भारतीय दन्ड संहिता1860 की पृष्ठभूमि और वर्तमान परिवेश मे परिवर्तन की आवश्यकता

रतन कुमार श्रीवास्तव 
 
     भारतीय दण्ड संहिता1860 का सृजन 6 अक्टूबर 1860 को किया गया किंतु इसे अन्तिम रुप से सृजित होने के पहले एक लम्बे दौर से गुजरना पडा़।इसके पहले हिन्दू कानून और मुस्लिम कानून अलग अलग थे।हिन्दुओं के लिए मनुस्मृति की स्थापित कानूनी व्यवस्था थी।मनुस्मृति के अन्तर्गत विभिन्न अपराधो को 18 अध्यायो मे बाँटा गया था जिसमे हमला, चोरी, लूट,झूठी गवाही,slander, criminal breach of trust,cheating,adultry,rape,gambling,criminal tresspass,etc आदि बिन्दु स्पष्ट रुप से समाहित थे।
     वारेन हेस्टिंग्स गवर्नर जनरल के प्रयास से बनारस के विद्वान पंडितों द्वारा एक हिंदू कोड बनाया गया जिसे “जेन्टू कोड” कोड के नाम से जाना जाता था।उस समय मूल हिंदू धर्मावलम्बियों को यूरोपियन लोग जेन्टू हिन्दू कहते थे।सामान्य तौर पर मनुस्मृति की व्यवस्थाएं भा.द.सं. बनने तक चलती रहीं।मुगलों के आगमन के पश्चात मुस्लिम कनून लागू हुआ और “दिवानी”और    “फौजदारी”नामकरण प्रारम्भ हुआ।12अगस्त 1765 को गवर्रनर जनरल लार्ड क्लाईव ने दिल्ली के बादशाह से बंगाल, बिहार, उडीसा की दिवानी व्यवस्था अपने हाथों मे ले ली और बाद मे बंगाल के सूबेदार से फौजदारी की “निजामत “व्यवस्था भी ले ली।महत्वपूर्ण कस्बो मे निजाम,नायब निजाम, फौजदार और कोतवाल पदाधिकारी होते थे जबकि दूरस्थ क्षेत्रों को मोफस्सिल क्षेत्र कहा जाता था ओर वहां सारी व्यवस्था जमींदारों के हाथ मे थी।ये सारी व्यवस्थाएं 1858 तक चलतीं रहीं जब तक कि इन्डिया का सारा शासन इंग्लैंड की महारानी ,क्राउन या पार्लियामेंट ने ले लिया।
    18अगस्त 1833 को चार्रटर एक्ट 1833 पास किया गया जो कानूनी क्षेत्र मे एक लैंडमार्क घटना थी, जिसके द्वारा पहली बार गवर्नर जनरल पद बना,ब्रिटिस इंडिया के लिये लेजिस्लेटिव कोंसिल का सृजन हुआ जिसे ब्रिटिश इंडिया के लिये कानून बनाने की शक्ति मिली ओर कोंसिल मे कानूनी मामलों के लिए एक ला मेम्बर का पद बना जिस पर लार्ड र्थामस बेनिंगटन मैकाले पहली बार नियुक्त हुये। इसी चार्रटर मे प्रथम ला कमीसन भी बनाया गया जिसके प्रथम अध्यक्ष लार्ड मैकाले बनाये  गये जिनके साथ तीन और सदस्य थे 1) सर जान मैकफर्सन मैक्लायड–मद्रास प्रेसीडेन्सी से,,2)सर जार्ज विलीयम एन्डरसन– बाम्बे प्रेसिडेंसी से,,3) सर एफ मिलेट–कलकत्ता से। ला कमीशन का मुख्य काम कानूनो का संहिताकरन था,ऐसे संहिता का सृजन जो प्रेसीडेन्सी टाउन ओर मोफस्सिल क्षेत्र,हिन्दू, मुस्लिम ओर सभी के लिए एक जैसा हो।लार्ड मैकाले ने ही प्रथम बार 1833 मे ब्रिटिश पार्लियामेन्ट मे यह मुद्दा उठाया था कि ब्रिटिश इंडिया के कानूनो मे एकरुपता होनी चाहिये क्योंकि मनुस्मृति ओर कुरान ओर विभिन्न ब्रिटिश रेगुलेसनो से न्याय व्यवस्था चलायी जाती है जिसमे कानूनो की व्याख्या के लिए न्यायालयों मे का़जी ,मुल्ला ओर पंडित बैठते हैं ओर कानूनो की विरोधाभासी व्याख्या करते हैं जबकि मोफस्सिल क्षेत्रों मे कानूनी व्यवस्थाए अलग हैं।1793 से 1834 तक बंगाल मे 675,, मद्रास मे 250 ओर बाम्बे मे 259 ब्रिटिश रेगुलेसन लागू थे।इन परिस्थितियों मे संहिताकरण एक दूरूह कार्य था।दो सदस्य बीमार हो गये ओर मूल दायित्व मैकाले पर ही रहा।लगभग 3 सालों के अन्दर लार्ड मैकाले ने दि.14 अक्टूबर 1837 को भा०द०सं० का प्रारूप तैयार कर गवर्नर जनरल इन कोंसिल मे प्रस्तुत किया।
इस संहिता को क्राउन/महारानी के विधिक सलाहकारो, विधिवेत्ताओं एवं बडे़ न्यायाधीसों को समीक्षा हेतु भेजा गया।
     लार्ड मैकाले कौन थे यह जानना यहां समीचीन प्रतीत होता है।लार्ड टी०बी०मैकाले कानून की डिग्री लिए थे,,विधिवेत्ता थे,,trinity college cambridge university से चान्सलर गोल्ड मेडल मिला था,,1826 मे उन्हें  “बार” मे बुलाया गया था। (called to the bar refers one is fit to speak in bar of royal court in england),,दास प्रथा के विरूध्ध उन्होने कई निम्बन्ध लिखे थे,,इतिहास,पाश्चात्य साहित्य,राजनीति पर 10..12 किताबें लिखी थी,, पार्लियामेन्ट के मेम्बर थे,,शिक्षाविद् ओर शिक्षा सुधार मे अग्रणी व्यक्तित्व थे,,भारत मे फारसी हटाकर अंग्रेजी भाषा को सरकारी भाषा बनाने वाले,, अंग्रेजी शिक्षा को भारत मे स्थापित करने वाले,,पाश्चात्य संस्कृति को ही सभ्य मानने वाले व्यक्तित्व थे।
ने भा०द०सं० को तैयार करने के लिये सभी भारतीय कानूनों के अलावा इंगलैन्ड के कानूनो,फ्रांस के नेपोलियन कोड, अमेरिका के लेविन्गसन  के लूसियाना सिविल कोड आदि कानूनो का अध्ययन किया। नेपोलियन कोड वह कोड है जो फ्रांस की क्रांति के बाद 1804 मे 4 विधिवेत्ताओं के द्वारा सामन्तवादी कानूनो के विरुद्ध सामान्य नागरिकों के हित मे बनाया गया था। लूसियाना सिविल कोड भी नया ही था जो 1825 मे पुराने कानूनो के विरूद्ध बनाया गया था। इन दोनोँ ही कानूनो से मैकाले कोड प्रभा्वित था।यह कोड समीक्षा मे सालों लम्बित पडा़ रहा और 1845 तक उसकी सुध नही ली गई क्योंकि1839 मे लार्ड मैकाले सेक्रेटरी आफ वार बनकर वापस इंग्लैंड चले गये।
     26 अप्रेल 1845 एक दूसरा कमीशन बनाया गया जिसके सदस्य थे 1) चार्ल्स  हे कैमरन 2) सर चार्ल्स एलफ्रेड इलियट ( दोनों पूर्व ला मेम्बर) और कोड की समीक्षा  का कार्य सौपा गया। इस कमीशन ने दो पार्ट मे अपनी रिपोर्ट सौंपी..प्रथम दि०23 जुलाई 1846 को एवं द्वितीय दि०24 जून 1847 को। तीसरी बार पुनः इसकी समीक्षा के लिए गवर्नर जनरल इन कौंसिल के ला मेम्बर 1)जान इलियट बेथुन एवं 2) एवं सर बारनेस पीकाक, जो बाद मे प्रथम चीफ जस्टिस आफ कलकत्ता  हाई कोर्ट भी बने,,को नियुक्त किया गया। इन मेम्बर्स के द्वारा गहन समीक्षा के बाद इंडियन लेजिस्लेटिव कौन्सिल मे प्रथम बार दि०28 दिसम्बर 1856 को और दूसरी बार दि० 3 जनवरी 1857 को प्रस्तुत कर पढ़ा गया।सभी समीक्षाओं मे यह कहा गया कि लार्ड मैकाले ने जो अपने देखरेख मे तैयार किया था उसे ही भारतीय दन्ड संहिता का मूल आधार बनाया जाना चाहिए। इसके बाद इसे सेलेक्ट कमीटी को सौपा गया ।वहां से अनुमोदित होने के बाद इसे 21,,24,,एवं 28  जनवरी 1857 को पूरे बिल को  कलकत्ता गज़ट मे प्रकाशित किया गया,और अंततः लगभग साढ़ै तीन साल बाद 6 अक्टूबर 1860 को एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए गवर्नर जनरल के द्वारा इसे हस्ताक्षरित कर दिया गया। पहले इसे 1 मई 1860 को लागू होना था किन्तु जनमानस एवं विधिवेत्ताओं को इसे समझने के लिए पर्याप्त समय मिल सके इसलिए इसे 1जनवरी 1862 से लागू किया गया ।इस प्रकार भारतीय दन्ड संहिता 1860 लगभग 26 वर्षों की लम्बी यात्रा (1834 से  लेकर 1860 तक) के बाद अधिनियम का रूप ले पाई। 
      आज  हम  कुछ संसोधनो के साथ इसी कानून से गवर्न होते हैं जिसकी drafting लगभग 185 वर्षों पुरानी है,जो  हमारी न्याय व्यवस्था की रीढ़ है । हम कल्पना कर सकते हैं कि  वर्ष 1834—-1837 की सामाजिक,आर्थिक ,प्रसाशनिक,व्यापारिक,कृषि,शिक्षा,साक्षरता,स्वास्थ,मानवाधिकार, कानून के शासन कल्पना ( rule of law),मूल अधिकार, जीवन की स्वतंत्रता, अपराधों की स्थिति, दन्ड के नियम व सिध्दांत, राष्ट्रीयता, शासन करने की मंशा ओर उद्देश्य, जनतांत्रिक मूल्य आदि की दशा क्या रही  होगी और आज 2020 मे क्या है।उस समय के परिवेश मे जो कुछ बना वो अब इतिहास की बात है।वर्तमान परिवेश मे बहुत सी धाराओं की प्रसांगिकता अब बदल चुकी है। 
     भा०द०सं० का draft जनवरी 1857 मे सौंपा गया था और गज़ट प्रकाशित किया गया था। 10 मई 1857 को विद्रोह या प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम प्रारम्भ हुआ जिसमे लगभग 6000 ब्रिटिशर्स मारे गये और यह 1नवम्बर 1858 तक चलता रहा।परिणाम स्वरूप भारत का शासन गवर्नमेन्ट आफ इंडिया एक्ट 2 अगस्त 1858 के सीधे क्राउन के हाथ मे चला गया ।भारत मे जगह जगह आन्दोलन प्रारभ हो चुका था। भारतीयों को नियंत्रित करने के लिये जो draft  1857 जनवरी से पेन्डिंग पड़ा था उसे आनन फानन मे  आन्दोलन के दबाव मे 6 अक्टूबर 1860 को पास कर दिया गया।

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