लद्दाख में चीनी घुसपैठ साल भर पहले से शुरू हो गयी थी , शिकायत दबा दी गयी

—अनुपम तिवारी , 

भारत चीन सीमा यानी LAC पर चीनी सैनिकों की घुसपैठ लगभग साल भर पहले ही शुरू हो गयी थी, और इसका संज्ञान लेने के बजाए सेना और प्रशासन ने घुसपैठ की जानकारी देने वाले ग्रामीणों को चुप करा दिया था.परमाणु हथियारों से लैस एशिया की दो महाशक्तियों चीन और भारत के बीच लदाख संभावित युद्ध का अखाड़ा बनता दिख रहा है. लदाख से गुजरने वाली लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल में दोनों पक्षों की तरफ भारी संख्या में सैनिकों और सैन्य संसाधनों का जमावड़ा हो रहा है. गलवान घाटी की झड़प, जिसमे कई सैनिकों की जानें चली गईं थीं, के बाद से LAC का लदाख स्थित यह क्षेत्र सुर्खियों में है.

भारत दावा करता है कि चीन ने उसकी सीमा का अतिक्रमण करने की हिमाकत की थी जिसका भारतीय फौज ने मुह तोड़ जवाब दिया है. तो दूसरी ओर चीन यही आरोप भारत पर लगा रहा है. दोनों देशों में यह रस्साकशी मई के महीने से चल रही है.

इकनोमिक टाइम्स ने 3 जुलाई को एक रिपोर्ट छापी है, जिसमे उसने लदाख के स्थानीय लोगों से बातचीत के आधार पर लिखा है कि दरअसल चीनी सैनिकों का भारत की सीमा में घुसना नई घटना नहीं है, पिछले साल अगस्त के महीने से ही बड़े पैमाने पर चीनी अतिक्रमण से स्थानीय निवासियों का सामना हुआ है.

इस रिपोर्ट के अनुसार जब नागरिकों ने गलवान घाटी और दौलत बेग ओल्डी सेक्टरों में चीनी घुसपैठ की खबर सेना को दी, तो सेना ने उन्हें ही चुप रहने का आदेश दिया और एक नागरिक ने तो यहां तक दावा किया कि चुप रहने की एवज में उन्हें कुछ रकम भी देने का वादा किया गया था हालांकि आज तक यह रकम उन्हें नही मिली है.

चीनी घुसपैठ का पता तब चला जब एक नागरिक ने शिकायत की कि जब वह अपने घोड़े चराने पास के इलाकों में गया तो चीनी सैनिकों ने उसके 2 घोड़े जबरदस्ती छीन लिए, साथ ही तीसरे घोड़े की पीठ पर लड़ी जीन जिसकी कीमत 10 हजार रुपये है, को छीन लिया.

इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट में कहा है कि इस शिकायत को दबा दिया गया, और नागरिक प्रशासन ने भी इससे अपना पल्ला झाड़ लिया.

सीमा पर स्थित गांवों के निवासीयों का मुख्य व्यवसाय पशुपालन और खेती है. चूंकि ज्यादातर इलाका बंजर है, उनके जानवर चारे के लिए में कुछ चुनिंदा हरी पट्टियों पर निर्भर हैं. चरवाहों का दावा है कि जब वह उन पट्टियों की तरफ अपने जानवर ले कर गए तो चीनी सैनिकों ने उनसे बदसलूकी की. उनको वापस भगा दिया, और जब इसका प्रतिरोध किया गया तो चीनियों ने अपने प्रशिक्षित कुत्तों को उन्हें भगाने के लिए इस्तेमाल किया.

साथ ही स्थानीय निवासियों के हवाले से, रिपोर्ट यह भी बताती है कि 2018 में पूर्वी लदाख के देमचोक इलाके में रहने वाले एक खंड विकास अधिकारी (BDO) के 5 पालतू याक खो गए थे, जो आज भी चीनियों के पास हैं.

दोनों पड़ोसी देशों के बीच बढ़ रही तल्खी का खामियाजा स्थानीय निवासियों को भुगतना पड़ रहा है. दुर्बोक निवासी सोनम कहते हैं कि हाल के दिनों में सेना की गतिविधियां तेजी से बढ़ गयी हैं. निवासियों में डर का माहौल है. यहां के निवासी ज्यादातर सेना और BRO के सामान ढोने वाले पोर्टरों का काम करते थे. वर्तमान परिस्थितियों में उनकी रोजी रोटी छिन गयी है.

वर्तमान तनाव को देखते हुए सीमा के लगभग सभी गांवों जैसे चुशुल, दुर्बोक, श्योक और पेंगोंग त्से झील के आसपास रहने वाले ग्रामीण विशेष प्रार्थना सभाओं का आयोजन कर रहे हैं जिससे शांतिपूर्ण ढंग से विवाद हल हो जाये और उनकी ज़िंदगी वापस पटरी पर लौट आये.

ग्रामीणों ने बताया कि सीमा पर तनातनी के बाद से उस क्षेत्र में मोबाइल सहित समूची दूरसंचार व्यवस्था ठप पड़ी है, इसको देखते हुए उन्हें भय है कि शायद सीमा पर सब कुछ ठीक नहीं है. लोग बताते हैं कि आजकल बिजली भी बहुत कम आ रही है. सिर्फ शाम साढ़े सात से 11 बजे तक. इससे भी उनका जीवन प्रभावित हुआ है. साथ ही उनको यह भी डर सता रहा है कि यदि दोनों पक्षों में विवाद बढ़ गया या उसने युद्ध का रूप ले लिया तो इस मौसम में उनके खाने पीने की समस्या बढ़ जाएगी क्योंकि फिर वह अपनी फसलों को नहीं उगा पाएंगे, जिनके सहारे उनकी गुजर बसर होती है.

लेखक रिटायर्ड वायु सेना अधिकारी हैं. 

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