जज उत्तम आनंद की हत्या की जांच में सीबीआई की नीयत सवालों के घेरे में

चार्जशीट दाखिल करने में झारखंड हाईकोर्ट की अवहेलना ही नहीं, जांच में भी कोताही..!

कल्याण कुमार सिन्हा

कोरोना काल के दूसरे फेज के कहर से देश की जनता अभी उबर भी नहीं पाई थी कि झारखंड के धनबाद के जज उत्तम आनंद की हत्या ने एक बार फिर पूरे देश को हिलाकर रख दिया था. धनबाद को करीब से जानने वालों ने उसी वक्त कह दिया था कि इस हत्या के पीछे जिनका हाथ है, उन्हें पकड़ पाना किसी के लिए भी आसान नहीं है. इसलिए मानते थे कि सत्य का साथ देने वाले उत्तम आनंद की मौत के पीछे जो लोग हैं, उन्हें कोई भी सलाखों के पीछे नहीं ले जा पाएगा. हुआ भी यही. हत्या के चार महीने बीतने के बावजूद अब तक इसके दोषियों का पता नहीं लगाया जा सका है.

कितने ही मामलों की जांच के मामले में अनेक बार विवादों में घिर चुकी केन्द्रीय अनुसंधान ब्यूरो (सीबीआई) फिर अपनी हेठी करवाने से बाज नहीं आई. धनबाद के जज उत्तम आनंद की हत्या की तीन महीने चली जांच में कोताही और झारखंड हाईकोर्ट के आदेश के विपरीत चार्जशीट जिला कोर्ट में दाखिल कर देने पर सीबीआई इस बार हाईकोर्ट के निशाने पर आई है.

सीबीआई जैसी राष्ट्रीय जांच एजेंसी द्वारा हाईकोर्ट के निर्देश की ऐसी अवहेलना आश्चर्यजनक है. इस हत्याकांड की जांच उसे सौंपने के साथ ही हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया था कि यह जांच उसकी निगरानी में होगी. ऐसे में बिना हाईकोर्ट को जानकारी दिए और बिना जांच के बारे में उसे बताए, चार्जशीट सीधे निचली अदालत में दाखिल किया जाना, सीबीआई के कार्य करने के तरीके और नीयत को सवालों के घेरे में खड़ा करता है.

इतना ही नहीं, चार्जशीट निचली अदालत में दाखिल करने में हाईकोर्ट को अँधेरे में रखने के संबंध में सीबीआई की सफाई से तो और गंभीर चिंता पैदा होती है. सीबीआई ने अपनी सफाई में हाईकोर्ट को बताया कि ऐसा उसने कानूनी सलाह लेने के बाद सीबीआई मुख्यालय के आदेश पर किया है. यह सफाई बहुत ही चौंकाने वाली है.

अब चार्जशीट की भी पड़ताल कर ली जाए, जिस पर हाईकोर्ट ने सीबीआई को लताड़ लगाई है. हाईकोर्ट ने इस चार्जशीट को “स्टीरियोटिपिकल” करार दिया है. कोर्ट ने इस चार्जशीट पर गहरी नाराजगी जताई है. क़ानून के जानकारों की बात तो दूर, सीबीआई के इस चार्जशीट को कोई सामान्य जानकार व्यक्ति भी बचकाना करार दे सकता है.

जज उत्तम आनंद की हत्या : सवाल यह है कि राष्ट्रीय स्तर की इस प्रोफेशनल जांच एजेंसी के कानूनी सलाहकार और उसके मुख्यालय के बड़े अधिकारी को क्या इस बात की जानकारी नहीं थी कि यह जांच जब हाईकोर्ट की निगरानी में हो रही है, तो क्या जांच के बारे में पहले हाईकोर्ट को जानकारी दी जानी चाहिए थी? संदेह यह भी उभरा है कि क्या सीबीआई में “छोटे मियां तो छोटे मियां, बड़े मियां भी शुभान-अल्लाह” ही हैं…?

अब चार्जशीट की भी पड़ताल कर ली जाए, जिस पर हाईकोर्ट ने सीबीआई को लताड़ लगाई है. हाईकोर्ट ने इस चार्जशीट को “स्टीरियोटिपिकल” करार दिया है. कोर्ट ने इस चार्जशीट पर गहरी नाराजगी जताई है. क़ानून के जानकारों की बात तो दूर, सीबीआई के इस चार्जशीट को कोई सामान्य जानकार व्यक्ति भी बचकाना करार दे सकता है.

इस हत्याकांड में दूसरे ही दिन गिरफ्तार एक ऑटो चालक और उसके सहयोगी को गिरिडीह से पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था. पुलिस के समक्ष ही ऑटो चालक और उसके सहयोगी ने जज उत्तम आनंद को ऑटो से टक्कर मारने अपराध स्वीकार भी कर लिया था. लेकिन इसके आगे सीबीआई यह पता लगाने में विफल नजर आई है कि जज की हत्या का आखिर उद्देश्य क्या था?, इस हत्याकांड के पीछे कौन लोग थे? सीबीआई ने बस इतना बता दिया कि जज साहब को जानबूझकर टक्कर मारी गई. तो सवाल यह है कि ऑटो चालक ने बेवजह ऐसे कैसे टक्कर मार दी?

बुधवार, 28 जुलाई 2021 की सुबह 5.00 बजे के आसपास मॉर्निंग वॉक पर निकले धनबाद के जज उत्तम आनंद को रणधीर वर्मा चौक पर 5.08 बजे एक ऑटो ने टक्कर मारी, वे सड़क किनारे गिर पड़े. ऑटो चालक फरार हो गया. आस पास के लोगों ने उन्हें तुरंत शहीद निर्मल महतो अस्पताल पहुंचाया. जहां उपचार के दौरान उसी दिन करीब 9.30 बजे उनकी मृत्यु हो गई.

हाईकोर्ट ने सीबीआई की इस पड़ताल के बारे में जो टिप्पणी की है, वह सीबीआई को शक के दायरे में खड़ा कर रही है. अदालत ने कहा कि इस चार्जशीट से पता चलता है कि सीबीआई आरोपियों को निचली अदालत में एक सामान्य एक्सीडेंट साबित करने का न केवल मौका दे रही है, बल्कि उन्हें इस गंभीर किस्म के हत्याकांड से बच निकलने का भी मौका दे रही है. हाईकोर्ट का यह ऑब्ज़र्वेशन किस कदर सीबीआई को कटघरे में खड़ा कर रहा है, यह समझने की बात है.

बुधवार, 28 जुलाई 2021 की सुबह 5.00 बजे के आसपास मॉर्निंग वॉक पर निकले धनबाद के जज उत्तम आनंद को रणधीर वर्मा चौक पर 5.08 बजे एक ऑटो ने टक्कर मारी, वे सड़क किनारे गिर पड़े. ऑटो चालक फरार हो गया. आस पास के लोगों ने उन्हें तुरंत शहीद निर्मल महतो अस्पताल पहुंचाया. जहां उपचार के दौरान उसी दिन करीब 9.30 बजे उनकी मृत्यु हो गई. उन्हें अज्ञात व्यक्ति मानकर चल रही पुलिस को जैसे ही पता चला कि वे जज उत्तम आनंद थे, वह हरकत में आई और तब तक इस खबर ने पूरे देश में सनसनी पैदा कर दी थी. सुप्रीम कोर्ट को भी हरकत में आना पड़ा और उसने झारखंड हाईकोर्ट को सचेत किया.

इस बीच सीसीटीवी कैमरे में कैद इस वारदात के आधार पर धनबाद पुलिस ने तेजी से कार्रवाई करते हुए टक्कर मारने वाले ऑटो को उसी दिन बुधवार देर रात ही गिरिडीह से बरामद कर लिया और ऑटो चालक लखन वर्मा और उसके सहयोगी राहुल वर्मा को गिरफ्तार कर लिया गया. पुलिस ने बताया कि इनमें से एक ने अपना गुनाह कबूल कर लिया है. जांच में पता चला कि ऑटो मंगलवार, 27 जुलाई को चोरी हुआ था और बुधवार सुबह 5.08 बजे जज उत्तम आनंद को उस ऑटो से टक्कर मार दी गई. पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के जज उत्तम आनंद के सिर पर भारी चीज से चोट के निशान भी मिले.

इस बीच सीसीटीवी कैमरे में कैद इस वारदात के आधार पर धनबाद पुलिस ने तेजी से कार्रवाई करते हुए टक्कर मारने वाले ऑटो को उसी दिन बुधवार देर रात ही गिरिडीह से बरामद कर लिया और ऑटो चालक लखन वर्मा और उसके सहयोगी राहुल वर्मा को गिरफ्तार कर लिया गया. पुलिस ने बताया कि इनमें से एक ने अपना गुनाह कबूल कर लिया है. जांच में पता चला कि ऑटो मंगलवार, 27 जुलाई को चोरी हुआ था और बुधवार सुबह 5.08 बजे जज उत्तम आनंद को उस ऑटो से टक्कर मार दी गई. पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के जज उत्तम आनंद के सिर पर भारी चीज से चोट के निशान भी मिले.

सीबीआई को मामले की जांच सौंपे जाने से पूर्व ही धनबाद पुलिस ने इतना कुछ कर डाला था. प्रथम दृष्टया अपराधियों को उसके हवाले कर दिया गया था. उसे हत्या के मोटिव और इसके पीछे के हाथ का पता लगाना था. जांच का यही केंद्र बिंदु था कि जज की हत्या का मोटिव क्या था और इसके लिए सामान्य सी दुर्घटना कैसे हो सकती है, जबकि जज उत्तम आनंद रांची के होटवार जेल में बंद गैंगस्टर समेत 15 बड़े अपराधियों के मामलों की सुनवाई कर रहे थे. उनके पास लंबित केसों में कई हाई प्रोफाइल मर्डर और आदतन अपराधियों के मुकदमे भी शामिल थे. उन्होंने दो मामलों में दो सगे भाइयों समेत तीन लोगों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी.

उत्तम आनंद छह माह पूर्व ही बोकारो जिले से ट्रांसफर होकर धनबाद आए थे. वह धनबाद के बहुचर्चित रंजय सिंह हत्याकांड में सुनवाई कर रहे थे. इस मामले में झरिया की कांग्रेस विधायक पूर्णिमा नीरज सिंह के मौसेरे देवर हर्ष सिंह आरोपी हैं. इतना ही नहीं, उन्होंने तीन दिन पूर्व यूपी के शूटर अमन सिंह के एक शार्गिद की जमानत याचिका भी खारिज कर दी थी.

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धनबाद कोयलांचल हाई प्रोफाइल हत्या मामलों के लिए जाना जाता रहा है. ऐसी वारदातों का यहां का इतिहास बड़ा पुराना है. कोयला माफिया और राजनीतिक दलों में समाए माफिया सरदारों में ऐसी खूनी रंजिश यहां हमेशा देखने को मिलती रही है. लेकिन ऐसा यहां कभी नहीं हुआ कि कोई जज, सरकारी अधिकारी या पुलिस अधिकारी उनका शिकार बना हो. इसका कारण यह भी माना जाता है कि अधिकारी उनसे बचते और बचाते रहे हैं. ऐसे में एक ऐसे जज की जान ले लेना, जो ऐसे ही मामलों में कार्रवाई कर रहे थे और सुनवाई कर रहे थे, सामान्य बात नहीं हो सकती.

सीबीआई को मामले की जांच सौंपे जाने के पीछे का उद्देश्य भी यही था कि बिना किसी से किसी प्रकार का समझौता किए, निष्पक्ष और निडरता से मामले की जांच हो और इसके पीछे का हाथ सामने आए. लेकिन हाईकोर्ट के विद्वान न्यायाधीशों के अनुसार सीबीआई तो हत्या या दुर्घटना का समुचित साक्ष्य जुटा पाने में भी विफल रही. यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है.

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