आयुर्वेद प्रवर्तक आदिदेव भगवान धन्वंतरी जयंती विशेष

देव और असुरों के मध्य समुद्र मंथन से हुआ था भगवान धन्वंतरि का प्रादुर्भाव

भगवान धन्वंतरि की जयंती कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी धन्वंतरि जयंती अथवा धनतेरस के दिन माना जाता है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार देव और असुरों के मध्य समुद्र मंथन में भगवान धन्वंतरि का प्रादुर्भाव समुद्र से उत्पन्न होकर हुआ था। वह आयुर्वेद और अमृत कलश को लेकर प्रकट हुए थे।उस अमृत के द्वारा उन्होंने देवताओं को कष्टों से रोगों से और मृत्यु के भय से मुक्त किया।

वर्तमान समय में यदि हम समुद्र मंथन की इस कथा को वैज्ञानिक रूप से समझने का प्रयास करें तो ऐसा प्रतीत होता है कि देवताओं और असुरों ने अपने जीवन के सरलीकरण और सुविधाओं की दृष्टि से एक बहुत बड़ा वैज्ञानिक चिंतन मंथन का स्थान चुना और वहां बैठकर उन्होंने अपने जीवन के लिए जो उपयोगी आवश्यक उपकरण साधन और विज्ञान था उसका वहां पर विकास किया। इसी क्रम में स्वर्ण भंडार, मद्य,विष, गतिशीलता के लिए हाथी,घोड़ा,विभिन्न प्रकार के आमोद प्रमोद व गीत नृत्य संगीत हेतु अप्सरा, रत्न संपदा और चिकित्सा विज्ञान की दृष्टि से आयुर्वेद और अमृत का आविष्कार उसी समुद्र मंथन के कारण से संपन्न हुआ।

आदि देव भगवान धन्वंतरि मूल रूप से काशी के राजा थे और वह शल्य चिकित्सा विज्ञान के जनक थे। उन्होंने देवताओं के लिए अपनी बुद्धि के द्वारा और शल्य विज्ञान विशेष रूप से प्रतिपादन किया और अमृत का निर्माण भी उसी क्रम में भगवान धनवंतरी के द्वारा किया गया।

हमारी पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जो भी व्यक्तित्व या अवतार मानवता की रक्षा और कल्याण के लिए होता है वह भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। क्योंकि मानवता को रोग रूपी कष्ट था उस समय और मृत्यु के कारण से सभी लोग भय ग्रस्त थे ऐसे समय में भगवान धन्वंतरि ने आयुर्वेद और अमृत का आविष्कार करके सभी मानवता के लोगों को मृत्यु और रोगों के भय से मुक्त किया।

अतः हमारे पौराणिक मान्यताओं ने उनको भगवान विष्णु का अवतार माना। वास्तव में वह काशी के राजा थे और काशी की स्थापना काश नाम के राजा ने की थी। उनके पुत्र दीर्घतपा व उनके पुत्र धन्व थे।धन्व के पुत्र धन्वन्तरि थे। धनवंतरि के दो अर्थ शास्त्र में वर्णित हैं।

धन्व अर्थात रेगिस्तान और जो रेगिस्तान है उसके अनंतर भी जिनका यश और कीर्ति थी ऐसे भगवान धन्वंतरि।

इसके अतिरिक्त धन्व का अर्थ शल्य भी है।जो शल्य विज्ञान के चिकित्सक हैं, शल्य के शत्रु रूपी हैं ऐसे चिकित्सकों को भी धन्वन्तरि कहा गया। इस परंपरा में उनका जन्म हुआ था।

यह उस समय की बात है जब वैदिक परंपराओं में हमारे देवता सामान्य रूप से और काशी के राजाओं से अयोध्या के राजाओं से अपनी सहायता लिया करते थे। इसी क्रम में समुद्र मंथन के समय भगवान धन्वंतरि अमृत के निर्माण और आयुर्वेद के अविष्कार हेतु उस समुद्र मंथन में देवताओं की तरफ से और उनके सहयोग के लिए प्रस्तुत हुए थे। और उन्होंने आयुर्वेद और अमृत का निर्माण किया था। भगवान धनवंतरी के इस महानता के कारण भगवान धन्वंतरी के ही वंश के राजा केतुमान ने उन से निवेदन किया कि आप हमारे वंश में ही जन्म लें और पुनः इस मानवता को रोगों से मुक्त करें।

तो भगवान धनवंतरि के पुत्र भीम रथ के पुत्र के रूप में दिवोदास का जन्म हुआ। जो कि दिवोदास धनवंतरी के नाम से प्रसिद्ध हुए। दिवोदास धनवंतरि ही वह उपदेशक हैं जिन्होंने सुश्रुत संहिता का मूल उपदेश दिया। और जिनके सुश्रुत, करवीर्य, गोपूररक्षित, पौषकलावत, भोज आदि शिष्य सुश्रुत संहिता के अंदर बताए गए हैं।

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दिवोदास बहुत ही श्रेष्ठ विद्वान और बहुत ही श्रेष्ठ शल्य चिकित्सक थे। उन्होंने जलौका के द्वारा,सिरा वेध विधि के द्वारा, अलाबू विधि के द्वारा, श्रृंगविधि के द्वारा रक्त मोक्षण की विधा समाज को दी।जिससे कुष्ठ रोग, त्वचा के रोग और अनगिनत रक्तज रोगों को उन्होंने चिकित्सा दी। इसके अतिरिक्त जिन लोगों के नासिका और होठ कट जाते थे फट जाते थे बेकार हो जाते तो युद्ध में उनका संधान भी सबसे पहले उपदेशों में सुश्रुत संहिता के अंदर बताया।

वास्तव में इसीलिए वह प्लास्टिक सर्जरी के प्रथम अविष्कार कर्ता माने जाते हैं। दिवोदास के इन समस्त प्रकार के इस श्रेष्ठ शल्य चिकित्सा ज्ञान के कारण और सुश्रुत संहिता के उपदेशक होने के कारण से उनको उनके पिता महा भगवान धन्वंतरि की उपाधि धनवंतरी के नाम से कहा गया, पुकारा गया।

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और इस कारण से उनका नाम दिवोदास धनवंतरी पड़ा। जब वह सुश्रुत संहिता के अंदर अपना व्याख्यान शुरू करते हैं तो उन्होंने सबसे पहले यही सूत्र कहा कि जैसा मेरे पूर्वज भगवान धन्वंतरी ने उपदेश दिया था वैसा ही मैं यहां आप लोगों को उपदेश दूंगा। अर्थात सुश्रुत संहिता के अंदर जो भी उपदेश है जो ज्ञान हैं उन्होंने उसका सारा श्रेय अपने पितामह भगवान धन्वंतरी को दिया। वास्तव में दिवोदास धनवंतरी ने शल्य चिकित्सा विज्ञान के साथ-साथ आयुर्वेद पंचकर्म चिकित्सा और विशेष रूप से भगंदर इत्यादि और अर्श इत्यादि रोगों की क्षारसूत्र चिकित्सा का वर्णन विस्तार से किया है।?

ऐसे धनवंतरि के अवतार काशीराज दिवोदास धनवंतरी ने सुश्रुत संहिता का उपदेश दिया। सुश्रुत संहिता का वर्तमान में सबसे पुराने संहिता के रूप में हमको आज प्राप्त होती है। धनवंतरी जयंती के दिन इन दोनों महापुरुषों का हम इसी रूप में स्मरण करते हैं। हमारा कर्तव्य है कि हम ऐसे महान चिकित्सक, जिन्होंने मानवता को रोगों से और मृत्यु के भय से मुक्त किया उनका हमें स्मरण करें उनका हम पूजन करें उनका हम वंदन करें।

(लेखक वैद्य रामतीर्थ शर्मा उज्जैन स्थित शासकीय धन्वन्तरि आयुर्वेद चिकित्सा महाविद्यालय में संहिता सिद्धांत विभाग के प्राध्यापक एवं विभागाध्यक्ष हैं)

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