गांधीवादी या मार्क्सवादी होना नादानी है

12 अक्टूबर : लोहिया पुण्य-तिथि

अफलातून

मैं यह मानता हूं कि गांधीवादी या मार्क्सवादी होना नादानी है और गांधीवाद विरोधी या मार्क्सवाद विरोधी होना भी नादानी है। गांधी और मार्क्स के अनमोल खजानों सेसीखने लायक बहुत कुछ है, बशर्ते व्यक्ति और कालविशेष मात्र से संदर्भ और निष्कर्ष न निकाले जाएं।’

डॉ राममनोहर लोहिया को गुजरे हुए 54 साल पूरे हो गएहैं। जिस वर्ष वे गुजरे, आठ राज्यों में एक साथ कांग्रेससत्ता से बाहर हुई। भाषा, समानता, सादगी, बड़े लोगों कीआय और खर्च पर पाबंदी जैसी सोशलिस्ट पार्टी की नीतियों को जनता से प्रबल समर्थन मिला था। संविद सरकारों ने घाटे का धंधा होने के कारण खेती में लगानमाफी लागू की, भ्रष्टाचार की जांच के लिए आयोग गठितकिए तथा ओडिसा जैसे राज्य में लोकपाल की नियुक्तिभी हुई। संयुक्त विधायक दलों में स्वतंत्र,जनसंघ और जनकांग्रेस के अलावा प्रसोपा, संसोपा और कम्युनिस्टपार्टियां भी थीं। कांग्रेस को सत्ता से हटाने की जरूरत परजोर देते हुए लोहिया ने कहा था, ‘जनसंघ की पहाड़ भरसांप्रदायिकता से कांग्रेस की एक बूंद सांप्रदायिकताअधिक खतरनाक है, क्योंकि वह सत्ता में है। उसी प्रकारकम्युनिस्टों की एक पहाड़ भर गद्दारी कांग्रेस की एक बूंदगद्दारी से कम खतरनाक है, क्योंकि कम्युनिस्ट सत्ता मेंनहीं हैं। लोहिया के इसी समीकरण के अनुसार देखें तोफिलहाल एक पहाड़ सांप्रदायिकता वाले दल के सत्ता मेंआने के बाद देश और समाज के लिए खतरा पहले सेअधिक बढ़ गया है।

 लोहिया के अपने शब्दों में , ‘1942 -43 की अंग्रेजों केखिलाफ खुली बगावत के दौरान समाजवादी या तो जेलोंमें बंद थे अथवा पुलिस द्वारा सतत तलाशे जा रहे थे।कम्युनिस्ट विदेशी आकाओं की संगत में लोक-युद्ध छेड़ेहुए थे। उसी दौर में मैं मार्क्स के सिद्धांतों को लागू किएजाने के प्रसंगों में व्यापक अंतर्विरोधों को देख कर विस्मितथा। मेरे मन में मार्क्स के सिद्धांतों में सच को खोजनिकालने तथा झूठ को ध्वस्त करने की एक उत्कट इच्छापैदा हो गई। अर्थशास्त्र, राजनीति, इतिहास और दर्शन इनचार आयामों पर विचार करना था। अभी आर्थिक पक्षआधा ही पूरा किया था कि पुलिस के हत्थे चढ़ गया।

तब से अध्ययन और अभिव्यक्ति की इस शैली  में मेरीरुचि नहीं बची है। किसी व्यक्ति-विशेष को केंद्र में रखकर कोई राजनैतिक क्रिया – कलाप तय नहीं किया जासकता। स्वीकृति तथा अस्वीकृति अंधविश्वास के कम-बेसी दरजे मात्र हैं। मैं यह मानता हूं कि गांधीवादी यामार्क्सवादी होना नादानी है और गांधीवाद विरोधी यामार्क्सवाद विरोधी होना भी नादानी है। गांधी और मार्क्सके अनमोल खजानों से सीखने लायक बहुत कुछ है, बशर्तेव्यक्ति और काल विशेष मात्र से संदर्भ और निष्कर्ष ननिकाले जाएं।’

लोहिया ने इस नजरिए से मार्क्स की सीमा कोरेखांकित किया। समतावादी अर्थशास्त्री और सामयिकवार्ता के पूर्व संपादक सुनील ने लोहिया के इस अवदानका निचोड़ इन शब्दों में रखा है, ‘कार्ल मार्क्स ने हमेंबताया कि किस प्रकार पूंजीवाद का पूरा ढाँचा मजदूरों केशोषण पर टिका है। मजदूर की मेहनत से जो पैदा होताहै, उसका एक हिस्सा ही उसको मजदूरी के रूप में दियाजाता है, शेष हिस्सा ‘अतिरिक्त मूल्य’ होता है , जोपूँजीपति के मुनाफे का आधार होता है। यही मुनाफापूँजीवादी विकास का आधार होता है। मार्क्स ने कल्पनाकी थी कि औद्योगीकरण के साथ बड़े बड़े कारखानों मेंबहुत सारे मजदूर एक साथ काम करेंगे। वर्ग चेतना केविकास के साथ वे संगठित होंगे, ज्यादा मजदूरी पाने केलिए आन्दोलन करेंगे। लेकिन मुनाफा और मजदूरी एकसाथ नहीं बढ़ सकते। यही वर्ग संघर्ष बढ़ते बढ़ते क्रांति कारूप ले लेगा और तब समाजवाद आएगा। मार्क्स नेभविष्यवाणी की थी कि पश्चिम यूरोप, जहाँ पूँजीवादीऔद्योगीकरण सबसे पहले व ज्यादा हुआ है, वहीं क्रांतिसबसे पहले होगी।’

किन्तु मार्क्स की भविष्यवाणी सही साबित नहीं हुई।क्रांति हुई भी तो रूस में, जो अपेक्षाकृत पिछड़ा, सामंतीऔर कम औद्योगीकृत देश था। इसके बाद चीन में क्रांतिहुई, वहाँ तो औद्योगीकरण नहीं के बराबर हुआ था। चीनकी क्रांति तो पूरी की पूरी किसानों की क्रांति थी, जबकिमार्क्स की कल्पना थी कि सर्वहारा मजदूर वर्ग क्रांति काअगुआ होगा। पश्चिमी यूरोप में पूँजीवादी औद्योगीकरणके दो सौ वर्ष बाद भी क्रांति नहीं हुई। पूँजीवाद भी इसदौर में नष्ट होने के बजाय, संकटों को पार करते हुए, फलता फूलता गया।

मार्क्सवाद की इस उलझन को सुलझाने का एक सूत्रतब मिला, जब 1943 में डॉ. राममनोहर लोहिया कानिबन्ध ‘अर्थशास्त्र : मार्क्स के आगे’ प्रकाशित हुआ । इसेदुनिया के गरीब व पिछड़े मुल्कों के नजरिए से मार्क्सवादकी मीमांसा भी कहा जा सकता है। लोहिया ने बताया किपूंजीवाद का मूल आधार पूंजीवादी देशों में पूंजीपतियोंद्वारा मजदूरों का शोषण नहीं, बल्कि उपनिवेशों केकिसानों, कारीगरों और मजदूरों का शोषण है। यही‘अतिरिक्त मूल्य’ का मुख्य स्रोत है। इसी के कारणपूंजीवादी देशों में मुनाफा मजदूरी का द्वन्द्व टलता गया, क्योंकि दुनिया के विशाल औपनिवेशिक देशों की लूट काएक हिस्सा पूंजीवादी देशों के मजदूरों को भी मिल गया।यह संभव हुआ कि मजदूरी और मुनाफा दोनों साथ साथबढ़ें। इसीलिए पश्चिमी यूरोप में क्रांति नहीं हुई। इसी केसाथ लोहिया ने लेनिन की इस बात को भी काटा किसाम्राज्यवाद पूंजीवाद की अन्तिम अवस्था है। लोहिया नेकहा कि पूंजीवाद और साम्राज्यवाद का प्रारंभ औरविकास एक साथ हुआ। बिना साम्राज्यवाद के पूंजीवादका विकास हो ही नहीं सकता। मार्क्स की ही एक शिष्यारोजा लक्समबर्ग की तरह लोहिया ने बताया कि पूंजीवादके विकास के लिए एक बाहरी उपनिवेश जरूरी है, जहाँके बाजारों में माल बेचा जा सके और जहाँ से सस्ता, कच्चा माल और सस्ता श्रम मिल सके। इसी विश्लेषण केआधार पर लोहिया ने कहा कि असली सर्वहारा तो तीसरीदुनिया के किसान मजदूर हैं। वे ही पूंजीवाद की कब्रखोदेंगे।’

 समतावादी चिंतक सच्चिदानंद सिन्हा ने लोहिया के इस सिद्धांत को आगे बढ़ाते हुए स्थापित किया कि देश केभीतर आंतरिक उपनिवेशों की लूट से भी यह आधुनिक, औद्योगिक सभ्यता टिकी हुई है। सुनील ने इसी क्रम में यहस्थापित किया कि आंतरिक उपनिवेश सिर्फ भौगोलिकइलाके ही नहीं हैं, अपितु खेती-किसानी जैसे अर्थव्यवस्थाके क्षेत्र विशेष भी हैं।

संसदीय लोकतंत्र, रचनात्मक कार्यक्रम और अहिंसकसंघर्ष को लोहिया ने ‘वोट, फावड़ा, जेल’ के लोकप्रियप्रतीकों के माध्यम से पेश किया था। इन पचास सालों केसमाजवादी राजनीति के तजुर्बे और कमजोरियों से उबरनेके लिए सुनील ने लोहिया के नारे में दो और तत्व जोड़नेकी बात कही- संगठन और सिद्धांत। यह मुट्ठी भरराजनैतिक कर्मी हैं, जिन्होंने लोहिया के राजनैतिक औरआर्थिक विश्लेषण को आगे बढ़ाने का काम किया।

किशन पटनायक का मानना था, ‘लोहिया इस माने मेंदुर्भाग्यशाली थे कि राजनैतिक सत्ता हासिल करने वालेऔर राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता पाने वाले उनके शिष्यों नेअवसरवाद की पूर्ति के लिए लिए ही लोहिया के नाम काउपयोग किया। बौद्धिक दिवालियापन तथा अभूतपूर्वअनुर्वरता इस अवसरवादिता  का लाजिमी परिणाम है।इसी वजह से राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक औरसांस्कृतिक स्तर पर किसी मूलगामी कार्रवाई की कल्पनाभी नहीं की जा सकती है।  राजनीति के मोर्चे परजनशक्ति के निर्माण के लिए धीरज के साथ काम करनेका स्थान गालीगलौज और नौटंकी ने ले लिया है।समाजवादी ,खास तौर पर लोहियावादी किस्म के, परलेदरजे के दंभी, स्वार्थी, व्यक्तिवादी हो गये हैं तथाआत्मालोचना व परस्पर राय-मशविरे के लिए जन्मजाततौर पर अयोग्य हैं। साथ बैठ कर अपनी विफलताओं परविचार विमर्श करने में भी वे असमर्थ हैं।’

उम्मीद नई पीढ़ी के लोहियावादियों से बचती है। इसनई पौध को ‘अर्थशास्त्र : मार्क्स से आगे’ तथा ‘इतिहासचक्र’ में व्यक्त लोहिया की विश्व दृष्टि से परिचित करानाहोगा। इस नई पीढ़ी को यह ध्यान में रखना होगा किउत्तराधिकारी प्रायः अनुयायी नहीं होता । चाहे वह अपने को विनीत भाव से शिष्य कहलाये । उत्तराधिकारी लकीर का फ़कीर नहीं होता। पूर्वानुवर्ती लोकनेताओं के द्वारा निर्दिष्ट दिशा में वह नए मार्ग प्रशस्त करता है और पगडंडियां खोजता है।  स्वामी विवेकानंद, लोहिया, किशन पटनायक और सुनील जैसे लोग उत्तराधिकारी होनेके उपर्युक्त मानदण्ड पर खरे उतरते हैं और प्रेरणा देते हैं।

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