अंतर पार्टी चुनावों के लिए कानून की अहमियत

अंतर पार्टी चुनावों के लिए जरूरी हैं कानून

अंतर पार्टी चुनावों के लिए कानून की आवश्यकता को नकारा नहीं जा सकता. यकीनन कानून और नियम तो हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में भी जरूरी हैं क्योंकि इसके बिना कोई भी काम ढंग से नहीं हो पाता. फिर एक ऐसी राजनीतिक पार्टी, जो कल पूरे देश को चलाने की तैयारी में हो, खुद अपनी पार्टी के आंतरिक मामलों को लेकर अगर समय से चुनाव नहीं करवा पा रहा हो, तो भला उससे यह उम्मीद करना कहां की समझदारी होगी कि जीतने के बाद वह पूरे देश को अच्छी तरह से संभाल पाएगा! यानि इस बात से कतई भी इनकार नहीं किया जा सकता कि अंतर पार्टी चुनाव के लिए कानून होना ही चाहिए.

मीडिया स्वराज डेस्क

आजादी के कई वर्षों बाद तक भी देश में राजनीतिक पार्टियों के लिए मुश्किल से ही कोई कानून थे. खासकर अंतर पार्टी चुनावों के लिए कानून. हालांकि जैसे जैसे राजनीतिक दलों के लिए कानून बनाने की जरूरत महसूस की जाने लगी, इससे जुड़े कई कानून बनाए भी गये. जबकि कई मुद्दों पर कानून बनाने की मांग की जा रही है. इनमें से एक है, अंतर पार्टी चुनावों के लिए एक आदर्श प्रक्रिया तय करने के लिए कानून की जरूरत.

पिछले दिनों अंतर पार्टी चुनावों के लिए कानून बनाने को लेकर दिल्ली उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की गई थी, जिस पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने गुरुवार, 28 अक्टूबर 2021 को निर्वाचन आयोग (ईसी) को निर्देश दिया कि वह अंतर-पार्टी चुनावों के लिए एक आदर्श प्रक्रिया तैयार करने और इसे देश के सभी राजनीतिक दलों के संविधान में शामिल करने का अनुरोध करने वाली याचिका पर जवाब दाखिल करे.

मुख्य न्यायाधीश डीएन पटेल और न्यायमूर्ति ज्योति सिंह की पीठ ने आयोग को नोटिस जारी किया और उसे इस मामले में अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया. पीठ ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 23 दिसंबर की तिथि तय की है.

याचिकाकर्ता ने अदालत से कहा कि उसने इस संबंध में नई याचिका दायर की है, क्योंकि उसके प्रतिवेदन पर आयोग का पहले दिया गया जवाब संतोषजनक नहीं था. याचिकाकर्ता ने पहले भी याचिका दायर की थी. अदालत ने तब आयोग को निर्देश दिया था कि वह इस याचिका को प्रतिवेदन समझकर इस पर फैसला करे. इसी के साथ अदालत ने याचिका का निपटारा कर दिया था.

बता दें कि अंतर पार्टी चुनावों के लिए कानून बनाने को लेकर दायर यह याचिका वकील सी. राजशेखरन ने दायर की है, जो जाने माने फिल्म अभिनेता, निर्माता, निर्देशक और अब राजनीतिज्ञ बन चुके कमल हासन के राजनीतिक दल ‘मक्कल निधि मय्यम’ (एमएनएम) के संस्थापक सदस्यों में शामिल हैं. राजशेखरन ने दावा किया कि राजनीतिक दलों के आंतरिक चुनावों में नियामक के तौर पर आयोग की निगरानी का अभाव है,​ जिसे सही नहीं कहा जा सकता.

याचिकाकर्ता ने दावा किया कि आयोग ने 1996 में सभी मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय और राज्यस्तरीय राजनीतिक दलों के साथ-साथ पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त दलों को एक पत्र जारी करके कहा था कि वे अपने संगठनात्मक चुनावों से संबंधित विभिन्न प्रावधानों का पालन नहीं कर रहे हैं. आयोग ने उनसे आंतरिक चुनावों से संबंधित अपने-अपने संविधानों का ईमानदारी से पालन करने का आह्वान किया था.

अंतर पार्टी चुनावों के लिए कानून बनाने को लेकर दायर याचिका में कहा गया है, ‘‘अन्य निजी संगठनों/संस्थानों के विपरीत राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र का अभाव है, काफी हद तक इसका असर देश के शासन पर पड़ता है, क्योंकि जब ये राजनीतिक दल सत्ता में आते हैं, तो उनमें पारदर्शिता और आंतरिक लोकतंत्र का अभाव होता है, जो उनके गैर लोकतांत्रिक शासन मॉडल में भी प्रतिबिंबित होता है.’’

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बीबीसी के पूर्व ​वरिष्ठ संवाददाता रामदत्त त्रिपाठी अंतर पार्टी चुनावों के लिए कानून बनाने को लेकर दायर इस जनहित याचिका को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट में चल रही सुनवाई के मामले में कहते हैंकि अपने देश के संविधान में लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, लेकिन राजनीतिक दलों में सत्ता के अति केंद्रीकरण और नीचे से ऊपर तक लोकतंत्र का अभाव है. हर पार्टी में हाईकमान की दादागिरी है. ऐसे में अदालत का हस्तक्षेप बहुत सामयिक और उचित है. जब राजनीतिक दल स्वयं संगठन के आंतरिक चुनाव नहीं करवा रहे हैं तो क़ानून में कोई ऐसा उपाय होना चाहिए, जिससे राजनीतिक दलों में समय से चुनाव हो.

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