प्रकृति का सृजन पर्व – कामाख्या देवी अम्बुवाची मेला

                                                           

डा आर अचल
डा आर अचल

इस समय पूर्वोत्तर के मुख्य नगर गुवाहाटी के नीलांचल पर्वत पर स्थित कामाख्या देवी मंदिर में अम्बुवाची पर्व मनाया जा रहा है।अम्बुवाची एक असमिया भाषा का शब्द है,जिसका हिन्दी रजःस्राव काल होता है।  यह पर्व प्रत्येक वर्ष 22 से 26 जून तक पाँच दिन मनाया जाता है।जिसमें देश विदेश से श्रद्धालु एवं तंत्र-मंत्र साधक एकत्र होते है।ऐसी मान्यता है 22 जून से 24 जून तक देवी का रजःकाल होता है।मंदिर का कपाट बन्द रहता है,परन्तु मंदिर के चारो ओर श्रद्धालुओं का ताँता लगा रहता है। यह प्राकृतिक आश्चर्य है कि पाँचवें दिन इस क्षेत्र तेज वर्षा होती है।जिसें माँ का स्नान माना जाता है।इसके बाद विधि-विधान से मंदिर का कपाट खुलता है। मंदिर गर्भ गृह में देवी के विग्रह को स्नानादि करा कर पूजन शुरु होता है,इसके बाद सप्ताह भर दर्शन की प्रतिक्षा में पंक्तिबद्ध श्रद्धालु क्रमशःदर्शन पूजन करते है।रजःकाल में विग्रह को रक्त वस्त्र से ढ़क दिया जाता है।यही वस्त्र प्रसाद के रूप में पूरे वर्ष श्रद्धालुओं को दिया जाता है।यह सौभाग्य दायक माना जाता है।

यहाँ एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि पूर्वोत्तर के किसी भी देवी मंदिर में कोई स्थापित मूर्ति विग्रह नहीं है।प्राकृतिक रूप से एक योन्याकार गह्वर होता है जिसमें जल स्रावित होता रहता है।इसी स्थान पर सुन्दर वास्तु कला का प्रयोग करते हुए भव्य मंदिर बने हुए हैं।इस वर्ष कोरोना संक्रमण के कारण अम्बुवाची मेला स्थगित है परन्तु परम्परानुसार अम्बुवाची पर्व औपचारिक रूप से मनाया जा रहा है।

अम्बुवाची पर्व मूलः प्रकृति के सृजन काल का पर्व है।असामिया संस्कृति में इस काल को पृथ्वी के रजस्वला होने का भाव है।माँ कामाख्या देवी प्रकृति के प्रजनन स्थान की प्रतीक है।

काल गणना के अनुसार पूरे वर्ष को दो खण्डो मे विभाजित किया है।जिसे उत्तरायण व दक्षिणायण कहा जाता है।उत्तरायण काल में पृथ्वी का झुकाव उत्तर की ओर होता है,जिससे सूर्य की निकट होती है।21दिसम्बर से उत्तरायण काल शुरु होता है।इस दिन वर्ष की सबसे लम्बी रात तथा दिन सबसे छोटा होता है। इस दिन से क्रमशःदिन बड़े तथा राते छोटी होने लगती है।वातावरण में तापक्रम बढ़ने तथा नमी घटने लगती है।आयुर्वेद के अनुसार यह आदान काल होता है।इसे संहार काल भी कहा गया है।इसकाल में जीवों का बल घटने लगता है,पृथ्वी की सृजन शक्ति घटने लगती है।तंत्र में इसे शिव काल कहा गया है।यह काल क्रम 21 जून को पूर्ण होता है।यह साल का सबसे बड़ा दिन तथा रात सबसे छोटी है। 22 जून से दिन क्रमशः छोटा और रात का समय बढ़ने लगता है।यह विसर्ग काल कहलाता है।

 तात्पर्य यह कि वातावरण में आर्द्रता(नमी) बढ़ने लगती है,ताप कम होने लगता है।वर्षा का काल आरम्भ होता है।यह सृजन काल होता है,इसमे धरती की कोख से असंख्य कीट पतंगे,खास,तृण उग आते है।शास्त्रो में इसे विसर्ग काल कहा गया है,मानव के बल भी बढ़ने लगता है।

कमाख्या मंदिर एक आदिम मंदिर है,पुराणों के अनुसार यहाँ  शती का प्रजननांग गिरा था। यह मूलतः शाक्त सम्प्रदाय के परम आस्था का केन्द्र है। परन्तु आदिम आस्था और परम्परा के अनुसार 22 जून 26 जून तक दिन शक्ति विग्रह का रजोकाल काल होता है।इस समय मंदिर बन्द रहता है,बाहर लाखो की संख्या में श्रद्धालु,तांत्रिक,साधक, वैश्विक रूप से आते है।स्थानीय असम के ग्रामीण समुदाय में प्रत्येक घर का यह पर्व होता है।कथाये कुछ भी हो पर निश्चित ही प्रकृति के रजस्वला होने का काल होता है,प्रकृति को शाक्त मत में आदि स्त्री शती,काली,त्रिपुरा,सुन्दरी आदि नामों से पूजा गया है।इस तरह यह आश्चर्य करता है,हजारो साल पूर्व से प्रकृति के रजस्वला अर्थात सृजन के तैयार होने के काल का निर्धारण लोग करते रहे होगे,जब न घड़ियाँ थी न कलेैन्डर।फिल हाल इस मंदिर में कोई स्थापित मूर्ति नहीं है,प्राकृतिक रूप एक योन्याकार गह्वर है है,जिसमे जल प्रवाहित होता रहता है।

इस मान्यता के अनुसार साल का 6 मास शिव काल होता है,जो संहार काल होता है,पिता की कठोर शिक्षा का काल होता है.अम्बुवाची,यानि रजःस्राव अर्थात सृजन काल  काल होता है।यह शक्ति का काल होता है।जिसकी पूजा उपासना में अम्बुवाची पर्व मनाया जाता है।

डॉ.आर.अचल 

संपादक-ईस्टर्न साइंटिस्ट जर्नल एंव संयोजक सदस्य-वर्ल्ड आयुर्वेद काँग्रेस

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