मकर संक्रांति 2021 –यह शुभ मुहूर्त प्राणियों का कल्याण करे।

सूर्य उत्तरायण कब होता है

मकर संक्रांति पर्व के दिन ही सूर्य उत्तरायण होंगे। शास्त्रों में सूर्य के उत्तरायण होने का बहुत महत्त्व है। सूर्य के उत्तरायण होने का अर्थ है सूर्य की किरणों का पूर्व से उत्तर की ओर गमन जिससे मौसम गरम होना प्रारम्भ हो जाता है। गीता के अध्याय 8 के श्लोक 24 में कहा गया है की जिस मार्ग में उत्तरायण के छह महीनों  का अभिमानी देवता है उस मार्ग में मरकर गए हुए ब्रह्मवेत्ता ,योगी जन देवताओं द्वारा ले जाए जाकर ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।

  शास्त्रों के अनुसार दक्षिणायन को देवताओं की रात्रि अर्थात नकारात्मकता का प्रतीक समझा जाता है। उत्तरायण को देवताओं का दिन अर्थात सकारात्मकता का प्रतीक मानते हैं और धारणा है की इस दिन जब की उत्तरायण प्रारम्भ हो रहा है गंगा स्नान और दान पुण्य का अतिशय महत्त्व है। 

सूर्योदय

प्रयागराज में कुंभ, अर्द्ध  कुम्भ तथा माघ मेला का स्नान पर्व मकर संक्रांति से ही प्रारम्भ हो जाता है।

सूर्य यद्यपि सभी राशियों को प्रभावित करते हैं परन्तु कर्क और मकर राशि पर सूर्य का प्रवेश धार्मिक दृष्टि से फलदायक होता है ,यह प्रवेश छह मास पर होता है. 

भारतीय पंचांग पद्धति में समस्त तिथियां चन्द्रमा की गति के आधार पर निर्धारित की जाती हैं किन्तु मकर संक्रांति का निर्धारण सूर्य की गति से होता है अतः मकर संक्रांति 14 जनवरी को ही पड़ती है।

मकर संक्रांति जैसा पर्व राष्ट्रीय जीवन की प्रतिध्वनि है। सतत प्रवहमान भारतीय संस्कृति में सूर्य के प्रति आस्था और ऐक्य की भावना के साथ चेतना का विश्वास है जो –आत्मवत सर्वभूतेषु की भावना का द्योतक है.

 तभी तो मकर संक्रांति पर्व की पूर्व संध्या पर अँधेरा होते ही 13 जनवरी की रात को अग्निदेव को तिल ,गुड़ ,चावल और भुने हुए मक्के की आहुति देकर संक्रांति का स्वागत हरियाणा और पंजाब में  किया जाता है।

 पूरे भारत में मकर संक्रांति किसी न किसी रूप में मनाया जाता है। गुजरात और उत्तराखंड में उत्तरायण के रूप में। हिमाचल प्रदेश ,हरियाणा ,पंजाब में माघी के रूप में। उत्तर प्रदेश ,बिहार में खिचड़ी के रूप में। बंगाल में पौष संक्रांति के रूप में। तमिलनाडु में पोंगल के रूप में चार दिनों तक इस त्यौहार को मनाते हैं। शेष प्रांतों  में इसे मकर संक्रांति के रूप में मनाया जाता है। इस त्योहार के साथ सूर्य की उपासना ,पवित्र नदियों में स्नान और दान की परंपरा जुड़ी  हुई है।

मकर संक्रांति की कथाएँ और मिथक 

मकर संक्रांति पर्व के साथ कई कथाएँ और मिथक भी जुड़े हैं. श्रीमदभागवत और देवी पुराण में एक कथा का उल्लेख है। सूर्य अपनी एक पत्नी छाया और उसके पुत्र शनिदेव से रुष्ट हो जाते हैं। शनिदेव ,सूर्यदेव को कुष्ठ रोग से पीड़ित होने का श्राप देता है। इस श्राप का ज्ञान जब सूर्य की दूसरी पत्नी संज्ञा और उसके पुत्र यमराज को होता है तो वह कुष्ठ रोग के शमन हेतु तपस्या करता है .

इसी बीच सूर्यदेव रुष्ट होकर शनि के घर कुम्भ जो उसकी राशि होती है उसे भस्म कर देते हैं। शनिदेव और उनकी माता कष्ट में आ जाती हैं। सूर्य के पुत्र यमराज सूर्य को क्षमा के लिए मनाते हैं। अंततः सूर्यदेव ,शनिदेव के घर पहुंचते हैं . शनिदेव के पास तिल के अतिरिक्त कुछ भी शेष नहीं है जिससे वे सूर्य की पूजा कर सके। सूर्यदेव प्रसन्न होते हैं और शनि को वरदान देते हैं की मकर राशि के घर में प्रवेश करते ही वह धन धान्य से पूर्ण हो जाएगा। इसी कथा से मकर संक्रांति के दिन तिल के सेवन का महत्त्व बढ़ जाता है। इसीलिए मकर संक्रांति को तिल संक्रांति भी कहा जाता है।

 दूसरी कथा है की मकर संक्रांति के दिन ही माँ गंगा ,राजा भगीरथ के रथ के पीछे पीछे चलते हुए कपिल ऋषि के आश्रम होते हुए सागर तक की यात्रा की। इसीलिए आज के दिन गंगासागर बंगाल में स्नान का विशेष महत्त्व है।

तीसरी कथा भीष्म पितामह से सम्बंधित है. मकर संक्रांति के दिन ही सूर्य के उत्तरायण होने पर उन्होंने प्राण त्याग कर शर शैय्या के कष्ट से मुक्ति पाई थी।

   चौथी कथा का उल्लेख पुराणों में मिलता है कि  मकर संक्रांति को ही भगवान विष्णु ने असुरों का समूल नाश कर उन्हें मंदार पर्वत के नीचे दबा दिया था। असत पर सत के विजय के रूप में तमिलनाडु में पोंगल के विजयोत्सव के रूप में इस पर्व को चार दिनों तक मनाया जाता है।

कृपया इसे भी देखें : https://mediaswaraj.com/dharm_religion_essence/

लोकजीवन का महत्वपूर्ण त्यौहार

मकर संक्रांति भारत की सांस्कृतिक एकता का भी पर्व है

 सांस्कृतिक एकता स्थापित करने वाला मकर संक्रांति पर्व युगों से लोकजीवन का भी एक महत्वपूर्ण त्यौहार है . लड़की के नैहर से खिचड़ी या खिचवाड़ भेजने की परंपरा न जाने कितने युगों से आज तक अक्षुण्य चली आ रही है। सामर्थ्य के अनुसार से लड़की का पिता चावल ,दाल ,तिल ,बेसन का लड्डू आदि अपनी लड़की के लिए भेजता है जो दान के साथ साथ अपनत्व और सौहार्द का उपहार होता है। यही भारतीयता की अव्याहत सांस्कृतिक धारा है जिससे यह देश जीवंत है।

डा चन्द्रविजय चतुर्वेदी , प्रयागराज

Chandravijay Chaturvedi
Dr Chandravijay Chaturvedi

Leave a Reply

Your email address will not be published.

8 − four =

Related Articles

Back to top button