गांधी जी की हत्या के कुल छह प्रयास हुए

उनकी सुनियोजित हत्या की पांच और कोशिश हुई थी

1915 में गांधी जी दक्षिण अफ्रीका छोड़कर, फिर वापस न जाने के लिए भारत आ गये। उस दिन से 30 जनवरी 1948 को मारे जाने के बीच, उनकी सुनियोजित हत्या की पांच और कोशिश हुई थी। जो लोग उनकी हत्या के पीछे पाकिस्तान को दिये जाने वाले 55 करोड़ रुपये को वजह बताते हैं, उन्हें जवाब देना चाहिए कि 55 करोड़ का मामला तो बंटवारे के समय खड़ा हुआ, फिर गांधी जी की जान लेने की कोशशें 1934 से ही क्यों हो रही थीं?

पहली कोशिश-1934 :

तब पुणे हिन्दुत्व का गढ़ माना जाता था। पुणे की नगरपालिका ने महात्मा गांधी का सम्मान समारोह आयोजित किया था। 25 जून को उस समारोह में जाते वक्त उनकी गाड़ी पर बम फेंका गया। नगरपालिका के मुख्य अधिकारी और पुलिस के दो जवानों सहित सात लोग गंभीर रूप से घायल हुए। हत्या की यह कोशिश इसलिए विफल हुई कि जिस गाड़ी पर यह मानकर बम डाला गया था कि इसमें गांधी जी हैं, दरअसल गांधीजी उसमें नहीं, उसके पीछे वाली गाड़ी में थे।

दूसरी कोशिश-1944 :

आगा खा महल की लंबी कैद से गांधीजी जब रिहा किये गये तो बीमार पड़ गये। तय हुआ कि बापू को अभी किसी राजनीतिक गहमागहमी में न डाल कर, उन्हें कहीं शांत-एकांत में आराम के लिए ले जाया जाये। उन्हें पुणे के निकट पंचगनी ले जाया गया। पुणे के नजदीक बीमार गांधीजी का ठहरना हिन्दुत्ववादियों को अपने शौर्य प्रदर्शन का अवसर लगा और वहां पहुंचकर वे लगातार नारेबाजी, प्रदर्शन करने लगे। 22 जुलाई को एक युवक मौका देखकर गांधीजी की तरफ छुरा लेकर झपटा। लेकिन भिल्लारे गुरु जी ने बीच में ही उस युवक को दबोच लिया और उसके हाथ से छुरा छीन लिया। गांधीजी ने उस युवा को छोड़ देने का निर्देश देते हुए कहा कि उससे कहो कि वह मेरे पास आकर कुछ दिन रहे, ताकि मैं जान सकूं कि उसे मुझसे शिकायत क्या है। वह युवक इसके लिए तैयार नहीं हुआ। उस युवक का नाम नाथूराम गोडसे था।

तीसरी कोशिश-1944 :

इसी साल तीसरी कोशिश फिर की गयी, ताकि पंचगनी की विफलता को सफलता में बदला जा सके। इस बार स्थान था वर्धा स्थित गांधी का सेवाग्राम आश्रम। पंचगनी से निकलकर गांधीजी फिर से अपने काम में डूबे थे। विभाजन की बातें हवा में थीं और मुहम्मद अली जिन्ना उसे सांप्रदायिक रंग देने में जुटे थे। सांप्रदायिक हिन्दू भी मामले को और बिगाड़ने में लगे थे।

गांधी जी अपनी हत्या की इन कोशिशों का मतलब समझ रहे थे, लेकिन वे लगातार एक से बड़े दूसरे खतरे में उतरते भी जा रहे थे।

गांधीजी जिन्ना से मिलने मुम्बई जाने की तैयारी कर रहे थे। सावरकर-टोली ने घोषणा कर दी कि वे किसी भी सूरत में गांधीजी को जिन्ना से बात करने मुम्बई नहीं जाने देंगे। पुणे से उनकी एक टोली वर्धा आ पहुंची और उसने सेवाग्राम आश्रम घेर लिया। वे वहां से नारेबाजी करते, आने-जाने वालों को परेशान करते, गांधीजी पर हमला करने का मौका खोजते रहते। पुलिस का पहरा था। गांधी जी ने बता दिया कि वे नियत समय पर मुम्बई जाने के लिए आश्रम से निकलेंगे और विरोध करने वाली टोली के साथ तब तक पैदल चलते रहेंगे, जब तक वे उन्हें मोटर में बैठने की इजाजत नहीं देते। गांधीजी की योजना जानकर पुलिस सावधान हो गयी। पुलिस के पास खुफिया जानकारी थी कि ये लोग कुछ अप्रिय करने की तैयारी में हैं, इसलिए उसने ही कदम बढ़ाया और उपद्रवी टोली को गिरफ्तार कर लिया। सबकी तलाशी ली गयी तो इस टोली के सदस्य ग.ल. थत्ते के पास से एक बड़ा छुरा बरामद हुआ।

चौथी कोशिश-1946 :

पंचगनी और वर्धा की विफलता से परेशान होकर इन लोगों ने तय किया कि गांधीजी को मारने के क्रम में कुछ दूसरे भी मरते हों तो मरें। इसलिए 30 जून को उस रेलगाड़ी को पलटने की कोशिश हुई, जिसमें गांधीजी मुम्बई से पुणे जा रहे थे। करजत स्टेशन के पास पहुंचते-पहुंचते रात गहरी हो चली थी, लेकिन सावधान ड्राइवर ने देख लिया कि ट्रेन की पटरियों पर बड़े-बड़े पत्थर डाले गये हैं ताकि गाड़ी पलट जाये। इमरजेंसी ब्रेक लगाकर ड्राइवर ने गाड़ी रोकी। जो नुकसान होना था, वह इंजन को हुआ, गांधीजी बच गये। अपनी प्रार्थना सभा में गांधीजी ने इसका जिक्र करते हुए कहा, ”मैं सात बार मारने के ऐसे प्रयासों से बच गया हूं। मैं इस प्रकार मरने वाला नहीं हूं। मैं तो 125 साल जीने की आशा रखता हूं।” पुणे से निकलने वाले अखबार ‘हिन्दू राष्ट्र’ के संपादक ने जवाब दिया, ”लेकिन आपको इतने साल जीने कौन देगा!” अखबार के संपादक का नाम था – नाथूराम गोडसे।

पांचवीं कोिशश-1948 :

सावरकर अब तक की अपनी हर कोशिश की विफलता से खिन्न भी थे और अधीर भी। लंदन में धींगरा जब हत्या की ऐसी ही एक कोशिश में विफल हुए थे, तब भी सावरकर ने उन्हें आखिरी चेतावनी दी थी, ”अगर इस बार भी विफल रहे तो फिर मुझे मुंह न दिखाना!”

गांधी जी अपनी हत्या की इन कोशिशों का मतलब समझ रहे थे, लेकिन वे लगातार एक से बड़े दूसरे खतरे में उतरते भी जा रहे थे।
सांप्रदायिकता के दावानल में धधकते देश की रगों में क्षमा, शांति और विवेक का भाव भरते एकाकी गांधी कभी यहां, तो कभी वहां भागते मिलते हैं। पंजाब जाने के रास्ते में वे दिल्ली पहुंचते हैं और पाते हैं कि दिल्ली की हालत बेहद खराब है। अगर दिल्ली हाथ से गयी तो आजाद देश की आजादी भी दांव पर लग सकती है। गांधीजी दिल्ली में ही रुकने का फैसला करते हैं; तब तक जब तक हालात काबू में नहीं आ जाते। इधर गांधीजी का फैसला हुआ, उधर सावरकर टोली का भी फैसला हुआ। गांधी जी ने कहा, मैं दिल्ली छोड़कर नहीं जाऊंगा; सावरकर टोली ने कहा, हम आपको दिल्ली से जिन्दा वापस निकलने नहीं देंगे।

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बिरला भवन में, रोज की तरह उस रोज भी, 20 जनवरी की शाम को प्रार्थना थी। 13 से 19 जनवरी तक गांधीजी का आमरण उपवास चला था। सभी समाजों, धर्मों, संगठनों ने गांधीजी को वचन दिया कि वे दिल्ली का मन फिर बिगड़ने नहीं देंगे। ऐसा कहने वालों में सावरकर टोली भी शामिल थी, जो उसी वक्त हत्या की अपनी योजना पर भी काम कर रही थी। गांधीजी अपनी क्षीण आवाज में इन सारी बातों का ही जिक्र कर रहे थे कि मदनलाल पाहवा ने उन पर बम फेंका, लेकिन निशाना चूक गया। गांधीजी फिर बच गये। बमबाज मदनलाल पाहवा विभाजन का शरणार्थी था। वह पकड़ा भी गया। लेकिन जिन्हें पकड़ना था, उन्हें तो किसी ने पकड़ा ही नहीं।

छठी सफल कोशिश – 30 जनवरी 1948

दस दिन पहले जहां मदनलाल पाहवा विफल हुआ था, दस दिन बाद वहीं नाथूराम गोडसे सफल हुआ। प्रार्थना-भाव में मग्न अपने राम की तरफ जाते गांधी जी के सीने में उसने तीन गोलियां उतार दी और ‘हे राम!’ कह कर गांधी जी वहां चले गये, जहां से कोई वापस नहीं आता।

(‘गांधी मार्ग’ से)

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