क्या हमारा भारतीय समाज सच मे हमें स्त्री का सम्मान सिखा रहा है?

दीपांकुर सक्सेना

एक दिन टीवी देखते समय मेरा ध्यान एक विज्ञापन पर गया। विज्ञापन एक परफ्यूम का था। उस परफ्यूम का प्रयोग जब एक युवा करता है तो वो अपने आस पास की युवतियों को रिझाने में सफल होता है। ठीक इसी प्रकार से फेस क्रीम और अन्य युवकों से संबंधित सामानों के विज्ञापन में युवा पुरुषों का एक ही उद्देश्य दिखाया गया है युवतियों को आकर्षित करना। जबकि युवतियों से संबंधित विज्ञापनो में ऐसा कहीं नही प्रदर्शित किया गया कि युवक उससे आकर्षित हो गया। मन मे यह विचार आया क्या सच मे युवको के अधिकतम क्रियाकलाप का लक्ष्य युवतियों को आकर्षित करना होता है या फिर समाज मे ही उसको ऐसी शिक्षा दी जाती है कि उसको लगने लगता है कि उसके जीवन के बड़े लक्ष्यों में से एक युवतियों को आकर्षित करना है?

विषय पर और अधिक चिंतन करने पर पाया कि भारतीय फिल्मों में अधिकांश यह देखने को मिलता है कि एक युवा लड़का जब कॉलेज जाता है तो वहाँ उसको एक लड़की से प्रेम होता है और जब वो उस लड़की को प्राप्त कर लेता है तो वो हीरो कहलाता है ।यही से एक छवि बनती है मस्तिष्क में कि हीरो का उद्देश्य होता है हीरोइन को पा लेना और अंततः जब वो उसको पा लेता है तो होती है “हैप्पी एंडिंग”। यही से सबके मन मे यह बात बैठने लगती है कि कॉलेज जाने के बाद अगर हमको भी किसी से प्रेम हुआ तो हम भी हीरो और उसको पा लेना हमारा लक्ष्य अब उसके लिए ही अच्छी पढ़ाई करना फिर अच्छी नौकरी फिर उसके पिता से उसका हाथ मांग लेना कुल मिलाकर लक्ष्य हुआ स्त्री को प्राप्त करना।

अब बात करते है भारतीय माँ बाप की जो बचपन से ही अपने बेटे से बोलने लगते है कि बेटा पढ़ लिख कर अच्छी नौकरी करोगे तभी एक अच्छी सुंदर लड़की मिलेगी वरना ऐसी वैसी ही मिलेगी यानी यहाँ भी लक्ष्य स्त्री को पाना ही बताया जाता है इसके विपरीत लड़की को पढ़ाने के पीछे का भी यही उद्देश्य होता है कि एक अच्छा लड़का उस लड़की को अपनी पसंद बना ले, तो इस तरह एक बात स्पष्ट रूप से सामने आती है कि भारतीय लड़को को स्त्री का सम्मान सिखाया जाता हो या ना जाता हो लेकिन स्त्री को पाना उसका लक्ष्य बनाना ज़रूर सिखाया जाता है।

अब प्रश्न यह है कि अगर ऐसा सिखाया जा रहा है भी, तो इससे यह कहाँ सिद्ध होता है कि हम स्त्री का सम्मान करना नही सिखा रहे तो इसके प्रत्युत्तर में मैं पुनः उदाहरण फ़िल्म से ही लूँगा। एक फ़िल्म के दृश्य के अनुसार एक लड़का किसी लड़की को पसंद करता है और उसको पाना अपना लक्ष्य बना लेता है और जब वो लड़की उसको नही मिलती तो या वो लड़की अपने भविष्य के लिए सजग है और वो प्रेमादि प्रसंगों में नही पड़ना चाहती तो उसको दुर्व्यवहार कपट छल बलात्कार और ना जाने किस किस प्रकार के उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है।

तो यहाँ से स्पष्ट होता है कि जब हम किसी लड़की का सम्मान करेंगे तो उसको प्राप्त करना अपना लक्ष्य कदापि नही बनाएंगे और जब भी एक वस्तु के सामान उसको प्राप्त करना अपना लक्ष्य बना लेंगे तो उसके प्रति मन में जो सम्मान है वो खो देंगे। इसलिए आज के युग की सबसे बड़ी आवश्यकता है कि हम स्त्री को कोई लक्षित या भोग्य वस्तु ना समझे अपितु कुछ ऐसे उदाहरण स्थापित किये जायें की हर एक पुरुष स्त्री के सम्मान की रक्षा ही वास्तविक पुरुषत्व समझे। और एक दायित्व तो माता पिता को भी निभाना चाहिए उनको अपने बच्चो को यह नही बोलना चाहिए कि अगर वो सफलता प्राप्त करेगा तो उसको एक अच्छी लड़की मिलेगी अपितु यह समझाना चाहिए कि अगर उसको किसी भी लड़की से विवाह करके उसको सम्मानपूर्ण जीवन देने योग्य बनना है तो पढ़ाई करके सफलता प्राप्त करनी ज़रूरी है।

परंतु विडम्बना है कि जिस भारत मे लोग अपने देश को वहाँ की धरती को वहाँ की नदियों को माँ की तरह सम्मान देते है वहीं पर कहीं न कहीं स्त्रियों को इस प्रकार का सम्मान देने में चूंक जाते है। आप भी एक बार ज़रूर मंथन करियेगा कि आपकी दी हुई शिक्षा के कारण या अपने आस पास के वातावरण के कारण क्या आपका बच्चा एक स्त्री का सम्मान करना सीख रहा है या नही ? आपकी छोटी सी सीख आपके देश की बेटी पर पड़ने वाली तमाम बुरी नज़रो में कुछ बुरी नज़रो को कम कर सकती है।

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