​जानिए, कौन हैं सुधा भारद्वाज, जिन्हें भीमा कोरेगांव मामले में बॉम्बे HC ने दी जमानत

28 अगस्त 2018 को कुछ अन्य अधिवक्ताओं, लेखकों और कार्यकर्ताओं के साथ सुधा को भी भीमा कोरेगांव मामले में कैद कर लिया गया। जुलाई 2021 से अब तक वह जेल में ही थीं, लेकिन बुधवार को बांबे हाई कोर्ट ने उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया है।

भीमा कोरेगांव मामले में बुधवार को बॉम्बे हाईकोर्ट ने वकील और सामाजिक कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज को जमानत दे दी है। सुधा को यूएपीए के प्रविधानों के तहत अगस्त 2018 में एलगार परिषद-माओवादी लिंक मामले में गिरफ्तार किया गया था। हालांकि कोर्ट ने वरवर राव, सुधीर धावले और वर्नोन गोंजाल्विस समेत आठ लोगों की याचिकाएं खारिज कर दीं।

जेल में सड़ाने के बाद क्यों जमानत?

जाने माने लेखक श्रीनिवास कहते हैं, सुधा भारद्वाज को मुंबई हाईकोर्ट ने जमानत दे दी। मगर सवाल है कि यदि इतने दिनों तक (उन्हें वर्ष ’18 में गिरफ्तार किया गया था) जेल में सड़ाने के बाद क्यों? वैसे भी अभी उनको रिहाई के लिए इंतजार करना होगा। उनके अलावा भीमा-कोरेगांव मामले में नामजद और गिरफ्तार वरवर राव, सोमा सेन, सुधीर धावले, रोना विल्सन सहित चार अन्य की जमानत याचिका तो खारिज ही कर दी गयी।

मेरी जानकारी और समझ से किसी अभियुक्त को जमानत मिलना एक सामान्य बात है, होनी चाहिए। गंभीर आरोपों के बावजूद यदि अदालत की नजर में उसके खिलाफ प्रथम दृष्टया स्पष्ट साक्ष्य न हो, तो जमानत मिलनी चाहिए। जब आप (कोर्ट/ जज) आज जमानत दे सकते हैं, तो किसी विचाराधीन कैदी को लंबे समय- वर्षों- तक जेल में रखने का औचित्य है? वैसे भी यदि सबूत हैं तो यथाशीघ्र ट्रायल कर सजा दे दी जाये।

मैं यह बात आसाराम जैसों के बारे में भी मानता हूं। यथाशीघ्र सजा दो या रिहा करो। अकारण, जमानत के बिना किसी को भी कितने समय तक जेल में रखा जा सकता है, ऐसा स्पष्ट प्रावधान नहीं है, तो होना चाहिए। यह एक नागरिक की स्वतंत्रता का, जीवन जीने के संविधान प्रदत्त अधिकार का मामला नहीं है?‌ मैं कानून और आइपीसी या दंप्रसं का जानकार नहीं हूं। जानना चाहता हूं कि विशेषज्ञ क्या मानते हैं।

रिहाई की तारीख अदालत तय करे

बता दें कि बॉम्बे हाईकोर्ट के जस्टिस एसएस शिंदे और जस्टिस एनजे जमादार की पीठ ने बुधवार को अपने आदेश में कहा कि भारद्वाज, जिन पर केंद्र सरकार के खिलाफ साजिश का हिस्सा होने का आरोप है, ऐसी जमानत की हकदार हैं। पीठ ने निर्देश दिया कि भायखला महिला जेल में बंद भारद्वाज को आठ दिसंबर को मुंबई की विशेष एनआइए अदालत में पेश किया जाए। उनकी जमानत शर्तें और रिहाई की तारीख अदालत तय करे।

इस मामले में गिरफ्तार 16 लोगों में भारद्वाज पहली शख्स हैं, जिन्हें डिफाल्ट जमानत मिली है। वरवर राव फिलहाल मेडिकल जमानत पर बाहर हैं। स्टेन स्वामी की बीती पांच जुलाई को एक निजी अस्पताल में जमानत का इंतजार करते हुए मौत हो चुकी है। जबकि अन्य सभी, विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में हैं।

गौरतलब है कि इस मामले में गिरफ्तार 16 लोगों में भारद्वाज पहली शख्स हैं, जिन्हें डिफाल्ट जमानत मिली है। वरवर राव फिलहाल मेडिकल जमानत पर बाहर हैं। स्टेन स्वामी की बीती पांच जुलाई को एक निजी अस्पताल में जमानत का इंतजार करते हुए मौत हो चुकी है। जबकि अन्य सभी, विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में हैं।

कौन हैं सुधा भारद्वाज

पेशे से वकील सुधा भारद्वाज ने करीब तीन दशकों तक छत्तीसगढ़ में रहकर काम किया है। उन्होंने सुधा पीपुल्स यूनियन फोर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) बनाया। अगस्त 2018 में पुणे पुलिस ने उन्हें भीमा कोरेगांव में हुई हिंसा और माओवादियों से कथित संबंधों के आरोप में गिरफ्तार किया था।

1967 में पश्चिम बंगाल के एक गांव नक्सलबाड़ी में जमींदारों के खिलाफ हथियारबंद आंदोलन हुआ था। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्‍सवादी) यानी सीपीएम से अलग हुए एक धड़े ने नक्सल मूवमेंट के जनक माने जाने वाले चारू मजूमदार के नेतृत्व में यह संघर्ष चलाया था।

उनका मानना था सीपीएम राजनीतिक इच्छा को लेकर मकसद से भटक गई है। बाद में नक्सलबाड़ी आंदोलन का दमन हो गया। हालांकि इस विचारधारा से जुड़े लोग नक्सल कहलाए। वे खुद को नक्सलवादी धारा से जुड़ा मानते थे, इसलिए उन्हें नक्सल कहा गया।

2004 में कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया (माओवादी) का एक दस्तावेज आया। इसमें अर्बन प्रासपेक्टिव शब्द का उल्लेख किया गया और इसकी व्याख्या की गई। रणनीति के तहत शहरी क्षेत्रों में नेतृत्व तलाशने की कोशिश की जाती है। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि माओवादी शहरों में अपना नेतृत्व तलाश रहे हैं।

सुधा भारद्वाज एक श्रम संघवादी, कार्यकर्ता और वकील हैं, जो पिछले तीन दशकों से छत्तीसगढ़ में रह रही हैं। वह छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा मजदूर कार्यकर्ता कमिटी की मौजूदा सदस्य भी हैं।

सुधा भारद्वाज को आइए जानें और भी करीब से…

सुधा भारद्वाज एक श्रम संघवादी, कार्यकर्ता और वकील हैं, जो पिछले तीन दशकों से छत्तीसगढ़ में रह रही हैं। वह छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा मजदूर कार्यकर्ता कमिटी की मौजूदा सदस्य भी हैं।

सुधा का जन्म बोस्टन में हुआ था और उनका बचपन अमेरिका और ब्रिटेन में बीता। सुधा की माता का नाम कृष्णा भारद्वाज था, जो जानी मानी एकेडेमिक और अर्थशास्त्री थीं, जिन्होंने जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी के सेंटर फोर इकोनोमिक्स स्टडीज एंड प्लानिंग की स्थापना की थी। सुधा महज 11 साल की थीं, जब मां के ​साथ दिल्ली आकर रहने लगीं।

आईआईटी कानपुर से गहरा नाता

उन्होंने 1979 में आईआईटी कानपुर के एक पंचवर्षीय कार्यक्रम एकीकृत गणित को ज्वाइन किया और उसके साथ पूरे पांच वर्षों तक जुड़ी भी रहीं। आईआईटी कानपुर में वह जाति-ग्रस्त ग्रामीण पड़ोस में एनएसएस के साथ जुड़कर अध्यापन कार्य करती रहीं। 1984 में आईआईटी कानपुर का यह कार्यक्रम पूरा होने के बाद वह दिल्ली के डीपीएस स्कूल में कुछ साल शिक्षण कार्य भी करती रहीं।

28 अगस्त 2018 को कुछ अन्य अधिवक्ताओं, लेखकों और कार्यकर्ताओं के साथ सुधा को भी भीमा कोरेगांव मामले में कैद कर लिया गया। जुलाई 2021 से अब तक वह जेल में ही थीं, लेकिन बुधवार को बांबे हाई कोर्ट ने उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया है।

1 जनवरी 2018 को पुणे के पास भीमा-कोरेगांव लड़ाई की 200वीं वर्षगांठ पर एक समारोह आयोजित किया गया था, जहां हिंसा होने से एक व्यक्ति की मौत हो गई थी।

क्या है ये भीमा-कोरेगांव मामला

1 जनवरी 2018 को पुणे के पास भीमा-कोरेगांव लड़ाई की 200वीं वर्षगांठ पर एक समारोह आयोजित किया गया था, जहां हिंसा होने से एक व्यक्ति की मौत हो गई थी। इतिहास में जाएं तो भीमा-कोरेगांव लड़ाई जनवरी 1818 को पुणे के पास हुई थी। ये लड़ाई ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना और पेशवाओं की फौज के बीच हुई थी। इस लड़ाई में अंग्रेज़ों की तरफ से महार जाति के लोगों ने लड़ाई की थी और इन्हीं लोगों की वजह से अंग्रेज़ों की सेना ने पेशवाओं को हरा दिया था। महार जाति के लोग इस युद्ध को अपनी जीत और स्वाभिमान के तौर पर देखते हैं और इस जीत का जश्न हर साल मनाते हैं।

1 जनवरी 2018 को भीमा-कोरेगांव में भी लड़ाई की 200वीं सालगिरह को शौर्य दिवस के रूप में मनाया गया था। इस दिन लोग यह दिवस मनाने के लिए एकत्र हुए। भीमा कोरेगांव के विजय स्तंभ में शांतिपूर्वक कार्यक्रम चल रहा था। अचानक भीमा-कोरेगांव में विजय स्तंभ पर जाने वाली गाड़ियों पर किसी ने हमला बोल दिया।

इसी घटना के बाद दलित संगठनों ने दो दिनों तक मुंबई समेत नासिक, पुणे, ठाणे, अहमदनगर, औरंगाबाद, सोलापुर सहित अन्य इलाकों में बंद बुलाया जिसके दौरान फिर से तोड़-फोड़ और आगजनी हुई। इसके बाद पुणे के ज्वाइंट कमिश्नर ऑफ पुलिस रवीन्द्र कदम ने भीमा-कोरेगांव में दंगा भड़काने के आरोप में विश्राम बाग पुलिस स्टेशन में केस दर्ज किया और पांच लोगों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें सुधा भारद्वाज समेत वरवर राव, सोमा सेन, सुधीर धावले, रोना विल्सन का नाम था। हालांकि, इसके अलावा भी कई लोगों की गिरफ्तारी बाद में इस मामले में हुई थी।

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