श्री जनेश्वर मिश्र की जयंती पर कुछ पुरानी यादें


मैं छठी क्लास में पढ़ता था ! और चारबाग के एक स्टूडियो में ! फोटो ग्राफी सीखता था ? स्टूडियो के बगल में ही एक गली है ! जहां कभी सोशलिस्ट पार्टी का दफ्तर हुआ करता था ।

मुझे अच्छी तरह याद है ।उस दफ्तर में- श्री राज नारायण -रामशरण दास -भगवती सिंह व- जनेश्वर मिश्र जी — का अक्सर आना-जाना हुआ करता था । उसी कार्यालय में श्री जगजीवन राम जो वर्तमान सपा कार्यालय में बाबूजी के नाम से प्रसिद्ध है ।

इन सब का जमावड़ा रहता था । मैं उस कार्यालय मैं बाल्टी लेकर । पानी लेने जाया करता था । एक दिन रामशरण दास जी ने मुझसे कहा– बेटा चाय ला दोगे– मैंने कहां ला दूंगा– और चाय ले आया । राम शरण जी बोले यह एक चाय मिश्रा जी को दे दो मतलब ( जनेश्वर जी ) से था । मैंने ने तपाक से कहा । वही मिश्रा जी जिन की आंख नहीं खुलती है ?

सभी लोग जोर से हंसे तब । जनेश्वर जी ने मुझे बुलाकर । जेब से ₹1 का नोट दीया । और मुस्कुराते हुए बोले । बेटा आंख नहीं खुलती है लेकिन मेरी नजर सब पर रहती है ? मैंने एक रुपए की नोट को लेकर कहा । यह चाय के पैसे हैं ? बोले नहीं यह तुम्हारा ही ईनाम है मेरी आंख खोलने के लिए ?—- (यह चित्र मैंने 30 जून 1990 को ) चारबाग में एक साधारण से सैलून जिसे सिकंदर नाम के बार-बर । जो मित्र जी का पर्सनल कटिंग व सेविंग करता था । उसके दुकान में खींची थी ।

मिश्रा जी को यह नहीं पता था कि छोटा सा पहाड़ी बालक । अब टाइम्स ऑफ इंडिया और नवभारत टाइम्स का । प्रेस फोटोग्राफर हो गया है । जब मैंने परिचय दिया तो बड़े प्रसन्न हुए । तब मिश्रा जी केंद्र में संचार मंत्री थे । आज वह हमारे बीच नहीं है । मगर उनका आशीर्वाद और संस्मरण सदैव याद रहेगा ???

आर बी थापा

फ़ेसबुक वाल से साभार

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